Induja
Saturday, 12 September 2026
Thursday, 10 September 2026
I Love all Beauteous Things --- Robert Bridges-- 1884-- 1930
संसार की समस्त सुन्दर वस्तुओं से प्रेम करता हूँ मैं
उन्हें खोजता हूँ और पूजता हूँ - --
ईश्वर की प्रशंसा करने का
इससे बेहतर कोई ढंग --
मुझे नहीं आता।
और आपा - धापी भरे इस जीवन में
इन्ही के द्वारा मिलता है मनुष्य को सम्मान।
चाहता हूँ, मैं भी बनाऊँ कुछ ऐसा
जो हो सुन्दर और सराहनीय
और आनंद का अनुभव करुँ
ऐसा करने में -
भले ही आने वाले कल में
मेरी रचनाएँ प्रतीत हों
नींद से जागने पर स्वप्न के निरर्थक शब्दों जैसी।
रौबर्ट ब्रिजेश (Robert Bridges --, 1844- 1930 ) की यह कविता सौंदर्य के प्रति प्रेम को एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि के लिए संसार की सुन्दर वस्तुओं को खोजना, उन्हें नमन करना, उनके माध्यम से ईश्वर की स्तुति करना -- ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा है। यहाँ केवल सुंदरता को देखने की आकांक्षा ही नहीं, अपितु स्वयं कुछ सुन्दर और सराहनीय रचने की विनम्र इच्छा भी व्यक्त होती है। कवि स्वीकार करता है कि भविष्य में उसकी रचनाएँ निरर्थक स्वपनों जैसी प्रतीत हो सकती हैं, फिर भी सृजन की उसकी आकांक्षा क्षीण नहीं होती।
Tuesday, 8 September 2026
Home they Brought her Warrior Dead --- Alfred Lord Tennyson
वे उसके योद्धा का निष्प्राण शरीर
घर लेकर आये थे -
किन्तु सब देखकर भी --
वह न तो मूर्च्छित हुई,
और न ही किया उसने -
करुण विलाप।
सारी सेविकायें स्तब्ध थीं उसकी स्थिति देख
"उसे रोना होगा, वरना वह मर जायेगी ",
उन्होंने कहा।
वे उस योद्धा की प्रशंसा करने लगीं
धीमी , कोमल आवाज़ में --
कि वह बहुत प्यारा इंसान था,
सबसे सच्चा दोस्त था और साथ ही-
एक आदर्श दुश्मन भी।
तब भी,वह न तो कुछ बोली -
और न तनिक भी विचलित हुई।
एक सेविका चुपचाप उठकर शव के पास गई,
और उसके चेहरे से कपड़ा हटा दिया,
फिर भी वह न तो हिली और न रोई।
तब,नब्बे वर्ष की lएक नर्स उठी -
और मृत योद्धा के बच्चे को लाकर --
रख दिया उसकी गोद में!
और लो!
ग्रीष्म के तूफान की तरह
आँसुओं की धारा बह निकली
उसकी आँखों से-
" मेरे प्यारे बच्चे! मैं जिऊँगी -
जिऊँगी तेरे लिए "--
कहते हुए।
Alfred Lord Tennyson (1809- 1892) की यह मार्मिक रचना युद्ध, प्रेम, शोक और मातृत्व की अद्भुत मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। कविता में एक वीर योद्धा की पत्नी अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर और उसके निष्प्राण शरीर को देखकर भी आँसू नहीं बहाती। उसके आस - पास उपस्थित लोग उसके इस अस्वाभाविक मौन से चिंतित हो उठते हैं. कई तरह के उपाय करने पर भी उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अंत में जब एक वृद्धा नर्स उसके नन्हें बच्चे को लाकर उसकी गोद में डाल देती है तो उसके भीतर दबा हुआ दुःख आँसुओं के रूप में फूट पड़ता है, और जाग उठता है जीवन जीने का संकल्प भी । कविता अत्यंत संवेदनशील ढंग से दर्शाती है कि गहनतम शोक के क्षणों में भी मातृत्व जीवन को थाम लेने की शक्ति और आगे बढ़ने के कारण प्रदान करता है।
Saturday, 5 September 2026
Life's Harmonies ---- Ella Wheeler Wilcox
किसी को भी यह प्रार्थना नहीं करनी चाहिए
कि उसे कभी कोई दुःख न पहुँचे
न ही यह कि वह सदा कष्टों से मुक्त रहे
क्योंकि आज की कड़वाहट ही
कल की मिठास है --
और एक पल की हानि
हो सकती है जीवन भर का लाभ।
किसी वस्तु का अभाव उसी तरह --
द्विगुणित कर देता है उसके मूल्य को
