सच्चे प्रेमियों के मिलन में -
किसी अवरोध को -
स्वीकार नहीं करता मैं।
वह प्रेम ही क्या, जो बदल जाए -
परिस्थितियों के साथ -
या स्वयं ही झुक जाए -
परिवर्तन के आगे।
एक प्रकाश - स्तम्भ है प्रेम -
आकाशदीप - सा अटल -
जो प्रचंड तूफानों में भी -
रहता है अडिग।
समुद्र में भटके जहाजों का
मार्गदर्शक ध्रुवतारा है प्रेम,
जिसकी ऊँचाई तो नापी जा सकती है -
पर वास्तविक मूल्य
सदा रहता है अज्ञात।
सच्चा प्रेम नहीं होता समय का दास,
गुलाबी अधर और कपोलों का सौंदर्य
मुरझा जाता है, निरंतर घूमते हुए
समय - चक्र के साथ
किन्तु नहीं बदलता प्रेम --
बीतते पलों के साथ -
वह तो अक्षुण्ण रहता है -
प्रलयकाल के छोर तक।
यदि यह असत्य हो,
और सिद्ध हो जाए मुझ पर
तो मैं मान लूँगा कि मैंने कुछ नहीं लिखा,
और न ही कभी किसी ने किया प्रेम।
A transcreation of sonnet 116 by William Shakespeare.
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