Monday, 3 August 2026

Sonnet 116 -- William Shakespeare


 सच्चे प्रेमियों के मिलन में -


 किसी अवरोध को -

 स्वीकार नहीं करता मैं।


 वह प्रेम ही क्या, जो  बदल जाए -

परिस्थितियों के साथ -

या स्वयं  ही झुक जाए -

परिवर्तन के आगे।


 एक प्रकाश - स्तम्भ है  प्रेम -

आकाशदीप - सा  अटल -

जो प्रचंड तूफानों में भी -

 रहता है अडिग।



 समुद्र में भटके जहाजों का 

मार्गदर्शक ध्रुवतारा है प्रेम,

जिसकी ऊँचाई तो नापी जा सकती है -

पर  वास्तविक मूल्य 

 सदा रहता है अज्ञात।



सच्चा प्रेम नहीं होता समय का दास,

गुलाबी अधर और कपोलों का सौंदर्य 

 मुरझा जाता है, निरंतर घूमते हुए

समय - चक्र के साथ 



किन्तु  नहीं बदलता  प्रेम --

 बीतते पलों  के साथ -

वह तो अक्षुण्ण  रहता  है -

प्रलयकाल के छोर तक।


यदि यह असत्य हो,

और  सिद्ध हो जाए मुझ पर 

तो मैं मान लूँगा कि मैंने कुछ नहीं लिखा,

और  न ही  कभी किसी ने  किया प्रेम।





A transcreation of  sonnet 116 by William Shakespeare.


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