मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी -
पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -
किसी बादल की तरह।
तभी अचानक मैंने देखा झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ --
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते -
तारों की तरह वे भी फैले हुए थे-
झील के किनारे, दूर तलक -
एक अनंत रेखा में सजे हुए।
एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ --
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते,
झूमते, नाचते।
यूँ तो उनके पास ही झील में -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु इन पीले फूलों की ख़ुशी -
उनकी चमक को कहीं पीछे छोड़ रही थी।
ऐसी आनंदमयी संगति में भला -
कवि कैसे न प्रमुदित होता?
मैं वहाँ खड़ा, खड़ा निहारता रहा -
निहारता ही रहा देर तक --
बिना यह सोचे की उसने मुझे -
किस अपूर्व आनंद - धन से-
समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद,
जब भी मैं होता हूँ फुर्सत के पलों में,
अथवा गहन विचारों में डूबा हुआ,
वे सुन्दर फूल मेरे कल्पना - लोक में -
एकांत के उसअद्भुत आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
और आह्लाद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को इस तरह-
कि वह भी नाच उठता है उनके साथ
अनायास ही!!
![]() |

No comments:
Post a Comment