Thursday, 20 August 2026
Sunday, 16 August 2026
The Guest House ---- अतिथि - गृह (भावानुवाद )
मनुष्य होना भी ऐसा है --
जैसे कोई अतिथि - गृह होना!
जहाँ हर सुबह -
आता है एक नया मेहमान,
कभी ख़ुशी, कभी अवसाद
तो कभी नीचता के भाव लेकर.
और कभी -कभी क्षण भर के लिए -
आ जाती है जागरूकता भी -
किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !
तुम्हें करना होता है समुचित -
स्वागत -सत्कार सभी का,
क्योंकि यही तो धर्म है -
एक अच्छे मेज़बान का।
भले ही वे दुखों की भीड़ बनकर आयें
तुम्हारे घर को तहस - नहस कर डालें,
और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर।
तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,
कौन जाने वह तुम्हारे घर में -
किस नई ख़ुशी के लिए -
जगह बना रहा हो!
निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना
इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर,
हँसते हुए आमंत्रित करो उनको
अंदर आने के लिए।
आभार मानो उन सबका -
क्योंकि उन सब में हर एक को -
कहीं दूर से भेजा गया है,
तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।
A transcreation of sufi (mystc) poet Rumi's poem "The Guest House "
Saturday, 15 August 2026
On Children ----- Khalil Gibran
तुम्हारे बच्चे
वे तो जीवन की अपनी आकांक्षाओं के -
पुत्र -पुत्रियाँ हैं।
वे दुनिया में आते हैं तुम्हारे माध्यम से
पर तुमसे नहीं,
और भले ही वे तुम्हारे साथ हैं--
तुम्हारा उन पर कोई अधिकार नहीं।
तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो -
किन्तु अपने विचार उन पर थोप नहीं सकते -
अपने जीवन में आश्रय दे सकते हो उनके शरीर को
किन्तु उनकी आत्मा को नहीं,
क्योंकि वह निवास करती है भविष्य के भवन में -
जहाँ तुम कभी नहीं जा सकते,-- स्वप्न में भी।
तुम उनके जैसा बनने का प्रयास कर सकते हो -
किन्तु उन्हें अपने जैसा बनाने की इच्छा न करना -
क्योंकि जीवन कभी पीछे की ओर नहीं जाता -
और न ही कभी ठहरता है --
बीते हुए कल के साथ।
तुम वह धनुष हो, जिसके द्वारा तुम्हारे बच्चे -
भेजे जाते हैं आगे, जीवंत बाणों की तरह -
वह अदृश्य धनुर्धर सुनिश्चित करता है -
अनंत पथ में कोई एक लक्ष्य --
और फिर साधता है तुम्हे अपनी शक्ति से इस तरह,
कि वेग से दूर तक जा सकें उसके बाण.
उस धनुर्धर के हाथों सौंप देना
तुम स्वयं को सहर्ष और
निश्चिन्त हो कर
क्योंकि वह तुम्हे भी उतना ही प्यार करता है
जितना उन दूर जाते बाणों को।
Thursday, 13 August 2026
The Solitary Reaper ----- Williaam Shakespeare हिंदी भावानुवाद भावानुवाद
देखो!
दूर खेत में काम कर रही
उस किसान - बाला को,
जो अकेली ही फसल काट रही है
और अपने में ही खोई - सी --
गाती जा रही है कोई दुखभरा गीत।
थोड़ी देर रुको,
या चुपचाप गुजर जाओ यहाँ से ।
सुनो!
कैसे यह सारी घाटी ही -
भर उठी है उसके स्वरों की गूँज से।
शायद ही किसी बुलबुल ने कभी -
गाये हों इतने कर्णप्रिय गीत -
अरब के तपते रेगिस्तान में --
छायादार आश्रय की तलाश में भटकते -
थके - हारे पथिकों के स्वागत में।
वसंत ऋतु में
कोयल की आवाज़ भी
नहीं सुनाई दी है कभी
इससे अधिक मधुर --
जब वह गूँजती है
सुदूर हेब्रिडीज़ द्वीपों में -
समुद्र के सन्नाटे को -
भेदती हुई।
क्या कोई मुझे बताएगा -
कि वह क्या गा रही है?
