विश्व में कोई भी मनुष्य
अपने आप में स्वतंत्र और सम्पूर्ण
नहीं है, किसी द्वीप की तरह।
वह तो बस छोटा सा भाग है
एक विशाल महाद्वीप का -
जिसकी एक मुट्ठी भर मिट्टी भी -
यदि सागर की लहरें बहा ले जायें,
तो देश उतना ही कमज़ोर हो जायेगा --
जैसे कि कोई प्रायद्वीप बह जाय,
जैसे बह जाय तुम्हारे मित्र के घर का कोई हिस्सा ,
या तुम्हारा अपना ही घर ।
दुनिया के किसी कोने में -
किसी भी इंसान की मृत्यु -
मुझे व्यथित और दुर्बल बना देती है।
क्योंकि मैं सम्पूर्ण मानव -परिवार का एक अंग हूँ।
इसलिए यह पूछना जरूरी नहीं लगता -
कि चर्च का यह घंटा किसके मृत्यु -शोक में बज रहा है,
जानता हूँ कि पूछँगा
तो उत्तर मिलेगा --
यह तुम्हारे लिये ही बज रहा है!
अंग्रेज कवि जॉन डोन की सुविख्यात कविता "नो मैन इज एन आइलैंड" का भावानुवाद


