सूर्यास्त का समय -
और उदय होना सांध्य तारे का -
मानों एक स्पष्ट पुकार हो मेरे लिए -
उस पार से।
बस, इतना चाहता हूँ --
कि जब मैं सागर की ओर बढूँ -
तो तट पर मेरे लिए -
कोई शोक- रुदन न हो।
उस समय एक ऐसा ज्वार आए -
जो बहता हुआ होने पर भी
प्रतीत हो शांत और सोया- सा,
पूरी तरह शोर और झाग से मुक्त,
समुद्र की जिस गहराई से निकला -
उसी में लौटने को आतुर ।
गोधूलि की वेला में बजती -
संध्या की घंटी,
और फिर घना अंधकार!
चाहता हूँ कि ऐसे समय -
जब मैं शुरू करुँ अपनी यात्रा -
तो विदाई का दुःख न मनाया जाए।
भले ही वह बहाव मुझे ले जाए
समय और स्थान की सीमा से --
कहीं बहुत, बहुत दूर, किन्तु-
मैं आनंदित हूँ यह कल्पना करके
कि इस तटबंध को पार करने के बाद
मैं मिल सकूँगा अपने कर्णधार से
प्रत्यक्ष रूप में।
A transcreation of "Crossing The Bar " by Alfred Tennyson.
'Crossing the Bar' प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि अलफ्रेड लार्ड टेनीसन की अत्यंत मार्मिक और आध्यात्मिक कविता हैं. इसमें जीवन की अंतिम अवस्था को भय या विषाद के रूप में नहीं, बल्कि एक शांत और स्वाभाविक यात्रा के रूप में देखा गया है. समुद्र, ज्वार और बंदरगाहों के प्रतीकों के माध्यम से कवि इस संसार से अनंत की ओर प्रस्थान की अनुभूति करता है. कविता का सबसे सुन्दर भाव उस दृढ विश्वास में निहित है कि इस अंतिम यात्रा के पार कवि का मिलन अपने 'पायलेट ', अर्थात अपने परम मार्गदर्शक से होगा.
अपनी सरलता, गहन प्रतीकात्मकता और शांत स्वीकार्यता के कारण यह कविता विश्व साहित्य की अमर रचनाओं में गिनी जाती है, और यह मेरा विनम्र प्रयास है उस के भावों को हिन्दी के काव्य प्रेमियों तक पहुँचाने का।
