Sunday, 23 August 2026

अपनी चिंताओं को जाने दो



                                            अपनी चिंताओं को जाने दो -

                                            और बनो पूर्णतः निर्मल -हृदय -

                                              एक दर्पण के सदृश -

                                             जिसमें कोई छवि नहीं होती।


                                            यदि तुम्हें एक स्वच्छ दर्पण चाहिए -

                                            तो अपने आप को  देखो -

                                          और देखो उस  स्पष्ट सच्चाई  को -

                                             जो दर्पण तुम्हें दिखाता है।

      

                                              और सोचो -- 

                                             यदि धातु का एक टुकड़ा -

                                            चमकाया जा सकता  है -

                                              एक दर्पण की तरह -

                                           तो हृदय के दर्पण को चमकाने के लिए -

                                            तुम्हें क्या चाहिए होगा?




       सूफ़ी कवि   जलालुद्दीन  रूमी की कविता  'Let Go of Your Worries '                                                                       का भावानुवाद 

         सूफ़ी कवि जलालुद्दीन रूमी की यह प्रेरक रचना चिंता और भय से मुक्त होकर जीवन पर विश्वास करने का सन्देश देती है। मनुष्य प्रायः भविष्य की आशंकाओं और परिस्थितियों के बोझ से स्वयं को व्यथित कर देता है। रूमी हमें स्मरण कराते हैं कि हर क्षण को नियंत्रित करना हमारे वश में नहीं है, किन्तु विश्वास, धैर्य और समर्पण के साथ हम अपनी जीवन - यात्रा को सहज बना सकते हैं. यह कविता हमें ईश्वर तथा जीवन की व्यापक व्यवस्था पर भरोसा रखने का सन्देश देती हैं।

Friday, 21 August 2026

वे नरगिस के फूल

                                                     

          मैं  भटक रहा था वहाँ अकेला ही 

          पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते  -

           किसी बादल की तरह।


     तभी मैंने देखा झील के किनारे खिले -

      सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -

      जो हवा के झोंकों  के साथ -- 

     झूमता हुआ नाच रहा था।


         अद्भुत दृश्य था वह!

      आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते -

        तारों की तरह वे भी फैले हुए थे-

         झील के किनारे, दूर तलक -

         एक अनंत रेखा में सजे हुए।


          एक ही नज़र में मैंने देखा -

         दस हज़ार फूलों को  एक साथ -- 

         आनंद में डूबे हुए,

         एक साथ सिर हिलाते,

              झूमते, नाचते।


           यूँ तो उनके पास ही झील में -

            लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -

           किन्तु इन पीले फूलों की ख़ुशी -

       उनकी चमक को कहीं पीछे छोड़ रही थी।


             ऐसी आनंदमयी संगति में भला -

               कवि कैसे न प्रमुदित  होता?



                 मैं वहाँ खड़ा, खड़ा निहारता रहा -

                 निहारता रहा देर तक --

                  बिना यह सोचे कि उसने मुझे -

                 किस अपूर्व आनंद - धन से-

                   समृद्ध कर दिया है।

                    क्योंकि उस दिन के बाद,

                   जब भी मैं होता हूँ फुर्सत  के पलों में,

                    अथवा  गहन विचारों में डूबा ,

                    वे सुन्दर फूल मेरे कल्पना - लोक में - 

                     एकांत के उसअद्भुत आनंद में --

                     एक बार फिर खिल उठते हैं,

                    और आह्लाद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को इस तरह-

                     कि वह भी नाच उठता है उनके साथ

                      अनायास ही!!




  Transcreation of "I wandered lonely as a cloud ", a poem by     William Wordsworth's   (1770- 1850 )  


Daffodils, जिसका मूल शीर्षक I wandered Lonely as a Cloud  है, अंग्रेज़ी के महान रोमांटिक कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की अत्यंत लोकप्रिय  प्रकृति - कविताओं में से एक है। इसमें कवि प्रकृति के सान्निध्य से प्राप्त आनंद और सौंदर्य का मनोरम चित्र प्रस्तुत करता है। झील के किनारे हवा में लहराते असंख्य नरगिस के फूलों का दृश्य कवि के मन को  गहरे आनंद से भर देता है। बहुत समय पश्चात् भी एकांत के क्षणों में उस दृश्य की स्मृति उसे पुनः प्रसन्नता और आत्मिक शांति प्रदान करती है। वर्ड्सवर्थ की यह कविता प्रकृति और मानव - मन के मधुर सम्बन्ध तथा स्मृतियों की आनंददायी शक्ति का सुन्दर उदाहरण है।



