अप्रतिम है तुम्हारा सौंदर्य, प्रिय !
किससे तुलना करुँ मैं इसकी?
क्या ग्रीष्म के किसी सुहाने दिन से?
नहीं,नहीं!
तुम तो कहीं अधिक सुन्दर हो उससे--
शांत और निश्छल!
मई के महीने की उग्र हवायें,
झकझोर देतीं कोमल कलिकाओं को,
और फिर ग्रीष्म की अपनी अवधि भी तो
कितनी अल्प होती है न !
कभी - कभी अधिक गर्म हो जाता है सूरज,
उसके सुनहरे चेहरे की वह चमक -
अक्सर ही धूमिल पड़ जाया करती है,
जब घिर जाता वह बादलों से।
यूँ तो हर सुन्दर मनुष्य की सुंदरता,
एक दिन ढल ही जाती है,
संयोग से, या प्रकृति की --
परिवर्तनशील गति में,
किन्तु तुम्हारा शास्वत ग्रीष्म -
कभी निष्प्रभ नहीं होगा,
और न ही तुम कभी खोओगे -
अपनी स्वाभाविक सुंदरता को।
न कभी मृत्यु अभिमान कर पायेगी,
कि तुम उसकी छाया में विचरते हो।
जब तुम, समय की सीमाओं से दूर --
इस कविता की पंक्तियों में रहोगे --
जब तक इस संसार में लोग साँसें लेते रहेंगे,
और रहेगी ज्योति उनकी आँखों में,
जब तक मेरी यह कविता जीवित रहेगी,
निश्चित ही तुमको भी जीवित रखेगी।
Transcreated from sonnet 16 by William Shakespeare
विलियम शेक्सपियर की यह रचना प्रेम, सौंदर्य और कविता की अमरता का अनुपम उदाहरण है। कवि अपने प्रिय की तुलना ग्रीष्म के सुहावने दिन से करता है, किन्तु अंततः यह स्थापित करता है कि उसके प्रिय का सौंदर्य प्रकृति की क्षण भंगुरता से कहीं अधिक स्थायी है। समय और मृत्यु जहाँ भौतिक सौंदर्य को नष्ट कर देते हैं, वहीं कविता उसे अमर बना देती है। यह रचना प्रेम की शक्ति के साथ - साथ साहित्य की उस अद्भुत क्षमता का भी उत्सव है जो क्षणिक को शाश्वत बना सकती है।
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