Tuesday, 28 July 2026

जीवन - पथ का चुनाव


पतझड़ की ऋतु थी,

और मैं गुजर रहा था,

पीले पत्तों से आच्छादित,

एक जंगल के रास्ते से।


एक जगह पहुँच कर,

ठिठक गये मेरे कदम,

क्योंकि वहाँ रास्ता  बँट गया था -

दो अलग, अलग दिशाओं में -

और मैं, अकेला पथिक

 चल नहीं सकता  था -

दोनों पर एक साथ।


इसलिए  वहीं ठहर कर मैं,

देर तक निहारता रहा, 

जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी,

वहाँ तक, जहाँ वह रास्ता -

झुरमुटों के बीच मुड़कर -

 ओझल हो गया था।


 फिर मैंने दूसरे पथ को देखा,

वह भी पहले जैसा ही सुन्दर, बल्कि -

 कुछ अधिक ही आकर्षक लगा,

क्योंकि उसकी मखमली घास -

अब तक अनछुई  प्रतीत होती थी -

यद्यपि,वास्तव में  दोनों ही रास्ते -

समान रूप से -

पद चिन्होँ से परिचित थे.


और उस सुबह दोनों ही -

सूखी पत्तियों से ढके हुए थे -

एक समान,

जिन पर किसी के भी

पद - चिन्ह नहीं पड़े थे।


बस, मैंने चुन लिया दूसरा रास्ता,

पहले वाले को किसी और दिन-

 के लिए छोड़ कर।

यह जानते हुए भी कि हर रास्ता -

आगे चलकर जा मिलता है -

किसी नये रास्ते से -

और मेरा यहाँ लौटकर आना -

शायद ही संभव होता।


और वर्षों बाद -

एक लम्बी साँस भरकर -

मैं यह कथा सुना रहा होऊँगा -

कि कैसे जंगल का वह रास्ता -

बँट गया था दो दिशाओं में।

उनमें से मैंने चुना था वह मार्ग -

जिस पर कम लोग चले थे -

और उस फैसले ने ही बदल दिया है -

मेरा जीवन।

' The Road Not Taken'  Robbert Frost की  प्रसिद्ध कविताओं मे से  एक, जीवन में किए जाने वाले चुनावों और उनके दूरगामी प्रभावों पर आधारित एक विचारोत्तेजक  रचना है। दो रास्तों के प्रतीक के माध्यम से कवि उन परिथितियों को प्रस्तुत करता है जब व्यक्ति को अनेक संभावनाओं में से एक मार्ग चुनना पड़ता है। जीवन में हर निर्णय अपने अवसरों और अनिश्चितताओं  को लेकर आता है।कविता  हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कई हमारे चुनाव हमारी जीवन -यात्रा  को किस प्रकार आकार देते हैं। अपनी प्रतीकात्मकता और गहरी जीवन दृष्टि के कारण यह कविता आधुनिक अंग्रेज़ी कविता की अत्यंत लोकप्रिय कविताओं  में से एक मानी जाती है ।

  


Wednesday, 22 July 2026

एक जीवन - दर्शन



       कोलाहल और  उतावली के बीच भी -

       तुम  शांतचित्त रह कर आगे बढ़ते रहो -

       और  स्मरण रखो कि -

        मौन  में भी निहित रहती है -

       गहन शांति।


     जहाँ तक संभव हो -

    सबके साथ सौहार्द बनाए रखो,

    अपने स्वाभिमान से समझौता किए बिना।


     सरल और शांत स्वर में कहो अपनी बात,

    और दूसरों की भी धैर्यपूर्वक सुनो,

     चाहे वे नीरसता और अज्ञानता से भरी हों -

    क्योंकि हर व्यक्ति के पास -

  अपनी एक अलग कहानी होती है -


आक्रामक और उपद्रवी लोगों से बच कर रहो -

    वे तुम्हारे मन की शांति भंग कर देते हैं,

    अपनी तुलना दूसरों से मत करो,

  क्योंकि  यदि तुम ऐसा करोगे,

   तो कभी अभिमान का अनुभव होगा,

    और कभी हीनता का, क्योंकि -

  तुमसे अधिक और तुमसे कम सफल लोग -

          संसार में हमेशा ही रहेंगे।


   अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का आनंद लो,

   और अपने व्यवसाय में  रूचि बनाए रखो,

    चाहे वह कितना ही साधारण हो,

    समय के निरंतर बदलते प्रवाह में -

     वही तुम्हारी नैया पार लगाएगा ।


        कामकाज सम्बन्धी व्यवहार में सावधान रहे,

        क्योंकि यह दुनिया छल - छद्म  से भरी है।

        किन्तु उन अच्छाइयों से विमुख न हो जाना,

         जो तुम्हारे चारों ओर विद्यमान हैं -

         अनेक लोग  उच्च आदर्शो के लिए -

          सतत प्रयत्नशील हैं इस विश्व - मंच पर-

             वीर और आदर्श नायकों की यहाँ -

                    कोई कमी नहीं।


           तुम जैसे हो वैसे ही बने रहो-

            अपने प्रति सदैव ईमानदार,

           विशेषतः प्रेम के विषय में --

            न प्रेम  का दिखावा करो -

           और न ही उसके प्रति संशय पालो,

          क्योंकि जीवन की समस्त शुष्कता-

           और निराशा के बावजूद-- 

          दूब घास की तरह  शाश्वत -

              और जीवंत रहता है प्रेम।

            

       बीतते वर्षों से मिलती सलाह को- 

           शालीनता से स्वीकार करो,

          और  विदा करो गरिमापूर्वक -

          युवावस्था के मोह को।

        

          आत्म -बल  को बढ़ाते रहो निरंतर -

         ताकि अकस्मात  आने वाली विपदा का,

          दृढ़ता से सामना  किया जा सके.

