जब भी देखता हूँ -
आकाश - पटल पर प्रकट होते -
सप्तवर्णी इंद्रधनुष को।
ऐसा होता था जब मैं -
एक छोटा बालक था,
और आज भी, जबकि मैं बड़ा हो गया हूँ,
ठीक वैसी ही अनुभूति होती है।
चाहता हूँ कि ऐसा ही लगता रहे -
मुझे जीवन के हर पड़ाव पर -
अन्यथा जीने का अर्थ ही क्या?
बालक ही गढ़ता है भविष्य के वयस्क को -
उसके ही गुण विकसित होकर -
रचना करते हैं एक परिपूर्ण मनुष्य की.।
चाहता हूँ कि बालमन की वह निष्कलुष आस्था -
सदैव अक्षुण्ण रहे,
और मेरे जीवन का हर दिन बँधा रहे
उसी सहज प्रेम और श्रद्धा की डोर से -
जिसने बचपन से आज तक -
मुझे प्रकृति से जोड़े रखा है।
विलियम वर्ड्सवर्थ - 1770-- 1850 की कविता 'My Heart Leaps up' का भावानुवाद
विलियम वर्ड्सवर्थ की यह लघु किन्तु महत्वपूर्ण रचना प्रकृति के साथ मनुष्य के सहज और आजीवन सम्बन्ध का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत करती है। इंद्रधनुष को देख कर कवि के ह्रदय में बाल्यकाल जैसा उल्लास जाग उठता है। कवि का सन्देश है कि जीवन me सच्ची संवेदनशीलता तभी बनी रहती है जब मनुष्य अपने भीतर के बाल - सुलभ आश्चर्य और प्रकृति के प्रति प्रेम को जीवित रखे। प्रसिद्ध विचार -- कि बालक ही मनुष्य के भविष्य का निर्माता है -- पीढ़ियों के बीच के अनुभव और संवेदना की निरंतरता को भी व्यक्त करता है।

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