Induja
Wednesday, 26 August 2026
On Love ---- Khalil Gibran
Monday, 24 August 2026
Do Not Live A Half Life -- Khalil Gibran
अधूरा जीवन मत जियो.
और न ही मरो अधूरी मृत्यु
शांत रहना चुनो
तो पूरी तरह शांत रहो
किन्तु जब बोलना हो
तो तब तक बोलते रहो
जब तक तुम्हारी बात
पूरी न हो जाए.
यदि स्वीकार करते हो किसी बात को
तो अपनी स्वीकृति को,
स्पष्ट रूप से व्यक्त करो
न कि किसी आवरण में छिपा कर।
यदि अस्वीकार करते हो
तो भी स्पष्ट रहो ऐसा करने में
क्योंकि अस्पष्ट अस्वीकार --
एक कमज़ोर स्वीकार जैसा ही होता है.
अधूरे समाधान को स्वीकार न करो
और न ही विश्वास करो अधूरे सत्य पर
अधूरे सपने मत देखो, और न कल्पना करो
अधूरी आशाओं के पूरे होने की।
अधूरा रास्ता तुम्हें कहीं नहीं पहुँचाएगा
याद रहे तुम स्वयं एक पूर्ण अस्तित्व हो
जो इस संसार में आया है
एक पूर्ण जीवन जीने के लिए
अधूरा रह जाने के लिए नहीं।
When I Run After what Think I want --- Rumi
जब - जब मैं भागता हूँ उन चीज़ों के पीछे
जिन्हें मैं अपने लिए वांछनीय समझता हूँ
तब -तब मेरा जीवन निराशा और भ्रम के
अंधकार से भर जाता है।
किन्तु यदि उनके पीछे भागना बन्द कर
ठहर जाता हूँ अपनी जगह धैर्य पूर्वक --
तो जो भी मुझे चाहिए --
मेरी ओर स्वतः ही प्रवाहित होने लगता है
बिना किसी कष्ट के।
यह अनुभव मुझे सिखाता है
कि जिसे मैं पाना चाहता हूँ
वह भी आना चाहता है मेरे पास,
वह भी मुझे ढूँढ़ रहा है,
और खींच रहा है अपनी ओर।
एक गहरा रहस्य छिपा है इस बात में
उन सबके लिए
जो इसे समझ सकते हैं।
सूफ़ी कवि रूमी की कविता का भावानुवाद
Sunday, 23 August 2026
Let Go Of Your Worries - Rumi ---- अपनी चिंताओं को जाने दो
अपनी चिंताओं को जाने दो -
और बनो पूर्णतः निर्मल -हृदय -
एक दर्पण के सदृश -
जिसमें कोई छवि नहीं होती।
यदि तुम्हें एक स्वच्छ दर्पण चाहिए -
तो अपने आप को देखो -
और देखो उस निर्लज्ज सच्चाई को -
जो दर्पण तुम्हें दिखाता है।
और सोचो --
यदि धातु का एक टुकड़ा -
चमकाया जा सकता है -
एक दर्पण की तरह -
तो हृदय के दर्पण को चमकाने के लिए -
तुम्हें क्या चाहिए होगा?
सूफ़ी कवि रूमी की कविता का भावानुवाद
Friday, 21 August 2026
वे नरगिस के फूल
मैं भटक रहा था वहाँ अकेला -
पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -
किसी बादल की तरह।
तभी मैंने देखा झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ --
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते -
तारों की तरह वे भी फैले हुए थे-
झील के किनारे, दूर तलक -
एक अनंत रेखा में सजे हुए।
एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ --
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते,
झूमते, नाचते।
यूँ तो उनके पास ही झील में -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु इन पीले फूलों की ख़ुशी -
उनकी चमक को कहीं पीछे छोड़ रही थी।
ऐसी आनंदमयी संगति में भला -
कवि कैसे न प्रमुदित होता?
मैं वहाँ खड़ा, खड़ा निहारता रहा -
निहारता रहा देर तक --
बिना यह सोचे कि उसने मुझे -
किस अपूर्व आनंद - धन से-
समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद,
जब भी मैं होता हूँ फुर्सत के पलों में,
अथवा गहन विचारों में डूबा ,
वे सुन्दर फूल मेरे कल्पना - लोक में -
एकांत के उसअद्भुत आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
और आह्लाद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को इस तरह-
कि वह भी नाच उठता है उनके साथ
अनायास ही!!
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Thursday, 20 August 2026
वे नरगिस के फूल
मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी -
पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -
किसी बादल की तरह।

तभी अचानक मैंने देखा --
झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ -
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते-
तारों की तरह वे भी फैले हुए थे -
झील के किनारे,- दूर तक --
एक अनंत रेखा में।
एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ -
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते-
झूमते, नृत्य करते।
यूँ तो उनके पास ही -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु उनकी चमक को -
बहुत पीछे छोड़ रही थी -
इन पीले फूलों की ख़ुशी।
ऐसी आनंदमयी संगति में भला --
कवि कैसे प्रसन्न न होता?
उस मनोरम दृश्य को -
मैं निहारता रहा,
निहारता रहा देर तक -
बिना यह सोचे कि उसने मुझे -
किस अपूर्व आनंद -धन से -
समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद -
जब भी मैं फुर्सत के क्षणों में -
अथवा गहन विचारों में डूबा होता हूँ-
वे सुन्दर फूल, मेरी कल्पना में,
एकांत के उस आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
और आह्लाद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को -
इस तरह कि वह भी अनायास ही
नाच उठता है उनके साथ।
A transcreation of "I wandered lonely as a Cloud " by William Wordsworth
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Sunday, 16 August 2026
The Guest House ---- अतिथि - गृह (भावानुवाद )
मनुष्य होना भी ऐसा है --
जैसे कोई अतिथि - गृह होना!
जहाँ हर सुबह -
आता है एक नया मेहमान,
कभी ख़ुशी, कभी अवसाद
तो कभी नीचता के भाव लेकर.
और कभी -कभी क्षण भर के लिए -
आ जाती है जागरूकता भी -
किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !
तुम्हें करना होता है समुचित -
स्वागत -सत्कार सभी का,
क्योंकि यही तो धर्म है -
एक अच्छे मेज़बान का।
भले ही वे दुखों की भीड़ बनकर आयें
तुम्हारे घर को तहस - नहस कर डालें,
और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर।
तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,
कौन जाने वह तुम्हारे घर में -
किस नई ख़ुशी के लिए -
जगह बना रहा हो!
निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना
इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर,
हँसते हुए आमंत्रित करो उनको
अंदर आने के लिए।
आभार मानो उन सबका -
क्योंकि उन सब में हर एक को -
कहीं दूर से भेजा गया है,
तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।
A transcreation of sufi (mystc) poet Rumi's poem "The Guest House "





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