Monday, 3 August 2026

वृक्ष -- एक सुन्दर कविता

मुझे लगता है कि मैं -

शायद ही कभी देख पाऊँगा -

 वृक्ष -सी सुन्दर किसी कविता को।


वृक्ष, जिसका मुँह सदा  सटा रहता है -

धरती माँ की छाती से-

अमृत- तुल्य   जीवन -रस का -

पोषण लेता हुआ।


वह, जो दिन भर देखता रहता है ईश्वर को -

अपनी पत्तों से लदी बाहें  -

प्रार्थना की मुद्रा में उठाये हुए 



जिसकी घनी शाखाओं के बीच -

बनाती है बुलबुल अपना घरौंदा-

हर ग्रीष्म ऋतु में.


  जिसकी फूलों से भरी डालियों पर -

  विश्राम करती है शीत ऋतु में बर्फ़ -

  और वर्षा जिसके साथ  रहती है --

     अंतरंग सखी की तरह।


    सच  है, कवितायें तो   बना लेते हैं-

    मुझ जैसे मूर्ख भी, किन्तु--

   केवल ईश्वर ही कर सकता है -

    एक वृक्ष की रचना।




Transcreated from 'Trees'-- Joyce Kilmer ( 1886-- 1918 )

 जॉयस किलमेर की यह कविता 'Trees ' प्रकृति के प्रति श्रद्धा और उसकी सहज,  दिव्य सुंदरता की अभिव्यक्ति है। कवि वृक्ष को केवल प्रकृति की एक सुन्दर रचना नहीं बल्कि 
ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का जीवंत प्रतीक मानता है। वृक्ष धरती से जुड़ा होने पर भी आकाश की ओर उन्मुख है और अपनी विनम्रता और उपयोगिता में जीवन के गहरे अर्थ समेटे हुए है। कविता मनुष्य द्वारा रचित कला और प्रकृति की स्वाभाविक सृष्टि के बीच अंतर को भी रेखांकित करती है तथा यह भाव व्यक्त करती है कि प्रकृति की पूर्णता और सौंदर्य ईश्वर की ही अनुपम  देन हैं ।                                                                                                             









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