जब भी मैं सोचता हूँ कि कैसे -
मेरे नयनों की ज्योति बुझ गई है
मुझे एक अँधेरी दुनिया में
जीने के लिए छोड़ कर
जबकि अभी तो मैंने -
आधा जीवन भी नहीं जिया है।
और वह प्रतिभा --
जिसे केवल मृत्यु ही छिपा सकती है --
मेरे भीतर निष्फल पड़ी है,
यद्यपि मेरी आत्मा पहले से भी अधिक उत्सुक है,
उसके माध्यम से अपने प्रभु की सेवा करने को,
ताकि मैं ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत कर सकूँ
अपने किए कामों का सच्चा लेखा - जोखा
और बच सकूँ उसकी अप्रसन्नता से।
मैं व्याकुल होकर स्वयं से पूछता हूँ --
" क्या ईश्वर मुझसे अपेक्षा करता है -
दिनभर काम करने की -
जबकि मेरे जीवन में प्रकाश ही नहीं रहा? "
ऐसे समय में मेरा धैर्य प्रकट होकर
इन शिकायत भरे विचारों को -
रोक देता है,
अपने विवेक पूर्ण उत्तर से।
वह कहता है
कि ईश्वर को आवश्यकता नहीं है
मनुष्य की सेवा की -
अथवा अपने दिए उपहारों की
ईश्वर के दिए कार्यों को उचित ढंग से करना ही
उसकी सबसे उत्तम सेवा है।
वह तो राजाओं की भाँति शक्तिमान है,
जिसके आदेशों का पालन करने को
हज़ारों सेवक प्रतिदिन दौड़ते रहते हैं
धरती और सागरों के ऊपर -
बिना विश्राम किये।
किन्तु, केवल वे ही नहीं करते ईश्वर की सेवा
क्योंकि उसकी सेवा में रहते हैं वे भी
जो धैर्य पूर्वक खड़े रहकर
उसके आदेश की प्रतीक्षा करते हैं।
जॉन मिल्टन की कविता का भावानुवाद

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