मैं अपने आप का उत्सव मनाता हूँ,
स्वयं के गीत गाते हुए -
और समझता हूँ कि जो मैं मानता हूँ -
तुम भी वही मानते होगे,
क्योंकि हर परमाणु जो मुझमें है -
वह तुम्हारा भी उतना ही है -
जितना मेरा।
मैं विचरता रहता हूँ निरुद्देश्य, निश्चिंत --
और आमंत्रित करता हूँ अपनी आत्मा को।
कभी - कभी आराम से झुककर देखता हूँ
ग्रीष्म की घास के नुकीले सिरों को भी।
मेरी जिह्वा, मेरे रक्त की हर बूँद -
बनी है इसी मिट्टी से, इसी हवा से,
मैं संतान हूँ इसी मिट्टी में जन्मे माता - पिता की -
जिनके माता - पिता और उनके भी माता - पिता --
यहीं जन्मे थे।
मैं,सैंतीस वर्ष का पूर्ण स्वस्थ पुरुष,-
आशा करता हूँ कि जीवन - प्रवाह में -
इसी तरह बहता रहूँगा
जब तक मृत्यु आकर मुझे रोक न दे।
कुछ समय के लिए पीछे हट कर
उन धार्मिक सम्प्रदायों --
और सामाजिक मान्यताओं से -
जो पर्याप्त होते हुए भी -
अब प्रासंगिक नहीं रहे, किन्तु -
उन्हें अभी तक भुलाया नहीं गया है।
मैं प्रश्रय देता हूँ -
अच्छे और बुरे दोनों को ही -
और जोखिम उठा कर भी -
उन्हें बोलने की अनुमति देता हूँ -
पूरी स्वतंत्रता के साथ-
अपनी मौलिक ऊर्जा के साथ बहती हुई -
प्रकृति की तरह।
Song Of Myself ---- आत्म - गान --- वाल्ट व्हिटमैन की कविता का भावानुवाद

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