Thursday, 20 August 2026

वे नरगिस के फूल

   मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी -

    पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -

    किसी  बादल  की तरह।


 तभी अचानक मैंने  देखा --
 झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ -
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते-
 तारों की तरह वे भी फैले हुए थे -
 झील के किनारे,- दूर तक --
  एक अनंत रेखा में।
 एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ -
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते-
झूमते, नृत्य करते।
यूँ तो उनके पास ही -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु उनकी  चमक को -
 बहुत पीछे छोड़  रही थी -
 इन पीले फूलों की ख़ुशी।
  ऐसी आनंदमयी  संगति में भला --
 कवि कैसे प्रसन्न न होता?
उस मनोरम दृश्य को -
 मैं निहारता रहा,
  निहारता  रहा देर तक -
  बिना यह सोचे  कि उसने मुझे -
 किस अपूर्व आनंद -धन से -
   समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद -
जब भी मैं फुर्सत के क्षणों में -
अथवा गहन विचारों में डूबा होता हूँ-
वे सुन्दर फूल, मेरी कल्पना में,
  एकांत के उस  आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
 और आह्लाद से  भर  देते हैं  मेरे ह्रदय को -
  इस तरह कि वह भी अनायास   ही 
   नाच उठता है उनके साथ।

A transcreation of "I wandered lonely as a Cloud " by William Wordsworth
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Sunday, 16 August 2026

अतिथि - गृह


    मनुष्य होना  भी ऐसा है --

  जैसे कोई अतिथि - गृह होना!

   जहाँ हर सुबह -

   आता है एक नया मेहमान,

   कभी ख़ुशी, कभी अवसाद,

    तो कभी नीचता के  भाव लेकर।

    और कभी -कभी क्षण भर के लिए -

    आ जाती है जागरूकता भी -

   किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !


   तुम्हें करना होता  है समुचित -

 स्वागत -सत्कार सभी का,

  क्योंकि यही तो धर्म है -

  एक  अच्छे मेज़बान  का।


    भले ही वे दुखों की भीड़ बनकर आयें -

 तुम्हारे घर को तहस - नहस  कर डालें,

  और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर। 

  तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,

  कौन जाने वह तुम्हारे घर में -

   किस नई ख़ुशी  के लिए -

   जगह बना रहा हो!


     निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना -

     इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर, 

     हँसते हुए आमंत्रित करो उनको -

     अंदर आने के लिए।

     आभार मानो उन सबका -

     क्योंकि उन सब में  हर एक को -

     कहीं दूर से भेजा गया है,

     तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।



         A transcreation of  the poem "The Guest House " by Rumi 

 सूफ़ी संत कवि जलालुद्दीन रूमी  (1207- 1273) की यह कविता अपनी सरल अभिव्यक्ति में जीवन - दर्शन की गहन अनुभूति समेटे हुए है। कविता में  मानव - मन  को एक अतिथि - गृह के रूपक के माध्यम से चित्रित किया गया है, जहाँ जीवन के विविध भाव -- आनंद, विषाद, निराशा और अन्य अप्रत्याशित अनुभूतियाँ - अतिथियों की भाँति आते - जाते रहते हैं।

कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रूमी सुखद और दुखद अनुभवों के बीच कोई भेद नहीं करते, वे जीवन में आने वाली प्रत्येक अनुभूति का स्वागत करने की सलाह देते हैं, क्योंकि कभी - कभी पीड़ा और रिक्तता  भी किसी नवीन चेतना और आत्म - बोध के लिए स्थान निर्मित करती है।

सूफ़ी दर्शन की उदार और स्वीकारशील दृष्टि से ओतप्रोत यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन का प्रत्येक अनुभव, चाहे वह कितना भी अप्रिय क्यों न प्रतीत हो, हमारे आत्म - विकास की यात्रा में एक संभावित शिक्षक  बन सकता है।

The Guest House इसलिए केवल एक कविता नहीं, अपितु जीवन को स्वीकार करने का एक शांत, गहन और सर्वकालिक सन्देश है।



Saturday, 15 August 2026

तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं

                                                तुम्हारे  बच्चे 

      