शायद इन करुण स्वरों का स्रोत -
सुदूर अतीत की स्मृतियों में है -
जैसे कि बहुत पहले हुआ युद्ध,
या वर्तमान की ही कोई अप्रिय घटना --
सहज मानवीय दुःख, हानि,या पीड़ा -
जो पूर्व में कष्ट का कारण रही हो -
और पुनः घटित हो सकती हो।
चाहे जो हो उसके गीत का विषय
पर वह इस तरह गा रही है --
मानों वह कभी समाप्त नहीं होगा।
मैंने देखा उसे काम करते हुए
अपने हँसिये पर झुके -झुके--
और ठिठक कर वहाँ खड़ा मैं
कुछ देर तक सुनता रहा उसका गीत,
और फिर चलने लगा ऊपर की ओर,
उस संगीत को ह्रदय में लिए --
देर तक उसकी गूँज बनी रही मन में
सुनाई देना बंद होने पर भी.
Tuesday, 11 August 2026
Sonnet 18 --- William Shakespeare -- हिंदी भावानुवाद
अप्रतिम है तुम्हारा सौंदर्य, प्रिय !
किससे तुलना करुँ मैं इसकी?
क्या ग्रीष्म के किसी सुहाने दिन से?
नहीं,नहीं!
तुम तो कहीं अधिक सुन्दर हो उससे--
शांत और निश्छल!
मई के महीने की उग्र हवायें,
झकझोर देतीं कोमल कलिकाओं को,
और फिर ग्रीष्म की अपनी अवधि भी तो
कितनी अल्प होती है न !
कभी - कभी अधिक गर्म हो जाता है सूरज,
उसके सुनहरे चेहरे की वह चमक -
अक्सर ही धूमिल पड़ जाया करती है,
जब घिर जाता वह बादलों से.
यूँ तो हर सुन्दर मनुष्य की सुंदरता,
एक दिन ढल ही जाती है,
संयोग से, या प्रकृति की --
परिवर्तनशील गति में,
किन्तु तुम्हारा शास्वत ग्रीष्म -
कभी निष्प्रभ नहीं होगा,
और न ही तुम कभी खोओगे -
अपनी स्वाभाविक सुंदरता को।
न कभी मृत्यु अभिमान कर पायेगी,
कि तुम उसकी छाया में विचरते हो।
जब तुम, समय की सीमाओं से दूर --
इस कविता की पंक्तियों में रहोगे --
जब तक इस संसार में लोग साँसें लेते रहेंगे,
और रहेगी ज्योति उनकी आँखों में,
जब तक मेरी यह कविता जीवित रहेगी,
निश्चित ही तुमको भी जीवित रखेगी।
Sunday, 9 August 2026
जीवन -गीत ---- H. W. Longfellow
जीवन कोई कपोल - कल्पना नहीं
एक ठोस यथार्थ है
गंभीर और सार्थक।
क़ब्र ही नहीं इसका अंतिम लक्ष्य
" मिट्टी हो तुम, और मिट्टी में ही लौटोगे "
