अप्रतिम है तुम्हारा सौंदर्य, प्रिय !
किससे तुलना करुँ मैं इसकी?
क्या ग्रीष्म के किसी सुहाने दिन से?
किन्तु नहीं!
तुम कहीं अधिक सुन्दर हो उससे--
शांत और निश्छल!
मई के महीने की उग्र हवायें,
झकझोर देतीं कोमल कलिकाओं को,
और फिर ग्रीष्म की अपनी अवधि भी तो -
कितनी अल्प होती है न !
कभी - कभी अधिक गर्म हो जाता है सूरज,
उसके सुनहरे चेहरे की वह चमक
अक्सर ही धूमिल पड़ जाया करती है
जब घिर जाता वह बादलों से.
यूँ तो हर सुन्दर मनुष्य की सुंदरता
एक दिन ढल ही जाती है
संयोग से, या प्रकृति की --
निश्चित परिवर्तनशीलता में,
किन्तु तुम्हारा शास्वत ग्रीष्म -
कभी निष्प्रभ नहीं होगा,
और न ही तुम कभी खोओगे -
अपनी स्वाभाविक सुंदरता को।
न कभी मृत्यु अभिमान कर पायेगी
कि तुम उसकी छाया में घूमते रहते हो
जब तुम, समय की सीमाओं से दूर --
इस कविता की पंक्तियों में रहोगे तो --
जब तक इस संसार में लोग साँसें लेते रहेंगे
और रहेगी ज्योति उनकी आँखों में,
जब तक मेरी यह कविता जियेगी
निश्चित ही तुमको भी जीवित रखेगी।
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