Sunday, 16 August 2026

The Guest House ---- अतिथि - गृह (भावानुवाद )


    मनुष्य होना  भी ऐसा है --

  जैसे कोई अतिथि - गृह होना!

   जहाँ हर सुबह -

   आता है एक नया मेहमान,

   कभी ख़ुशी, कभी अवसाद 

    तो कभी नीचता के  भाव लेकर.

    और कभी -कभी क्षण भर के लिए -

    आ जाती है जागरूकता भी -

   किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !


   तुम्हें करना होता  है समुचित -

 स्वागत -सत्कार सभी का,

  क्योंकि यही तो धर्म है -

  एक  अच्छे मेज़बान  का।


    भले ही वे दुखों की भीड़ बनकर आयें 

 तुम्हारे घर को तहस - नहस  कर डालें,

  और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर। 

  तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,

  कौन जाने वह तुम्हारे घर में -

   किस नई ख़ुशी  के लिए -

   जगह बना रहा हो!


     निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना 

     इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर, 

     हँसते हुए आमंत्रित करो उनको 

     अंदर आने के लिए।

     आभार मानो उन सबका -

     क्योंकि उन सब में  हर एक को -

     कहीं दूर से भेजा गया है,

     तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।



                                           "The Guest House " 

 सूफ़ी संत कवि जलालुद्दीन रूमी की यह कविता अपनी सरल अभिव्यक्ति में जीवन - दर्शन की गहन अनुभूति समेटे हुए है। कविता में  मानव - मन  को एक अतिथि - गृह के रूपक के माध्यम से चित्रित किया गया है, जहाँ जीवन के विविध भाव -- आनंद, विषाद, निराशा और अन्य अप्रत्याशित अनुभूतियाँ - अतिथियों की भाँति आते - जाते रहते हैं।

कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रूमी सुखद और दुखद अनुभवों के बीच कोई भेद नहीं करते, वे जीवन में आने वाली प्रत्येक अनुभूति का स्वागत करने की सलाह देते हैं, क्योंकि कभी - कभी पीड़ा और रिक्तता  भी किसी नवीन चेतना और आत्म - बोध के लिए स्थान निर्मित करती है।

सूफ़ी दर्शन की उदार और स्वीकारशील दृष्टि से ओतप्रोत यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन का प्रत्येक अनुभव, चाहे वह कितना भी अप्रिय क्यों न प्रतीत हो, हमारे आत्म - विकास की यात्रा में एक संभावित शिक्षक  बन सकता है।

The Guest House इसलिए केवल एक कविता नहीं, अपितु जीवन को स्वीकार करने का एक शांत, गहन और सर्वकालिक सन्देश है।



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