         किन्तु काल्पनिक आशंकाओं  से,

          स्वयं को व्यथित  मत करो।

          जीवन में अधिकांश  भय --

          थकान और  अकेलेपन से जन्म लेते हैं। 


      समुचित अनुशासन में  जीते हुए,

          स्वयं के प्रति भी सदैव  दयालु रहो,

          तुम इस ब्रह्माण्ड की संतान हो -

       धरती के समस्त वृक्षों और आकाश के तारों की तरह - 

         तुम्हें भी पूरा अधिकार है यहाँ रहने का।


          और चाहे तुम्हें  यह स्पष्ट हो या न  हो,

                यह ब्रह्माण्ड उसी प्रकार आगे बढ़ रहा है,

                        जैसा इसे बढ़ना चाहिए।


             इसलिए ईश्वर के साथ शांति से रहो - 

             जिस रूप में भी तुम उसे मानते हो,

          तमाम उलझनों और आकांक्षाओं के बीच-

                जीवन के इस कोलाहल में,

              अपनी आत्मा में शांति बनाए रखो.


     सच तो यह है कि तमाम कपट, थकावट 

               और टूटे सपनों के बावज़ूद --

               यह एक सुन्दर दुनिया है, 

            प्रसन्न रहो, और हर परिस्थिति में -

            प्रसन्न रहने का प्रयास करते रहो।


                                                                                     


             A  transcreation of the poem' Desiderata' --  Max                                              Ehrmann1832--1945)

         मैक्स अहरमैन की यह कविता  जीवन को शांति, संतुलन, आत्मसम्मान और विवेक के साथ जीने की प्रेरणा देने वाली रचना है. कविता संसार की आपा -धापी  और प्रतिस्पर्धा के बीच सद्भाव रखने के साथ-साथ अपनी गरिमा और व्यक्तित्व का  सम्मान करना सिखाती है। जीवन में सफलता और असफलता, सुख और दुःख -- सभी परिस्थितियों को संतुलित दृष्टि से स्वीकार करने का सन्देश इसमें निहित है. डेसीडेराता आज भी एक शांत, सार्थक और मानवीय जीवन के लिए मार्गदर्शक सन्देश के रूप में प्रासंगिक है।


    




     

Sunday, 19 July 2026

क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी.....

                 



                    क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी मृत्यु के लिए..


                            दुनियादारी  के चक्र में बँधी -

                             मैं बस चलती चली जा रही थी -

                              मानो रुकने की तो क्या -

                             मरने की भी फुर्सत -

                              नहीं थी मेरे पास।


                           तभी वह  सौम्य सा सारथि --

                            स्वयं मेरे पास आ रुका -

                             मुझे अपने साथ चलने का -

                            स्नेहिल निमंत्रण देता हुआ।


                            उसके रथ में यूँ तो हम दो ही थे -

                              किन्तु कोई एक और  भी -

                          अदृश्य रूप में उपस्थित थी वहाँ -

                              सर्व-कालिक, अशरीरी और-

                              चिर -रहस्यमयी -- "अमरता "।


                            हम धीरे, धीरे आगे बढ़ते रहे -

                            उसे कोई जल्दी नहीं थी --

                            और उसके सौजन्यपूर्ण निमंत्रण पर -

                             मैं भी पीछे छोड़ आई थी -

                             अपनी सारी व्यस्ततायें और आकांक्षायें।


                           हम गुज़रे एक स्कूल के पास से -

                           जहाँ भोजनावकाश में -

                            गोल घेरा बनाकर -

                             हँसते, खेलते बच्चे -

                             एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे।


                         फिर और आगे बढ़े -

                        पके हुए धान के खेतों के पास से -

                        डूबते हुए सूरज को पीछे छोड़ते हुए -

                        या शायद वही हमें छोड़ कर चला गया था।        

   

                       गहराते अँधेरे के साथ -

                        ओस की बूँदें गिरने लगीं थीं -

                       सिर्फ एक पतले गाउन और हल्के स्कार्फ में -

                       ठण्ड से सिहरने लगीं थी मैं.


                      तभी हम आकर रुक गये -

                      एक ऐसे घर के सामने -

                      जो धरती पर बस एक उभार सा लगता था -

                       जिसकी छत भी मुश्किल से दिखती थी -

                      और नींव तो मानो कहीं गहराई में दबी हो।


                      उस दिन के बाद न जाने -

                     कितनी सदियाँ बीत गयी हैं -

                     फिर भी लगता है मानों वह सब -

                     कल की ही बात हो।



                    उसी दिन मैंने जाना था यह रहस्य 

                    कि उस रथ के घोड़ों के मुख -

                    अमरत्व की दिशा में थे  जहाँ --

                     मेरा अपना ही स्थायी घर था, --

                      चिर - विश्राम के लिये।



             Emily Dickinson's   (1830- 1886 )    की  कविता   --"Because I could Not                        Stop For Death"--मृत्यु और  समय के  रहस्य पर आधारित उनकी सर्वाधिक  प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। कवयित्री मृत्यु को भयावह रूप में प्रस्तुत करने के बजाय एक शांत और विनम्र सहयात्री के रूप में देखती है जो जीवन - यात्रा को एक अन्य आयाम की ओर ले जाती है। यात्रा के विभिन्न दृश्य जीवन की अलग - अलग अवस्थाओं और समय के अनवरत प्रवाह का प्रतीक बन जाते हैं। कविता मृत्यु के प्रति एक गहन, शांत और दार्शनिक दृष्टि प्रस्तुत करती है तथा जीवन की क्षणभंग़ु रता  और अनंतता के रहस्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।