कितना सुखी है वह इंसान -
जिसकी सारी इच्छायें , चिंतायें-
सिमटी हों अपनी पैतृक धरती की -
सीमाओं के भीतर।
जो संतुष्ट हो विरासत में मिले,
चंद खेतों के बीच,
अपनी जन्मभूमि की हवा में,
सुखपूर्वक साँस लेते हुए।
जिसके पशुधन से प्राप्त होता हो -
अमृत सा निर्मल दूध,
खेत देते हों पोषण हेतु अन्न,
और भेड़ों से मिलते हों शरीर के लिये वस्त्र।
वृक्षों से मिलती हो छाया ग्रीष्म ऋतु में
और ठिठुरने से बचाने वाला -
बहुमूल्य ईंधन, शीतकाल में
धन्य है वह -
जो स्वस्थ तन और शांत मन के साथ -
निश्चिन्त भाव से देखता रहता -
समय के अदृश्य कारवाँ को -
घंटों, दिनों और वर्षों को लेकर
निः शब्द गुजरते हुए।
परिश्रम , अध्ययन और विश्राम से -
संतुलित दिनचर्या के उपरांत -
जिसको सुलभ हो गहन निद्रा का वरदान -
जिसका जीवन अनुप्राणित हो -
निष्कपट विनोद और शांत आत्म मंथन से।
चाहता हूँ कि जी सकूँ मैं उसी की तरह मैं भी
अनदेखा, अनजाना --
मेरी मृत्यु पर न मनाया जाये कोई शोक -
और न ही लगाया जाये शिलालेख -
मेरी समाधि पर,
यह बताने कि कहाँ लेटा हुआ हूँ मैं -
चिर निद्रा में।



