हे प्रचंड पश्चिमी पवन!.
तुम, जो साँस हो पतझड़ की --
जिसकी अदृश्य उपस्थिति -
सूखी पत्तियों को -
उड़ा ले जाती है बरबस -.
जादूगर से भयभीत -
प्रेतात्माओं की तरह!
पीली, काली, फीके और गहरे लाल रंग की -
महामारी की शिकार जैसी अनगिनत पत्तियों को
तुम पहुँचा देती हो उनकी -
अँधेरी, शीतकालीन समाधि में,
जहाँ वे पड़ी रहती हैं -
अपने पँखों वाले बीजों के साथ
दबी - ढकी, निष्क्रिय अवस्था में -
मृत शरीरों की तरह।
जब तक तुम्हारी वसंत की नीली बहन
अपनी सुमधुर पुकार से
स्वप्न में डूबी हुई धरती को
जगा नहीं देती -
और सुन्दर कलियों को खिला कर
उनके जीवंत रंगों और सुगन्धियों से
सिंचित नहीं कर देती -
सारे मैदानों और पर्वत प्रदेशों को!
ओ उग्र आत्मा!
तुम जो विचरण कर रही हो सर्वत्र --
विध्वंसक और सर्जक की भूमिका में -
समान भाव से -
सुनो! ज़रा सुनो तो मेरी बात!
हे महाशक्ति !
जिसके प्रबल प्रभाव से
आकाश के अस्त- व्यस्त विस्तार में -
घूम रहे ढीले - ढाले बादल -
उड़े चले आते हैं धरती की ओर -
सूखी पत्तियों की तरह।
वर्षा और आकाशीय विद्युत के देवदूत -
स्वर्ग और सागर की उलझी लटों से मुक्त हो
छा जाते हैं तुम्हारे नीले विस्तार की हवादार सतह पर -
मानो किसी क्रोधित मेनाड के चमकदार केश
उड़ रहे हों हवा में, आसन्न तूफान की -
पूर्व - सूचना देते हुए।
हे परिवर्तनकारी पवन!
तुम शोकगीत हो, जाते हुए वर्ष का -
जिसकी यह अंतिम रात्रि बन जाएगी गुम्बद
उस विशाल समाधि का --
जो ढकी होगी तुम्हारी संगठित शक्तियों से रची
काली भाप और बादलों से
और फट पड़ेगी घनघोर बारिश, आग और ओले
बरसाती हुई
अरे सुनो!
हे पश्चिमी पवन
तुमने ही जगाया भूमध्य सागर को -
उसकी ग्रीष्मकालीन निद्रा से -
जो बाये की खड़ी में, ज्वालामुखी द्वीप के निकट
स्फटिक सी स्वच्छ धाराओं के आगोश में
निश्चल लेटा हुआ था
नींद में उसने प्राचीन महलों और मीनारों को देखा
जो काँप रहे थे लहरों के सघन प्रकाश में
वे ढके हुए थे नीली काई और इतने सुन्दर फूलों से
कि जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
हे प्रबल हवा
तुम्हें मार्ग देने के लिए अटलांटिक सागर की --
समतल शक्तियाँ --
खुद को चीरकर खाइयों में बादल देती हैं,
जबकि ठीक नीचे समुद्र के फूल और दलदली वन -
जो महासागर की रंगहीन पत्तियों को पहने हुए हैं -
तुम्हारी आवाज़ को पहचानते हैं और --
अचानक भय से पीले होकर कांपने लगते हैं -
अपने आवरणों को गिराकर,
स्वयं को नष्ट कर डालते हैं!
हे वायु, सुनो, यह पुकार सुनो!
काश! मैं एक सूखा पत्ता होता --
जिसे तुम वहन कर सकतीं,
तुम्हारे साथ उड़ता हुआ एक चपल बादल -
या एक लहर, जो तुम्हारी शक्ति के नीचे दबी -
हाँफ रही होती,
और महसूस कर पाता तुम्हारी शक्ति को,
किन्तु तुमसे कुछ कम स्वतंत्र रहकर-
क्योंकि तुम तो हर नियंत्रण से परे हो।
यदि अपने बचपन में --
मैं साथी बनता तुम्हारी भ्रमण - चर्या में
तो तुम्हारी आकाशीय गति की समानता करना
केवल एक स्वप्न था, जिसे साकार करने का
मैंने कभी प्रयास न किया होता।
आज अपने नितांत कठिन समय मे
विनय - पूर्वक पुकारता हूँ तुम्हें -
हे दयालु पवन!
मुझे अपने पंखों में उठा लो
किसी सूखे पत्ते, लहर या बादल की तरह -
मैं गिर पड़ा हूँ जीवन - पथ के कंटकों पर
और हो गया हूँ लहूलुहान।
काल के भारी बोझ ने जंजीरों में जकड़
बंदी बना दिया है मेरी चेतना को,
जो ठीक तुम्हारी तरह ही --
अदम्य, स्फूर्त और स्वाभिमानी है।
मुझे अपनी वीणा बना लो -
जैसा तुमने बनाया है वन प्रान्तर को -
क्या हुआ जो मेरी पत्तियाँ भी -
झड़ती जा रही हैं उसी की तरह -?
तुम्हारी शक्तिशाली रागिनियों का कोलाहल -
दोनों से ही ले लेगा एक गहन शारदीय - स्वर
जो दुख- भरा होकर भी मधुर है।
हे प्रबल चेतना!
तुम मेरी भी चेतना बन जाओ
ओ अविवेकी शक्ति!
मेरे मृतप्राय विचारों को -
बिखरा दो समूचे ब्रह्माण्ड में -
सूखी पत्तियों की भाँति,
नए जीवन के प्रारम्भ को
गति प्रदान करने के लिए
हे पवन!
मेरे इस गीत द्वारा i
बिखरा दो मेरे शब्दों को -
अनबुझे अलाव से उड़ने वाली राख -
और चिनगारियों की तरह।
मेरी वाणी के माध्यम से -
सोई हुई धरती को जगाने वाली -
भविष्यवाणी का बिगुल बनकर --
यह स्मरण कराने --
कि यदि शीत ऋतु आ चुकी है
तो क्या वसंत के आने में
बहुत देर होसकती है?
Ode to the West Wind --- P.B Shelley




