Sunday, 16 August 2026

The Guest House ---- अतिथि - गृह (भावानुवाद )


    मनुष्य होना  भी ऐसा है --

  जैसे कोई अतिथि - गृह होना!

   जहाँ हर सुबह -

   आता है एक नया मेहमान,

   कभी ख़ुशी, कभी अवसाद 

    तो कभी नीचता के  भाव लेकर.

    और कभी -कभी क्षण भर के लिए -

    आ जाती है जागरूकता भी -

   किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !


   तुम्हें करना होता  है स्वागत -

 और समुचित सत्कार सभी का,

  क्योंकि यही तो धर्म है -

  एक  अच्छे मेज़बान  का।


    भले ही दुखों की भीड़ बनकर आयें वे,

 तुम्हारे घर को तहस - नहस  कर डालें,

  और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर। 

  तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,

  कौन जाने वह तुम्हारे घर में -

   किस नई ख़ुशी  के लिए -

   जगह बना रहा हो!


     निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना 

     इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर, 

     हँसते हुए आमंत्रित करो उनको 

     अंदर आने के लिए।

     आभार मानो उन सबका -

     क्योंकि उन सब में  हर एक को -

     कहीं दूर से भेजा गया है,

     तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।


  A transcreation  of  sufi mystc poet Rumi's  poem                "The Guest House "

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