मुझे लगता है कि मैं -
शायद ही कभी देख पाऊँगा
वृक्ष -सी सुन्दर किसी कविता को।
वृक्ष, जिसका मुँह सदा सटा रहता है -
धरती माँ की छाती से-
अमृत- तुल्य जीवन -रस का -
पोषण लेता हुआ।
वह, जो दिन भर देखता रहता है ईश्वर को -
अपनी पत्तों से लदी बाहें -
प्रार्थना की मुद्रा में उठाये हुए
बनाती है बुलबुल अपना घरौंदा-
हर ग्रीष्म ऋतु में.
जिसकी फूलों से भरी डालियों पर -
विश्राम करती है शीत ऋतु में बर्फ़ -
और वर्षा जिसके साथ रहती है --
अंतरंग सखी की तरह।
सच है, कवितायें तो बना लेते हैं-
मुझ जैसे मूर्ख भी, किन्तु--
केवल ईश्वर ही कर सकता है -
एक वृक्ष की रचना।

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