जैसे भूख की अग्नि बढा देती है
भोजन से मिली तृप्ति का सुख।
सुख के आगमन पर केवल वही ह्रदय,
मना सकता है सच्चे आनंद का उत्सव,
जिसने दुखों और कष्टों का भरपूर --
अनुभव किया हो।
दुःख, अभाव, तड़प और संघर्ष की
कटु, कठोर परीक्षाओं से --
किसी भी मनुष्य को भागना नहीं चाहिए
क्योंकि आत्मा के संगीत के सारे दुर्लभ राग
जीवन के इन्ही छोटे छोटे स्वरों में
मुखरित होते हैं।
( Life's Harmonies का भावानुवाद जीवन - संगीत )
एल्ला व्हीलर विलकॉक्स की यह कविता जीवन के सुख - दुःख,आशा - निराशा, और संघर्ष - विराम के बीच संतुलन को रेखांकित करती है. कवयित्री का विश्वास है कि जीवन की सम्पूर्णता केवल सुखद अनुभवों से नहीं बनती, इसके विविध और विपरीत अनुभव मिलकर ही जीवन का मधुर संगीत रचते हैं। जिस प्रकार संगीत में अलग - अलग स्वरों का सामंजस्य एक सुन्दर राग की रचना करता है, उसी प्रकार जीवन के प्रकाश और छाया, मिलन और विरह, सफलता और विफलता हमारे अनुभवों को सम्पूर्ण बनाते हैं। यह कविता हमें जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करने तथा प्रत्येक परिस्थिति में निहित सौंदर्य और सीख को पहचानने की प्रेरणा देती है।
Friday, 4 September 2026
गीतांजलि (11) Leave This Chanting
छोड़ो यह मंत्र- जाप , भजन- गान
और फेरना माला के मनकों का ।
मंदिर के बन्द द्वारों के अंदर -
इस निर्जन,अँधेरे कोने में बैठकर -
किसकी पूजा कर रहे हो तुम?
अपनी ऑंखें खोलो, और देखो --
तुम्हारा भगवान नहीं हैं
तुम्हारे सामने!
वह तो वहाँ है जहाँ कोई मजदूर
खोद रहा है कठोर भूमि को
और मार्ग बनाने वाला
तोड़ रहा है पत्थरों को
उन्हीं के साथ है तुम्हारा भगवान --
धूप में और वर्षा में -
और धूल से सन गए हैं उस के वस्त्र।
उस से मिलना हो तो -
अपनी पवित्र आवरण उतार कर -
चले आओ नीचे -
उसी धूल - मिट्टी में।
मुक्ति? कहाँ मिलने वाली हैं मुक्ति?
स्वयं हमारे प्रभु ने सहर्ष स्वीकार किए हैं -
इस सृष्टि के बंधन, और हम सब उसके साथ -
सदा, सदा के लिए बँधे हुए हैं
अपने ध्यान से बाहर आओ
अपने फूल और धूप
एक ओर रख दो।
क्या हानि है यदि तुम्हारे वस्त्र -
फट जाएँ और उन पर दाग पड़ जाएँ?
उस से मिलो --
और खड़े हो जाओ उसके साथ
परिश्रम में जुटकर,
माथे पर पसीना लिए ।
-
Leave This Chanting....
गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि ' से ली गई यह कविता बाह्य - आडम्बर पूर्ण पूजा और सच्ची आध्यात्मिकता के अंतर को स्पष्ट करती है। कवि मनुष्य को मन्त्र - जाप, माला फेरना और मंदिर की एकांत साधना तक ही सीमित न रहने का सन्देश देते हैं। उनके अनुसार ईश्वर जीवन के कर्मक्षेत्र में श्रमरत और संघर्षशील मनुष्यों के बीच विद्यमान हैं। अतः सच्ची उपासना संसार से विमुख होने में नहीं, अपितु मानवता के साथ जुड़कर श्रम और सेवा में सहभागी बनने में है। कविता का मूल सन्देश यह है कि ईश्वर की खोज जीवन से दूर जाकर नहीं अपितु जीवन की धूल -मिट्टी में उतर कर करनी चाहिए।
Tuesday, 1 September 2026
Crossing The Bar --- Alfred Tennyson
सूर्यास्त का समय -
और उदय होना सांध्य तारे का -
मानों एक स्पष्ट पुकार हो मेरे लिए -
उस पार से।
बस, इतना चाहता हूँ --
कि जब मैं सागर की ओर बढूँ -
तो तट पर मेरे लिए -
कोई शोक- रुदन न हो।
उस समय एक ऐसा ज्वार आए -
जो बहता हुआ होने पर भी
प्रतीत हो शांत और सोया- सा,
पूरी तरह शोर और झाग से मुक्त,
समुद्र की जिस गहराई से निकला -
उसी में लौटने को आतुर ।
गोधूलि की वेला में बजती -
संध्या की घंटी,
और फिर घना अंधकार!
