Thursday, 20 August 2026

वे नरगिस के फूल

   मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी -

    पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -

    किसी  बादल  की तरह।


 तभी अचानक मैंने  देखा --
 झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ -
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते-
 तारों की तरह वे भी फैले हुए थे -
 झील के किनारे,- दूर तक --
  एक अनंत रेखा में।
 एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ -
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते-
झूमते, नृत्य करते।
यूँ तो उनके पास ही -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु उनकी  चमक को -
 बहुत पीछे छोड़  रही थी -
 इन पीले फूलों की ख़ुशी।
  ऐसी आनंदमयी  संगति में भला --
 कवि कैसे प्रसन्न न होता?
उस मनोरम दृश्य को -
 मैं निहारता रहा,
  निहारता  रहा देर तक -
  बिना यह सोचे  कि उसने मुझे -
 किस अपूर्व आनंद -धन से -
   समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद -
जब भी मैं फुर्सत के क्षणों में -
अथवा गहन विचारों में डूबा होता हूँ-
वे सुन्दर फूल, मेरी कल्पना में,
  एकांत के उस  आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
 और आह्लाद से  भर  देते हैं  मेरे ह्रदय को -
  इस तरह कि वह भी अनायास   ही 
   नाच उठता है उनके साथ।

A transcreation of "I wandered lonely as a Cloud " by William Wordsworth
x

No comments: