Monday, 3 August 2026

सच्चा प्रेम


 सच्चे प्रेमियों के मिलन में -


 किसी अवरोध को -

 स्वीकार नहीं करता मैं।


 वह प्रेम ही क्या, जो  बदल जाए -

परिस्थितियों के साथ -

या स्वयं  ही झुक जाए -

परिवर्तन के आगे।


 एक प्रकाश - स्तम्भ है  प्रेम -

आकाशदीप - सा  अटल -

 प्रचंड तूफानों में भी -

 जो रहता है अडिग।



 समुद्र में भटके जहाजों का 

मार्गदर्शक ध्रुवतारा है प्रेम,

जिसकी ऊँचाई तो नापी जा सकती है -

पर  वास्तविक मूल्य 

 सदा रहता है अज्ञात।



सच्चा प्रेम नहीं होता समय का दास,

गुलाबी अधर और कपोलों का सौंदर्य 

 मुरझा जाता है, निरंतर घूमते हुए

समय - चक्र के साथ 



किन्तु  नहीं बदलता  प्रेम --

 बीतते पलों  के साथ -

वह तो अक्षुण्ण  रहता  है -

प्रलयकाल के छोर तक।


यदि यह असत्य हो,

और  सिद्ध हो जाए मुझ पर 

तो मैं मान लूँगा कि मैंने कुछ नहीं लिखा,

और  न ही  कभी किसी ने  किया प्रेम।





       A transcreation of  sonnet 116 by William Shakespeare.

शेक्सपियर  की यह रचना अटल प्रेम की महानता का प्रभावशाली उद्घोष है। कवि के अनुसार सच्चा प्रेम परिस्थितियों, समय अथवा बाहरी परिवर्तनों के साथ बदलता नहीं है, वह जीवन के तूफानों में मार्गदर्शक तारे की भाँति स्थिर रहता है और समय के प्रभाव से अछूता रहता है। कविता प्रेम को केवल आकर्षण या भावनात्मक अनुभूति के रूप में नहीं, बल्कि निष्ठा, स्थिरता, और आत्मिक समर्पण के रूप में देखती है। अपनी गहन संवेदना और दार्शनिक दृष्टि के कारण यह सोनेट विश्व साहित्य में प्रेम की सर्वाधिक प्रसिद्ध अभिव्यक्तियों में गिना जाता है।

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