एक विराट रंगमंच है यह समूचा संसार,
और सारे नर - नारी हैं -
इस पर होने वाले विचित्र नाटक के -
मात्र अभिनेता।
वे करते हैं प्रवेश इस पर बारी -बारी -
और उतर जाते हैं नीचे -
अपनी -अपनी भूमिकायें निभाकर।
यह नाटक खेला जाता -
सात अवस्थाओं में -
और हर मनुष्य अपने जीवन - काल में
निभाता भिन्न - भूमिकायें।
रंगमंच पर सबसे पहले -
दिखाई देता वह -
नवजात शिशु के रूप में,
नर्स की बांहों में रोता, मिमियाता,
मुँह से दूध उलीचता।
फिर आता स्कूली बालक बनकर -
पीठ पर बस्ता लादे -
उजला मुख, पर अनमने भाव लिए -
घोंघे सी रेंगती चाल में -
स्कूल की ओर बढ़ता हुआ।
अगली बार होता एक प्रेमी वह -
आग की भट्टी से निकलती हवा जैसी -
गरम साँसे भरता हुआ -
अपनी प्रेयसी की सुंदरता की याद में -
एक दुःख भरा प्रेमगीत गाता हुआ।
चौथी अवस्था में वह बनता एक सैनिक -
तेन्दुए सी घनी दाढ़ी सजाए -
अजीब - अजीब सी कसमें खाता हुआ -
अति संवेदनशील आत्म -सम्मान के प्रति,-
अचानक क्रोध में भर उठने वाला -
क्षणभंगुर यश की प्राप्ति के लिए,
तोप के मुँह में भी जाने को तत्पर।
पाँचवी भूमिका होती न्यायाधीश की -
सुस्वादु व्यंजनों से पोषित -
भरा - पूरा शरीर लिए,
गंभीर ऑंखें, करीने से सजी दाढ़ी में -
नीति - वचनों और जीवन - सूक्तियों के संग -
समसामायिक उदाहरणों का पुट देता -
भरपूर आत्मविश्वास से, पूरी गरिमा के साथ -
निभाता अपना शानदार किरदार।
छठी अवस्था में वह दिखता दुबला - पतला -
ढीले - ढाले, बदन पर झूलते से कपड़ों में -
नाक पर खिसकती ऐनक और लटकते गालों वाला।
जवानी के समय के सहेज कर रखे मौजे -
अब बड़े पड़ जाते हैं उसके सिकुड़े पैरों के लिए।
भारी, कड़क आवाज़ अब बदलने लगती है -
बच्चों की जैसी कोमल तुतलाहट में,
और कभी अस्पष्ट सी फुसफुसाहट,
तो कभी सीटी - सी ध्वनि बनकर,
निकलती है मुँह से।
और अंत में घटित होता इस रंगमंच पर -
विचित्र घटनाओं से भरे जीवन - नाटक का-*
वह करुण दृश्य --
जब बिना दाँत, बिना स्वाद, बिना दृष्टि के --
नितांत असहाय हो कर -
जीने लगता वह इसी जीवन में,
दूसरा बचपन!!
A transcreation of 'The Seven Ages Of Man ' --- William Shakespeare 1564- 1616
विलियम शेक्सपियर की यह कविता मानव - जीवन को एक रंगमंच और मनुष्य को उस मंच के अभिनेता के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि मनुष्य के जन्म से वृद्धावस्था तक के जीवन को सात अवस्थाओं में विभाजित करते हुए उसके बदलते स्वभाव, भूमिकाओं और अनुभवों का चित्रण करता है। बाल्यावस्था से प्रारम्भ होकर युवावस्था व अधेडावस्था से गुजरते हुए वृद्धावस्ता तक की यह यात्रा समय की अनिवार्य गति को दर्शाती है। कविता जीवन की क्षणभंग़ुरता के साथ -साथ मानव अस्तित्व के विभिन्न रूपों और जीवन - चक्र की शाश्वत सार्वभौमिकता पर गहन चिंतन प्रस्तुत करती है।
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