Monday, 3 August 2026

Trees --- Joyce Kilmer वृक्ष (भावानुवाद )

मुझे लगता है कि मैं -

शायद ही कभी देख पाऊँगा -

वृक्ष -सी सुन्दर किसी कविता को।


वृक्ष, जिसका मुँह सदा  लगा रहता है -

धरती माँ के वक्ष- स्थल से-

अमृत- तुल्य   जीवन -रस का -

पोषण लेता हुआ।


वह, जो दिन भर देखता रहता है ईश्वर को -

अपनी पत्तों से लदी बाहें  -

प्रार्थना की मुद्रा में उठाये हुए।


जिसकी घनी शाखाओं के बीच -

बनाती है बुलबुल अपना घरौंदा-

हर ग्रीष्म ऋतु में.


  जिसकी फूलों से भरी डालों पर -

  विश्राम करती है शीत ऋतु में बर्फ़ -

  और जिसके साथ  रहती है वर्षा -

     अंतरंग सखी की तरह।


     सच  है, कवितायें तो -

   मुझ जैसे मूर्ख भी बना लेते हैं -

   किन्तु केवल ईश्वर ही कर सकता है -

    एक वृक्ष की रचना।















Sunday, 2 August 2026

My Heart Leaps Up ---- William Wordsworth --- इंद्रधनुष


 आनंद  से उमग उठता है मेरा ह्रदय -

जब भी  देखता हूँ -

आकाश - पटल पर प्रकट होते -

सप्तवर्णी  इंद्रधनुष  को।

 ऐसा होता था जब मैं -

एक छोटा बालक था,

और आज भी, जबकि मैं बड़ा हो गया हूँ, 

ठीक वैसी ही  अनुभूति होती है।


चाहता हूँ कि  ऐसा ही  लगता रहे -

मुझे जीवन के हर पड़ाव  पर -

अन्यथा जीने का अर्थ ही क्या?


बालक ही गढ़ता है  भविष्य के व्यक्ति को -

उसके ही गुण विकसित होकर -

रचना करते हैं एक परिपूर्ण मनुष्य की.।


चाहता हूँ कि बालमन की वह निष्कलुष आस्था -

 सदैव अक्षुण्ण रहे, 

और मेरे जीवन का हर दिन -

 उसी सहज प्रेम और श्रद्धा की डोर से बँधा रहे -

जिसने बचपन से  आज तक -

 मुझे प्रकृति से जोड़े रखा है।


  ( विलियम वर्ड्सवर्थ  की कविता का भावानुवाद )