                                           तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे नहीं हैं,

                                  वे तो जीवन की अपनी आकांक्षाओं  के -

                                                       पुत्र -पुत्रियाँ हैं।

                                    वे दुनिया में  आते हैं तुम्हारे माध्यम से -

                                                  पर  तुमसे नहीं --

                                        और भले ही वे तुम्हारे साथ हैं--

                                       तुम्हारा उन पर कोई अधिकार  नहीं।


                                           तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो -

                                   किन्तु अपने विचार उन पर थोप नहीं सकते -

                                अपने जीवन में आश्रय दे सकते हो उनके शरीर को 

                                           किन्तु उनकी आत्मा को नहीं,

                                  क्योंकि वह निवास करती है भविष्य के भवन में -

                                      जहाँ तुम कभी नहीं जा सकते,-- स्वप्न में भी।


                                     तुम उनके जैसा बनने का प्रयास कर सकते हो -

                                    किन्तु उन्हें अपने जैसा बनाने की इच्छा न करना -

                                     क्योंकि जीवन कभी पीछे की ओर नहीं जाता -

                                     और न ही कभी ठहरता है --

                                      बीते हुए कल के साथ।


                                तुम  वह  धनुष हो, जिसके द्वारा  तुम्हारे बच्चे -

                                भेजे जाते हैं आगे, जीवंत बाणों की तरह -

                                 वह अदृश्य धनुर्धर सुनिश्चित करता है -

                                  अनंत पथ  में कोई एक लक्ष्य --

                               और फिर साधता है तुम्हे अपनी शक्ति से इस तरह,

                                कि  वेग से दूर तक जा सकें उसके बाण.


                                  उस धनुर्धर के हाथों  सौंप देना तुम -

                               स्वयं को सहर्ष  और  निश्चिन्त  हो कर 

                               क्योंकि  वह तुम्हे भी उतना ही प्यार करता है -

                                 जितना उन दूर जाते बाणों को।


      A  transcreation of the poem 'On Children 'by Khalil Gibran -

      ( 1883-1931)

    विश्वविख्यात  कवि और दार्शनिक खलील जिब्रान की कविता ' On Children '  माता  - पिता और संतान के सम्बन्धों को एक गहन और उदात्त दृष्टि से प्रस्तुत करती है। यह कविता उनकी प्रसिद्ध कृति The Prophet का एक महत्वपूर्ण अंश है।

कवि के अनुसार बच्चे माता - पिता के माध्यम से इस संसार में आते अवश्य हैं किन्तु उनकी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होते।वे जीवन की अपनी स्वतंत्र धारा के प्रतिनिधि हैं और अपने समय, विचारों तथा अपने भविष्य की ओर अग्रसर होते हैं। माता - पिता का दायित्व उन्हें प्रेम, संरक्षण और संस्कार देना है परन्तु उनके व्यक्तित्व और स्वपनों को अपनी इच्छा के अनुरूप ढालना नहीं।

धनुष और बाण का  सशक्त रूपक इस कविता की विशिष्ट साहित्यिक उपलब्धि है। माता - पिता धनुष की भाँति हैं और संतान भविष्य की ओर प्रस्थान करने वाले बाणों के समान --इस प्रकार यह रचना प्रेम, स्वतंत्रता और पीढ़ियों के बीच संबंधों की एक संवेदनशील व्याख्या प्रस्तुत करती है।


Thursday, 13 August 2026

वह एकाकी कृषक बाला

   


 


                                                           देखो!

                                             दूर  में काम कर रही-

                                            उस किसान - बालाखेत  को जो -

                                           अकेली ही फसल काटती हुई 

                                             और अपने में ही खोई - सी --

                                          गाती जा रही है कोई दुखभरा गीत।

                                                     थोड़ी देर रुको,

                                            या चुपचाप गुजर जाओ यहाँ से ।


                                                      जरा  सुनो!

                                               कैसे यह पूरी घाटी ही -

                                         भर उठी है उसके स्वरों की गूँज से।


                                            शायद ही किसी बुलबुल ने कभी -

                                            गाये हों इतने  कर्णप्रिय गीत -

                                             अरब के तपते रेगिस्तान में --

                                          छायादार आश्रय की तलाश में भटकते -

                                           थके - हारे  पथिकों के स्वागत में।


                                             वसंत ऋतु में कोयल की आवाज़ भी -

                                           नहीं  सुनाई दी है कभी  इससे अधिक मधुर --

                                            जब वह गूँजती  है सुदूर हेब्रिडीज़ द्वीपों में -

                                             समुद्र के सन्नाटे  को  भेदती हुई।



                                            क्या कोई मुझे बताएगा  कि वह क्या गा रही है?

