पतझड़ की ऋतु थी
और मैं गुजर रहा था
पीले पत्तों से आच्छादित
एक जंगल के रास्ते से।
एक जगह पहुँच कर
ठिठक गये मेरे कदम
क्योंकि वहाँ रास्ता बँट गया था
दो अलग, अलग दिशाओं में
और मैं, अकेला पथिक
चल नहीं सकता था
दोनों पर एक साथ।
इसलिए वहीं ठहर कर मैं
देर तक निहारता रहा,
जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी,
वहाँ तक, जहाँ वह रास्ता
झुरमुटों के बीच मुड़कर
ओझल हो गया था।
फिर मैंने दूसरे पथ को देखा
वह भी पहले जैसा ही सुन्दर, बल्कि -
कुछ अधिक ही आकर्षक लगा
क्योंकि उसकी मखमली घास
अब तक अनछुई प्रतीत होती थी
यद्यपि,वास्तव में दोनों ही रास्ते
समान रूप से
पद चिन्होँ से परिचित थे
और उस सुबह दोनों ही
सूखी पत्तियों से ढके हुए थे
एक समान
जिन पर किसी के भी
पद - चिन्ह नहीं पड़े थे।
बस, मैंने चुन लिया दूसरा रास्ता
पहले वाले को किसी और दिन-
के लिए छोड़ कर
यह जानते हुए भी कि हर रास्ता
आगे चलकर जा मिलता है
किसी नये रास्ते से
और मेरा यहाँ लौटकर आना
शायद ही संभव हो।
और वर्षों बाद
एक लम्बी साँस भरकर
मैं यह कथा सुना रहा होऊँगा
कि कैसे जंगल का वह रास्ता -
बँट गया था दो दिशाओं में
उनमें से मैंने चुना था वह मार्ग
जिस पर कम लोग चले थे
और उस फैसले ने ही बदल दिया है
मेरा जीवन।
A transcreation of the poem " The Road Not Taken" by Robert Frost.






