मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी
जैसे पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरता
कोई बादल..
तभी अचानक मैंने देखा --
झील के किनारे
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
हवा के झोंकों के साथ -
झूमता, नाचता हुआ।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते
तारकों की तरह, वे भी --
फैले हुए थे झील के किनारे,- दूर तक
एक अनंत रेखा में।
एक ही नज़र में मैंने देखा
दस हज़ार फूलों को एक साथ
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते-
झूमते, नृत्य करते।
यूँ तो उनके पास ही
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं
किन्तु उनकी चमक को
कहीं बहुत पीछे छोड़ रही थी
इन पीले फूलों की ख़ुशी।
ऐसी आनंदमयी संगति में
भला कवि कैसे प्रसन्न न होता?
उस मनोरम दृश्य को
मैं निहारता रहा,
निहारता ही रहा देर तक
बिना यह सोचे कि उसने मुझे
किस अपूर्व आनंद -धन से
समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद
जब भी मैं फुर्सत के क्षणों में
अथवा गहन विचारों में डूबा होता हूँ
वे सुन्दर फूल, मेरी कल्पना में,
एकांत के उस वरदान में --
एक बार फिर खिल उठते हैं
और आनंद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को
कुछ इस तरह कि वह स्वयं भी
नाचने लगता है उनके साथ।
A transcreation of "I wandered lonely as a Cloud " by William Wordsworth

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