Monday, 3 August 2026

Trees --- Joyce Kilmer वृक्ष (भावानुवाद )

मुझे लगता है कि मैं -

शायद ही कभी देख पाऊँगा 

 वृक्ष -सी सुन्दर किसी कविता को।


वृक्ष, जिसका मुँह सदा  सटा रहता है -

धरती माँ की छाती से-

अमृत- तुल्य   जीवन -रस का -

पोषण लेता हुआ।


वह, जो दिन भर देखता रहता है ईश्वर को -

अपनी पत्तों से लदी बाहें  -

प्रार्थना की मुद्रा में उठाये हुए 



जिसकी घनी शाखाओं के बीच -

बनाती है बुलबुल अपना घरौंदा-

हर ग्रीष्म ऋतु में.


  जिसकी फूलों से भरी डालियों पर -

  विश्राम करती है शीत ऋतु में बर्फ़ -

  और वर्षा जिसके साथ  रहती है --

     अंतरंग सखी की तरह।


    सच  है, कवितायें तो   बना लेते हैं-

    मुझ जैसे मूर्ख भी, किन्तु--

   केवल ईश्वर ही कर सकता है -

    एक वृक्ष की रचना।

















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