असीम आनंद से उमग उठता है मेरा ह्रदय -
जब भी देखता हूँ -
आकाश पटल पर प्रकट होते -
सप्तवर्णी इंद्रधनुष को।
ऐसा होता था जब मैं -
एक छोटा बालक था,
और आज भी, जबकि मैं बड़ा हो गया हूँ,
ठीक वैसी ही अनुभूति होती है।
चाहता हूँ कि ऐसा ही लगता रहे -
मुझे जीवन के हर पड़ाव पर -
अन्यथा जीने का अर्थ ही क्या?
बालक ही गढ़ता है भविष्य के व्यक्ति को -
उसके ही गुण विकसित होकर -
रचना करते हैं एक परिपूर्ण मनुष्य की.।
चाहता हूँ कि बालमन की वह निष्कलुष आस्था -
सदैव अक्षुण्ण रहे,
और मेरे जीवन का हर दिन -
उसी सहज प्रेम और श्रद्धा की डोर से बँधा रहे -
जिसने बचपन से आज तक -
मुझे प्रकृति से जोड़े रखा है।
( विलियम वर्ड्सवर्थ की कविता का भावानुवाद )

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