अपनी चिंताओं को जाने दो -
और बनो पूर्णतः निर्मल -हृदय -
एक दर्पण के सदृश -
जिसमें कोई छवि नहीं होती।
यदि तुम्हें एक स्वच्छ दर्पण चाहिए -
तो अपने आप को देखो -
और देखो उस निर्लज्ज सच्चाई को -
जो दर्पण तुम्हें दिखाता है।
और सोचो --
यदि धातु का एक टुकड़ा -
चमकाया जा सकता है -
एक दर्पण की तरह -
तो हृदय के दर्पण को चमकाने के लिए -
तुम्हें क्या चाहिए होगा?
सूफ़ी कवि जलालुद्दीन रूमी की कविता का भावानुवाद
सूफ़ी कवि जलालुद्दीन रूमी की यह प्रेरक रचना चिंता और भय से मुक्त होकर जीवन पर विश्वास करने का सन्देश देती है। मनुष्य प्रायः भविष्य की आशंकाओं और परिस्थितियों के बोझ से स्वयं को व्यथित कर देता है। रूमी हमें स्मरण कराते हैं कि हर क्षण को नियंत्रित करना हमारे वश में नहीं है, किन्तु विश्वास, धैर्य और समर्पण के साथ हम अपनी जीवन - यात्रा को सहज बना सकते हैं. यह कविता हमें ईश्वर तथा जीवन की व्यापक व्यवस्था पर भरोसा रखने का सन्देश देती हैं।

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