Monday, 24 August 2026

When I Run After what Think I want --- Rumi


 जब - जब मैं भागता हूँ उन चीज़ों के पीछे 

जिन्हें मैं अपने लिए वांछनीय समझता हूँ 

तब -तब मेरा जीवन निराशा और भ्रम के

 अंधकार से भर जाता है।


किन्तु यदि उनके पीछे भागना बन्द कर 

 ठहर जाता हूँ अपनी जगह धैर्य पूर्वक --

तो जो भी मुझे चाहिए --

 मेरी ओर स्वतः ही  प्रवाहित होने लगता है 

बिना किसी कष्ट के।


यह अनुभव मुझे सिखाता है 

कि जिसे मैं पाना चाहता हूँ 

वह भी आना चाहता है मेरे पास,

वह भी मुझे ढूँढ़  रहा है, 

और खींच रहा है अपनी ओर।


एक गहरा रहस्य छिपा है इस बात में 

उन सबके लिए 

जो इसे समझ सकते हैं।




सूफ़ी कवि रूमी की कविता  का भावानुवाद  

Sunday, 23 August 2026

Let Go Of Your Worries - Rumi ---- अपनी चिंताओं को जाने दो


अपनी चिंताओं को जाने दो -

और बनो पूर्णतः निर्मल -हृदय -

एक दर्पण के सदृश -

जिसमें कोई छवि नहीं होती।


 यदि तुम्हें एक स्वच्छ दर्पण चाहिए -

तो अपने आप को  देखो -

और देखो उस निर्लज्ज सच्चाई को -

जो दर्पण तुम्हें दिखाता है।

और सोचो -- 

यदि धातु का एक टुकड़ा -

चमकाया जा सकता  है -

एक दर्पण की तरह -

तो हृदय के दर्पण को चमकाने के लिए -

 तुम्हें क्या चाहिए होगा?




सूफ़ी कवि  रूमी की कविता का भावानुवाद 

Friday, 21 August 2026

वे नरगिस के फूल

                                                     

           मैं  भटक रहा था वहाँ अकेला -

          पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते  -

           किसी बादल की तरह।


     तभी मैंने देखा झील के किनारे खिले -

      सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -

      जो हवा के झोंकों  के साथ -- 

     झूमता हुआ नाच रहा था।


         अद्भुत दृश्य था वह!

      आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते -

        तारों की तरह वे भी फैले हुए थे-

         झील के किनारे, दूर तलक -

         एक अनंत रेखा में सजे हुए।


          एक ही नज़र में मैंने देखा -

         दस हज़ार फूलों को  एक साथ -- 

         आनंद में डूबे हुए,

         एक साथ सिर हिलाते,

              झूमते, नाचते।


           यूँ तो उनके पास ही झील में -

            लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -

           किन्तु इन पीले फूलों की ख़ुशी -

       उनकी चमक को कहीं पीछे छोड़ रही थी।


             ऐसी आनंदमयी संगति में भला -

               कवि कैसे न प्रमुदित  होता?



                 मैं वहाँ खड़ा, खड़ा निहारता रहा -

                 निहारता रहा देर तक --

                  बिना यह सोचे कि उसने मुझे -

                 किस अपूर्व आनंद - धन से-

                   समृद्ध कर दिया है।

                    क्योंकि उस दिन के बाद,

                   जब भी मैं होता हूँ फुर्सत  के पलों में,

                    अथवा  गहन विचारों में डूबा ,

                    वे सुन्दर फूल मेरे कल्पना - लोक में - 

                     एकांत के उसअद्भुत आनंद में --

                     एक बार फिर खिल उठते हैं,

                    और आह्लाद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को इस तरह-

                     कि वह भी नाच उठता है उनके साथ

                      अनायास ही!!




"I wandered lonely as a cloud " .....  William Wordsworth's poem 
Transcreated into Hindi 

Thursday, 20 August 2026

वे नरगिस के फूल

   मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी -

    पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -

    किसी  बादल  की तरह।


 तभी अचानक मैंने  देखा --
 झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ -
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते-
 तारों की तरह वे भी फैले हुए थे -
 झील के किनारे,- दूर तक --
  एक अनंत रेखा में।
 एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ -
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते-
झूमते, नृत्य करते।
यूँ तो उनके पास ही -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु उनकी  चमक को -
 बहुत पीछे छोड़  रही थी -
 इन पीले फूलों की ख़ुशी।
  ऐसी आनंदमयी  संगति में भला --
 कवि कैसे प्रसन्न न होता?
उस मनोरम दृश्य को -
 मैं निहारता रहा,
  निहारता  रहा देर तक -
  बिना यह सोचे  कि उसने मुझे -
 किस अपूर्व आनंद -धन से -
   समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद -
जब भी मैं फुर्सत के क्षणों में -
अथवा गहन विचारों में डूबा होता हूँ-
वे सुन्दर फूल, मेरी कल्पना में,
  एकांत के उस  आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
 और आह्लाद से  भर  देते हैं  मेरे ह्रदय को -
  इस तरह कि वह भी अनायास   ही 
   नाच उठता है उनके साथ।

A transcreation of "I wandered lonely as a Cloud " by William Wordsworth
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Sunday, 16 August 2026

The Guest House ---- अतिथि - गृह (भावानुवाद )


    मनुष्य होना  भी ऐसा है --

  जैसे कोई अतिथि - गृह होना!