यह कथन शरीर के लिए था,
आत्मा के लिए नहीं।
दुःख भरे स्वरों में -
यह मत बताओ मुझे --
कि जीवन एक खोखला सपना है,
क्योंकि सोई रहने वाली आत्मा -
मृतक के समान है,
और सब कुछ जैसा दिखता है
वैसा हमेशा होता नहीं।
सदैव आमोद - प्रमोद में लिप्त रहना -
या दुःख में ही डूबे रहना,
नहीं हैं जीवन के मार्ग या लक्ष्य -
किन्तु कर्तव्य - पथ पर कुछ ऐसे चलना,
कि आने वाला हर दिन हमें पाए -
बीते दिन की तुलना में कुछ और आगे।
कला चिर - स्थायी है और समय गतिमान,
यद्यपि हमारे ह्रदय दृढ और साहसी हैं,
फिर भी वे बज रहे हैं उदास स्वरों में,
क़ब्र की ओर बढ़ती अंतिम यात्रा के -
मंद -मंद आवाज़ वाले --
ढोलों की तरह।
संसार के इस विराट युद्ध - क्षेत्र में,
जीवन के इस अस्थायी पड़ाव में,
तुम नहीं बनना वे गूंगे मवेशी,
जो हाँके जाते दूसरों के द्वारा,
बल्कि बनना स्वयं नायक, इस सारे संघर्ष के।
लगता हो भविष्य कितना भी आकर्षक ,
. कभी न करना तुम इस पर भरोसा
बीते हुए कल को भी जाने दो अतीत में,
कर्म में जुटे रहो बस इसी वर्तमान में,
मन में उमंग और प्रभु में विश्वास लिए।
महान लोगों के जीवन दिलाते हमें याद,
कि हम भी बना सकते जीवन को सार्थक,
और अपने पद - चिह्न भी - जाते - जाते
छोड़ सकते हैं
समय की रेत पर।
वे पद -चिह्न जिन्हे देखने पर
जीवन - संघर्ष में टूटे जहाज का
कोई अकेला, निराश, दुखी यात्री
फिर बाँध सके हिम्मत आगे बढ़ने की।
तो आओ, हम सब उठ कर
जुट जायें अपने काम में
हो कर तैयार कुछ भी झेलने को
निरंतर उपलब्धियाँ करते हुए अर्जित
आगे ही आगे बढ़ते रहें निरंतर
सीखते हुए कठोर परिश्रम करना
और करना प्रतीक्षा फल की धैर्य पूर्वक।
H. W. Longfellow.
( A Transcreation )
Friday, 7 August 2026
Seven Ages---- William Shakespeare
एक विराट रंगमंच है यह समूचा संसार,
और सारे नर - नारी हैं
इस पर होने वाले विचित्र नाटक के
मात्र अभिनेता
वे करते हैं प्रवेश इस पर बारी -बारी
और उतर जाते हैं नीचे
अपनी -अपनी भूमिकायें निभाकर।
यह नाटक खेला जाता
सात अवस्थाओं में
और हर मनुष्य अपने जीवन - काल में
निभाता भिन्न - भूमिकायें
रंगमंच पर सबसे पहले
दिखाई देता वह
नवजात शिशु के रूप में
नर्स की बांहों में रोता, मिमियाता
मुँह से दूध उलीचता।
फिर आता स्कूली बालक बनकर
पीठ पर बस्ता लादे
उजला मुख, पर अनमने भाव लिए
घोंघे सी रेंगती चाल में
स्कूल की ओर बढ़ता हुआ।
अगली बार होता एक प्रेमी वह
आग की भट्टी से निकलती हवा जैसी
गरम साँसे भरता हुआ
अपनी प्रेयसी की सुंदरता की याद में
एक दुःख भरा प्रेमगीत गाता हुआ।
चौथी अवस्था में वह बनता एक सैनिक
तेन्दुए सी घनी दाढ़ी सजाए
अजीब - अजीब सी कसमें खाता हुआ
अति संवेदनशील आत्म -सम्मान के प्रति,
अचानक क्रोध में भर उठने वाला
क्षणभंगुर यश की प्राप्ति के लिए
तोप के मुँह में भी जाने को तत्पर।
पाँचवी भूमिका होती न्यायाधीश की
सुस्वादु व्यंजनों से पोषित -
भरा - पूरा शरीर लिए,
गंभीर ऑंखें, करीने से सजी दाढ़ी में -
नीति - वचनों और जीवन - सूक्तियों के संग
समसामायिक उदाहरणों का पुट देता
भरपूर आत्मविश्वास से, पूरी गरिमा के साथ
निभाता अपना शानदार किरदार।
छठी अवस्था में वह दिखता दुबला - पतला
ढीले - ढाले, बदन पर झूलते से कपड़ों में
नाक पर खिसकती ऐनक और लटकते गालों वाला।
जवानी के समय के सहेज कर रखे मौजे
अब बड़े पड़ जाते हैं उसके सिकुड़े पैरों के लिए
भारी, कड़क आवाज़ अब बदलने लगती है -
बच्चों की जैसी कोमल तुतलाहट में,
और कभी अस्पष्ट सी फुसफुसाहट
तो कभी सीटी - सी ध्वनि बनकर
निकलती है मुँह से।
और अंत में घटित होता इस रंगमंच पर
विचित्र घटनाओं से भरे जीवन - नाटक का
वह करुण दृश्य --
जब बिना दाँत, बिना स्वाद, बिना दृष्टि के --
नितांत असहाय हो कर
जीने लगता वह इसी जीवन में
दूसरा बचपन!!

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