कभी किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है -
जिसके ह्रदय मे देश के लिये प्रेम न हो -
जिसने कभी अपने आप से न कहा हो -
" यह मेरी जन्मभूमि है, मेरी अपनी जन्मभूमि!"?
विदेश भ्रमण से लौटकर
अपनी धरती की ओर कदम बढ़ाते हुए
प्रफुल्लित न हो जाता हो जिसका ह्रदय?
क्या सचमुच कहीं कोई है ऐसा?
यदि हाँ, तो जाओ-
पहचान लो उसको भली भाँति।
उसके सम्मान में कभी कोई कविता
नहीं लिखी जाती, और न ही गाया जाता है -
कोई प्रशंसा गीत।
भले ही कितनी बड़ी उपाधियाँ -
जुड़ी हों उसके नाम के साथ,
अकूत धन-सम्पदा और शक्तियों का -
स्वामी होने के बल पर।
किन्तु केवल निजी स्वार्थ में डूबा
वह अभागा तो निश्चित रूप से एक दिन
खो देगा सारा नाम, वैभव और प्रभाव,
अपने जीते जी ही
और यह स्थिति मरण से कम -
नहीं होगी उसके लिये।
जीवन के अंत में -
जब मृत्यु दूसरी बार उसके पास आयेगी -
तो चला जायेगा चुपचाप दुनिया से -
उसी तुच्छ माटी में मिलने के लिये -
जिससे जन्मा था वह कभी।
किन्तु उसके दुनिया से जाने पर
न कहीं शोक में आँसू बहाये जायेंगे
और न ही किया जायेगा कोई स्तुतिगान
उसके सम्मान में।
(A transcreation of Sir Walter Scott's poem)