चाहता हूँ कि ऐसे समय -
जब मैं शुरू करुँ अपनी यात्रा -
तो विदाई का दुःख न मनाया जाए।
भले ही वह बहाव मुझे ले जाए
समय और स्थान की सीमा से --
कहीं बहुत, बहुत दूर, किन्तु-
मैं आनंदित हूँ यह कल्पना करके
कि इस तटबंध को पार करने के बाद
मैं मिल सकूँगा अपने कर्णधार से
प्रत्यक्ष रूप में।
A transcreation of "Crossing The Bar " by Alfred Tennyson.
'Crossing the Bar' प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि अलफ्रेड लार्ड टेनीसन की अत्यंत मार्मिक और आध्यात्मिक कविता हैं. इसमें जीवन की अंतिम अवस्था को भय या विषाद के रूप में नहीं, बल्कि एक शांत और स्वाभाविक यात्रा के रूप में देखा गया है. समुद्र, ज्वार और बंदरगाहों के प्रतीकों के माध्यम से कवि इस संसार से अनंत की ओर प्रस्थान की अनुभूति करता है. कविता का सबसे सुन्दर भाव उस दृढ विश्वास में निहित है कि इस अंतिम यात्रा के पार कवि का मिलन अपने 'पायलेट ', अर्थात अपने परम मार्गदर्शक से होगा.
अपनी सरलता, गहन प्रतीकात्मकता और शांत स्वीकार्यता के कारण यह कविता विश्व साहित्य की अमर रचनाओं में गिनी जाती है, और यह मेरा विनम्र प्रयास है उस के भावों को हिन्दी के काव्य प्रेमियों तक पहुँचाने का।
Monday, 31 August 2026
On His Blindness-- John Milton
जब भी मैं सोचता हूँ कि कैसे -
मेरे नयनों की ज्योति बुझ गई है
मुझे एक अँधेरी दुनिया में
जीने के लिए छोड़ कर
जबकि अभी तो मैंने -
आधा जीवन भी नहीं जिया है।
और वह प्रतिभा --
जिसे केवल मृत्यु ही छिपा सकती है --
मेरे भीतर निष्फल पड़ी है,
यद्यपि मेरी आत्मा पहले से भी अधिक उत्सुक है,
उसके माध्यम से अपने प्रभु की सेवा करने को,
ताकि मैं ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत कर सकूँ
अपने किए कामों का सच्चा लेखा - जोखा
और बच सकूँ उसकी अप्रसन्नता से।
मैं व्याकुल होकर स्वयं से पूछता हूँ --
" क्या ईश्वर मुझसे अपेक्षा करता है -
दिनभर काम करने की -
जबकि मेरे जीवन में प्रकाश ही नहीं रहा? "
ऐसे समय में मेरा धैर्य प्रकट होकर
इन शिकायत भरे विचारों को -
रोक देता है,
अपने विवेक पूर्ण उत्तर से।
वह कहता है
कि ईश्वर को आवश्यकता नहीं है
मनुष्य की सेवा की -
अथवा अपने दिए उपहारों की
ईश्वर के दिए कार्यों को उचित ढंग से करना ही
उसकी सबसे उत्तम सेवा है।
वह तो राजाओं की भाँति शक्तिमान है,
जिसके आदेशों का पालन करने को
हज़ारों सेवक प्रतिदिन दौड़ते रहते हैं
धरती और सागरों के ऊपर -
बिना विश्राम किये।
किन्तु, केवल वे ही नहीं करते ईश्वर की सेवा
क्योंकि उसकी सेवा में रहते हैं वे भी
जो धैर्य पूर्वक खड़े रहकर
उसके आदेश की प्रतीक्षा करते हैं।
परिचय
'On His Blindness-' महान अंग्रेज़ कवि जॉन मिल्टन की अत्यंत मार्मिक और चिंतनशील रचना है। अपनी दृष्टि खो देने के बाद कवि के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या वह अब भी ईश्वर की अपेक्षाओं और उसके द्वारा प्रदत्त अपनी प्रतिभा के साथ न्याय कर सकता है। किन्तु आत्ममंथन के इन क्षणों में उसे एक गहरा आध्यात्मिक सत्य प्राप्त होता है -- कि ईश्वर को उसके बाहरी कर्मों से अधिक उसकी निष्ठा और समर्पण की आवश्यकता है।
कविता का अंतिम सन्देश अत्यंत प्रेरक है की जो लोग धैर्य पूर्वक ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करते हुए अपना कर्त्तव्य निष्ठा पूर्वक करते रहते हैं, वे भी उसकी सेवा ही करते हैं।






