क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी मृत्यु के लिए..
दुनियादारी के चक्र में बँधी -
मैं बस चलती जा रही थी दिन रात -
मानो रुकने की तो क्या -
मरने की भी फुर्सत -
नहीं थी मेरे पास।
तभी वह अपरिचित रथसवार -
स्वयं मेरे पास आ रुका -
मुझे अपने साथ चलने का -
विनम्र निमंत्रण देता हुआ।
उसके रथ में यूँ तो हम दो ही थे -
किन्तु एक और शक्ति भी
अदृश्य रूप में उपस्थित थी वहाँ -
सर्व-कालिक, अशरीरी और
चिर -रहस्यमयी -- "अमरता "।
हम धीरे, धीरे आगे बढ़ते रहे -
उसे कोई जल्दी नहीं थी --
और उसके सौजन्य भरे निमंत्रण पर -
मैं भी पीछे छोड़ आई थी -
अपनी सारी व्यस्ततायें और आकांक्षायें।
हम गुजरे एक स्कूल के पास से -
जहाँ भोजनावकाश में -
गोल घेरा बनाकर -
हँसते, खेलते बच्चे -
एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे।
फिर और आगे बढ़े -
पके हुए धान के खेतों के पास से -
डूबते हुए सूरज को पीछे छोड़ते हुए -
या शायद वही हमें छोड़ कर चला गया था।
गहराते अँधेरे के साथ -
ओस की बून्दे गिरने लगीं थीं -
सिर्फ एक पतले गाउन और हल्के स्कार्फ में -
ठण्ड से काँपने लगीं थी मैं.
तभी हम आकर रुक गये -
एक ऐसे घर के सामने -
जो धरती पर बस एक उभार सा लगता था -
जिसकी छत भी मुश्किल से दिखती थी -
और नींव तो मानो कहीं गहराई में दबी हो।
उस दिन के बाद न जाने -
कितनी सदियाँ बीत गयी हैं -
फिर भी लगता है मानों वह सब -
कल की ही बात हो।
उसी दिन मैंने जाना था यह रहस्य
कि उस रथ के घोड़ों के मुख -
अमरत्व की दिशा में थे. और -
जहाँ आकर वे रुके --
वह कुछ और नहीं मेरा अपना ही घर था, --
चिर - विश्राम के लिये।
A transcreation of Emily Dickinson's poem "Because I could Not Stop For Death"






