देखो!
दूर खेत में काम कर रही
उस किसान - बाला को,
जो अकेली ही फसल काट रही है
और अपने में ही खोई - सी --
गाती जा रही है कोई दुखभरा गीत।
थोड़ी देर रुको,
या चुपचाप गुजर जाओ यहाँ से ।
सुनो!
कैसे यह सारी घाटी ही -
भर उठी है उसके स्वरों की गूँज से।
शायद ही किसी बुलबुल ने कभी -
गाये हों इतने कर्णप्रिय गीत -
अरब के तपते रेगिस्तान में --
छायादार आश्रय की तलाश में भटकते -
थके - हारे पथिकों के स्वागत में।
वसंत ऋतु में
कोयल की आवाज़ भी
नहीं सुनाई दी है कभी
इससे अधिक मधुर --
जब वह गूँजती है
सुदूर हेब्रिडीज़ द्वीपों में -
समुद्र के सन्नाटे को -
भेदती हुई।
क्या कोई मुझे बताएगा -
कि वह क्या गा रही है?
शायद इन करुण स्वरों का स्रोत -
सुदूर अतीत की स्मृतियों में है -
जैसे कि बहुत पहले हुआ युद्ध,
या वर्तमान की ही कोई अप्रिय घटना --
सहज मानवीय दुःख, हानि,या पीड़ा -
जो पूर्व में कष्ट का कारण रही हो -
और पुनः घटित हो सकती हो।
चाहे जो हो उसके गीत का विषय
पर वह इस तरह गा रही है --
मानों वह कभी समाप्त नहीं होगा।
मैंने देखा उसे काम करते हुए
अपने हँसिये पर झुके -झुके--
और ठिठक कर वहाँ खड़ा मैं
कुछ देर तक सुनता रहा उसका गीत,
और फिर चलने लगा ऊपर की ओर,
उस संगीत को ह्रदय में लिए --
देर तक उसकी गूँज बनी रही मन में
सुनाई देना बंद होने पर भी.

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