वे उसके योद्धा का निष्प्राण शरीर -
घर लेकर आये थे -
किन्तु यह देखकर भी --
वह न तो मूर्च्छित हुई,
और न ही किया उसने -
करुण विलाप।
सारी सेविकायें स्तब्ध थीं उसकी स्थिति देख -
"उसे रोना होगा, वरना वह मर जायेगी ",
उन्होंने कहा।
वे उस योद्धा की प्रशंसा करने लगीं -
धीमी , कोमल आवाज़ में --
कि वह बहुत प्यारा इंसान था,
सबसे सच्चा दोस्त था और साथ ही-
एक आदर्श दुश्मन भी।
तब भी,वह न तो कुछ बोली -
और न तनिक भी विचलित हुई।
एक सेविका चुपचाप उठकर शव के पास गई,
और उसके चेहरे से कपड़ा हटा दिया,
फिर भी वह न तो हिली और न रोई।
तब,नब्बे वर्ष की एक नर्स उठी -
और मृत योद्धा के बच्चे को लाकर --
रख दिया उसकी गोद में!
और लो!
ग्रीष्म के तूफान की तरह
आँसुओं की धारा बह निकली
उसकी आँखों से-
" मेरे प्यारे बच्चे! मैं जिऊँगी -
जिऊँगी तेरे लिए "--
कहते हुए।
Transcreated from the poem " Home They Brought her Warrior Dead " by Alfred Lord Tennyson
Alfred Lord Tennyson (1809- 1892) की यह मार्मिक रचना युद्ध, प्रेम, शोक और मातृत्व की अद्भुत मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। कविता में एक वीर योद्धा की पत्नी अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर और उसके निष्प्राण शरीर को देखकर भी आँसू नहीं बहाती। उसके आस - पास उपस्थित लोग उसके इस अस्वाभाविक मौन से चिंतित हो उठते हैं. कई तरह के उपाय करने पर भी उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अंत में जब एक वृद्धा नर्स उसके नन्हें बच्चे को लाकर उसकी गोद में डाल देती है तो उसके भीतर दबा हुआ दुःख आँसुओं के रूप में फूट पड़ता है, और जाग उठता है जीवन जीने का संकल्प भी । कविता अत्यंत संवेदनशील ढंग से दर्शाती है कि गहनतम शोक के क्षणों में भी मातृत्व जीवन को थाम लेने की शक्ति और आगे बढ़ने के कारण प्रदान करता है।

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