                                            शायद इन करुण स्वरों का स्रोत -

                                            सुदूर अतीत की स्मृतियों में  है -

                                            जैसे कि बहुत पहले हुआ युद्ध,

                                           या वर्तमान  की ही  कोई अप्रिय घटना --

                                           सहज मानवीय  दुःख, हानि,या पीड़ा -

                                           जो पूर्व  में कष्ट का कारण रही हो -

                                            और पुनः  घटित हो सकती हो।

 

                                          चाहे जो हो उसके गीत का विषय -

                                          पर वह  इस तरह गा रही है  उसे  --

                                         मानो  वह कभी समाप्त नहीं होगा।



                                           मैंने देखा उसे काम करते हुए -

                                           अपने हँसिये पर झुके -झुके--

                                           और ठिठक कर वहाँ  खड़ा मैं,

                                          कुछ देर तक  सुनता रहा  उसका गीत,

                                         और फिर चलने लगा ऊपर  की  ओर,

                                          उस संगीत  को  ह्रदय में लिए, और,

                                         देर तक उसकी गूँज बनी रही मन में -

                                              सुनाई  देना बंद होने पर भी।




                   Transcreated from ' Solitary Reaper ' , a poem by William                        Wordsworth (1770-- 1850)

               विलियम वर्ड्सवर्थ की यह  प्रसिद्ध कविता प्रकृति, संगीत और मानवीय संवेदना के                    अद्भुत  सामंजस्य का सुन्दर चित्र प्रस्तुत करती है। स्कॉटलैंड के ग्रामीण परिवेश में                      एक अकेली युवती खेत में काम करते हुए गीत गा रही है, कविता उसके गीत के                     बोलों को भले ही  न समझ सके किन्तु उसकी मधुर ध्वनि उसके  मन पर अमिट                        प्रभाव छोड़ जाती है। कविता यह दर्शाती है कि कला और संगीत भाषा की सीमा से                  परे जाकर सीधे मानव -ह्रदय  को स्पर्श कर सकते हैं।

      

    


   




Tuesday, 11 August 2026

प्रेमी की सुंदरता


    अप्रतिम है तुम्हारा सौंदर्य, प्रिय !

    किससे  तुलना करुँ मैं इसकी?

क्या ग्रीष्म के किसी सुहाने दिन से?

नहीं,नहीं!

तुम तो कहीं अधिक सुन्दर हो उससे--

शांत और निश्छल!



  मई के महीने की उग्र हवायें,

 झकझोर देतीं  कोमल  कलिकाओं को,

और फिर ग्रीष्म की अपनी अवधि भी तो

 कितनी अल्प होती  है न !


   कभी - कभी अधिक गर्म हो जाता है सूरज,

  उसके सुनहरे  चेहरे की  वह चमक -

अक्सर ही  धूमिल पड़ जाया करती है,

 जब घिर जाता वह बादलों से।


  यूँ तो हर सुन्दर मनुष्य की सुंदरता,

 एक दिन ढल ही जाती है,

 संयोग से, या प्रकृति की --

  परिवर्तनशील गति में,


    किन्तु  तुम्हारा शास्वत ग्रीष्म -

   कभी  निष्प्रभ नहीं होगा,

     और न ही तुम कभी खोओगे -

    अपनी स्वाभाविक  सुंदरता को।


      न कभी मृत्यु अभिमान कर पायेगी,

      कि तुम उसकी छाया में  विचरते हो।

      जब तुम, समय की सीमाओं से दूर --

       इस कविता की पंक्तियों में रहोगे  --


     जब तक इस संसार में लोग साँसें लेते रहेंगे,

      और  रहेगी ज्योति उनकी आँखों में,

       जब तक  मेरी यह कविता जीवित रहेगी,

       निश्चित ही तुमको भी जीवित रखेगी।


            Transcreated from sonnet 16 by William Shakespeare 

      

      विलियम शेक्सपियर की यह रचना प्रेम, सौंदर्य और कविता की अमरता का अनुपम उदाहरण  है। कवि अपने प्रिय की तुलना ग्रीष्म के सुहावने  दिन से करता है, किन्तु अंततः यह स्थापित करता है कि उसके प्रिय का सौंदर्य प्रकृति की क्षण भंगुरता से कहीं अधिक  स्थायी        है। समय और मृत्यु जहाँ भौतिक सौंदर्य को नष्ट कर देते हैं, वहीं कविता उसे अमर बना देती है। यह रचना प्रेम की शक्ति के साथ - साथ  साहित्य की उस अद्भुत क्षमता का भी उत्सव है जो क्षणिक को शाश्वत बना सकती है।