प्रेम की कोई अन्य कोई आकांक्षा नहीं होती
स्वयं को परिपूर्ण करने के अतिरिक्त।
किन्तु यदि तुम प्रेम करने के साथ साथ
कुछ और इच्छाएँ भी रखते हो
तो उसे एक बहते हुए झरने - सा बनाओ
जो भर देता है रात्रि की निस्तब्धता को भी
अपने मधुर संगीत से।
अपने प्रेम को जान लेने दो
स्वयं अनुभव कर के
बहुत अधिक कोमल होने पर
घायल होने का दर्द।
उसे सीखने दो, स्वेच्छा से
हँसते -हँसते चोट खाना --
हर सुबह उत्साह से जागना -
और कृतज्ञ महसूस करना
एक और प्रेम भरे दिन के लिए।
दिन भर विश्राम करते हुए --
प्रेम के परम आनंद पर मनन करना
और सांध्य वेला में
कृतज्ञता व्यक्त करते हुए
घर लौट जाना ।
और अंत में अपने प्रियतम के लिए
ह्रदय में शुभाशंसा और होठों पर
उसकी प्रशंसा के गीत लेकर
निद्रा की गोद में चले जाना।
खलील जिब्रान की कविता "प्रेम " का भावानुवाद

No comments:
Post a Comment