जब - जब मैं भागता हूँ उन चीज़ों के पीछे
जिन्हें मैं अपने लिए वांछनीय समझता हूँ
तब -तब मेरा जीवन निराशा और भ्रम के
अंधकार से भर जाता है।
किन्तु यदि उनके पीछे भागना बन्द कर
ठहर जाता हूँ अपनी जगह धैर्य पूर्वक --
तो जो भी मुझे चाहिए --
मेरी ओर स्वतः ही प्रवाहित होने लगता है
बिना किसी कष्ट के।
यह अनुभव मुझे सिखाता है
कि जिसे मैं पाना चाहता हूँ
वह भी आना चाहता है मेरे पास,
वह भी मुझे ढूँढ़ रहा है,
और खींच रहा है अपनी ओर।
एक गहरा रहस्य छिपा है इस बात में
उन सबके लिए
जो इसे समझ सकते हैं।
सूफ़ी कवि रूमी की कविता का भावानुवाद

No comments:
Post a Comment