   जहाँ हर सुबह -

   आता है एक नया मेहमान,

   कभी ख़ुशी, कभी अवसाद 

    तो कभी नीचता के  भाव लेकर.

    और कभी -कभी क्षण भर के लिए -

    आ जाती है जागरूकता भी -

   किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !


   तुम्हें करना होता  है समुचित -

 स्वागत -सत्कार सभी का,

  क्योंकि यही तो धर्म है -

  एक  अच्छे मेज़बान  का।


    भले ही वे दुखों की भीड़ बनकर आयें 

 तुम्हारे घर को तहस - नहस  कर डालें,

  और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर। 

  तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,

  कौन जाने वह तुम्हारे घर में -

   किस नई ख़ुशी  के लिए -

   जगह बना रहा हो!


     निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना 

     इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर, 

     हँसते हुए आमंत्रित करो उनको 

     अंदर आने के लिए।

     आभार मानो उन सबका -

     क्योंकि उन सब में  हर एक को -

     कहीं दूर से भेजा गया है,

     तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।


  A transcreation  of  sufi (mystc) poet Rumi's  poem                "The Guest House "

Saturday, 15 August 2026

On Children ----- Khalil Gibran

                                                    तुम्हारे  बच्चे 

      


        तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे नहीं हैं,

       वे तो जीवन की अपनी आकांक्षाओं  के -

       पुत्र -पुत्रियाँ हैं।

       वे दुनिया में  आते हैं तुम्हारे माध्यम से 

        पर  तुमसे नहीं,

        और भले ही वे तुम्हारे साथ हैं--

        उन पर  तुम्हारा  कोई अधिकार  नहीं।


        तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो -

        किन्तु  उन पर अपने विचार थोप नहीं सकते -

      अपने जीवन में आश्रय दे सकते हो उनके शरीर को 

       किन्तु उनकी आत्मा को नहीं,

       क्योंकि वह निवास करती है भविष्य के भवन में -

      जहाँ तुम कभी नहीं जा सकते,-- स्वप्न में भी।


          तुम उनके जैसा बनने का प्रयास कर सकते हो -

         किन्तु उन्हें अपने जैसा बनाने की इच्छा न करना -

          क्योंकि जीवन कभी पीछे की ओर नहीं जाता -

        और न ही कभी ठहरता है --

        बीते हुए कल के साथ।


             तुम  वह  धनुष हो, जिसके द्वारा  तुम्हारे बच्चे -

              भेजे जाते हैं आगे, जीवंत बाणों की तरह -

              वह अदृश्य धनुर्धर सुनिश्चित करता है -

               अनंत पथ  में कोई एक लक्ष्य --

              और फिर साधता है तुम्हे अपनी शक्ति से इस तरह,

               कि  वेग से दूर तक जा सकें उसके बाण.


                उस धनुर्धर के हाथों  सौंप देना

                 तुम स्वयं को सहर्ष  और 

                 निश्चिन्त  हो कर 

                क्योंकि  वह तुम्हे भी उतना ही प्यार करता है 

                 जितना उन दूर जाते बाणों को।



Thursday, 13 August 2026

The Solitary Reaper ----- Williaam Shakespeare हिंदी भावानुवाद भावानुवाद

   


 


   देखो!

  दूर  खेत में काम कर रही

  उस किसान - बाला को,

   जो अकेली ही फसल काट रही है  

  और अपने में ही खोई - सी --

 गाती जा रही है कोई दुखभरा गीत।

   थोड़ी देर रुको,

  या चुपचाप गुजर जाओ यहाँ से ।


    सुनो!

   कैसे यह सारी घाटी ही -

    भर उठी है उसके स्वरों की गूँज से।


   शायद ही किसी बुलबुल ने कभी -

   गाये हों इतने  कर्णप्रिय गीत -

 अरब के तपते रेगिस्तान में --

  छायादार आश्रय की तलाश में भटकते -

  थके - हारे  पथिकों के स्वागत में।


  वसंत ऋतु में 

  कोयल की आवाज़ भी 

  नहीं  सुनाई दी है कभी 

 इससे अधिक मधुर --

 जब वह गूँजती है 

 सुदूर हेब्रिडीज़ द्वीपों में -

समुद्र के सन्नाटे को -

   भेदती हुई।



क्या कोई मुझे बताएगा -

कि वह क्या गा रही है?

शायद इन करुण स्वरों का स्रोत -

सुदूर अतीत की स्मृतियों में  है -

जैसे कि बहुत पहले हुआ युद्ध,

या वर्तमान  की ही  कोई अप्रिय घटना --

 सहज मानवीय  दुःख, हानि,या पीड़ा -

जो पूर्व  में कष्ट का कारण रही हो -

 और पुनः  घटित हो सकती हो।

 

चाहे जो हो उसके गीत का विषय 

पर वह  इस तरह गा रही है   --

मानों वह कभी समाप्त नहीं होगा।



  मैंने देखा उसे काम करते हुए 

 अपने हँसिये पर झुके -झुके--

  और ठिठक कर वहाँ  खड़ा मैं 

 कुछ देर तक  सुनता रहा  उसका गीत,

 और फिर चलने लगा ऊपर  की  ओर,

  उस संगीत  को  ह्रदय में लिए --

   देर तक उसकी गूँज बनी रही मन में 

   सुनाई  देना बंद होने पर भी.