अधूरा जीवन मत जियो.
और न ही मरो अधूरी मृत्यु
शांत रहना चुनो
तो पूरी तरह शांत रहो
किन्तु जब बोलना हो
तो तब तक बोलते रहो
जब तक तुम्हारी बात
पूरी न हो जाए.
यदि स्वीकार करते हो किसी बात को
तो अपनी स्वीकृति को,
स्पष्ट रूप से व्यक्त करो
न कि किसी आवरण में छिपा कर।
यदि अस्वीकार करते हो
तो भी स्पष्ट रहो ऐसा करने में
क्योंकि अस्पष्ट अस्वीकार --
एक कमज़ोर स्वीकार जैसा ही होता है.
अधूरे समाधान को स्वीकार न करो
और न ही विश्वास करो अधूरे सत्य पर
अधूरे सपने मत देखो, और न कल्पना करो
अधूरी आशाओं के पूरे होने की।
अधूरा रास्ता तुम्हें कहीं नहीं पहुँचाएगा
याद रहे तुम स्वयं एक पूर्ण अस्तित्व हो
जो इस संसार में आया है
एक पूर्ण जीवन जीने के लिए
अधूरा रह जाने के लिए नहीं।
Transcreated from the poem " Do Not Live a Half Life " by Khalil Gibran
खलील जिब्रान (1883- 1931) की यह विचारोत्तेजक रचना मनुष्य को अधूरेपन, भय और अनिर्णय के साथ जीने से सावधान करती है। जिब्रान का सन्देश है कि जीवन को आधे मन से स्वीकार करने के बजाय व्यक्ति को अपने विचारों, सपनों और निर्णयों के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। यह कविता हमें साहस, आत्मविश्वास और पूर्णता के साथ जीवन जीने कि प्रेरणा देती है और याद दिलाती है कि जीवन की सार्थकता केवल अस्तित्व में नहीं बल्कि सजगता और मनोयोग से जीने में है।

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