प्रेम की कोई अन्य कोई आकांक्षा नहीं होती -
स्वयं को परिपूर्ण करने के अलावा ।
यदि तुम प्रेम करने के साथ साथ -
कुछ और इच्छाएँ भी रखते हो,
तो उसे एक बहते हुए झरने - सा बनाओ -
जो भर देता है रात्रि की निस्तब्धता को भी -
अपने मधुर संगीत से।
अपने प्रेम को जान लेने दो -
स्वयं अनुभव कर के -
बहुत अधिक कोमल होने पर -
घायल होने का दर्द।
उसे सीखने दो, स्वेच्छा से -
हँसते -हँसते चोट खाना --
हर सुबह उत्साह से जागना -
और कृतज्ञ महसूस करना
एक और प्रेम भरे दिन के लिए।
दिन भर विश्राम करते हुए --
प्रेम के परम आनंद पर मनन करना -
और सांध्य वेला में,
कृतज्ञता व्यक्त करते हुए -
घर लौट जाना ।
और अंत में अपने प्रियतम के लिए -
ह्रदय में शुभाशंसा--
और होठों पर--
उसकी प्रशंसा के गीत लेकर -
निद्रा की गोद में चले जाना।
Transcreated from the poem 'On Love ' by Khalil Gibran (1883-1931)
खलील जिब्रान की कविता "On Love " प्रेम के गहन, व्यापक और आध्यात्मिक स्वरुप को अभिव्यक्त करने वाली प्रसिद्ध रचना है। इसमें प्रेम को केवल भौतिक सुख और आकर्षण का अनुभव नहीं बल्कि आत्मा के विकास और आत्म - परिष्कार की शक्तिशाली प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिब्रान के अनुसार प्रेम मनुष्य को आनंद देता है किन्तु उसके मार्ग में पीड़ा और कठिनाइयाँ भी हो सकती हैं, फिर भी यही अनुभव व्यक्ति को भीतर से अधिक संवेदनशील और परिपक्व बनाते हैं। यह रचना हमें अधिकार या बंधन के रूप में नहीं, बल्कि समर्पण, स्वतंत्रता और आत्मिक उत्कर्ष के रूप में समझने की प्रेरणा देती है।

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