मनुष्य होना भी ऐसा है --
जैसे कोई अतिथि - गृह होना!
जहाँ हर सुबह -
आता है एक नया मेहमान,
कभी ख़ुशी, कभी अवसाद
तो कभी नीचता के भाव लेकर.
और कभी -कभी क्षण भर के लिए -
आ जाती है जागरूकता भी -
किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !
तुम्हें करना होता है स्वागत -
और समुचित सत्कार सभी का,
क्योंकि यही तो धर्म है -
एक अच्छे मेज़बान का।
भले ही दुखों की भीड़ बनकर आयें वे,
तुम्हारे घर को तहस - नहस कर डालें,
और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर।
तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,
कौन जाने वह तुम्हारे घर में -
किस नई ख़ुशी के लिए -
जगह बना रहा हो!
निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना
इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर,
हँसते हुए आमंत्रित करो उनको
अंदर आने के लिए।
आभार मानो उन सबका -
क्योंकि उन सब में हर एक को -
कहीं दूर से भेजा गया है,
तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।
A transcreation of sufi mystc poet Rumi's poem "The Guest House "
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