वह प्रतिमा --
यूनानी प्रसिद्धि के -
उस विशाल दैत्य की भाँति,
नहीं है --
जो विजय के गर्व में -
अपने पैर फैलाए खड़ा था
एक भूमि से दूसरी भूमि तक।
हमारे सागर से धुले सूर्यास्त के द्वार पर -
खड़ी होगी एक शक्ति शाली नारी --
हाथ में लिए एक मशाल लिए -
जिसकी ज्वाला में बंदी है आकाशीय बिजली,
और जिसका नाम है -
निर्वासितों की माता।
उसके प्रकाशमान हाथ से -
बिखरती है,
विश्व -स्वागत की आभा --
सारे संसार में।
" ओ प्राचीन भूमियों!
अपने ऐतिहासिक वैभव को -
तुम रखो अपने पास "
वह पुकारती है --
अपने मूक होंठों से --
" मुझे दे दो अपने गरीब,
अपने दबे - कुचले लोगों को -
जो तरस रहे हैं
मुक्ति की साँस लेने को।
वे बेबस लोग नहीं चाहते -
तुम्हारे समृद्ध तटों पर -
कूड़े - कचरे की तरह पड़े रहना.।
उन्हें मेरे पास भेज दो -
जो बेघर हैं,
तूफानों के सताए हुए हैं।
मैं खड़ी हूँ -
सुनहरे द्वार के पास-
उन्हें अपनाने के लिए,
अपनी मशाल उठाए "।
Transcreated from the poem" The New Colossus " --
by Emma Lazarus 1849-- 1887
एमा लेज़रस की The New Colossus -- स्वतंत्रता, करुणा, आश्रय और मानवीय गरिमा की सशक्त कविता है। स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी को प्राचीन यूनानी शक्ति के प्रतीक से
- अलग एक ऐसी नई प्रतिमा के रूप में देखा गया है जो संसार के थके, वंचित और आश्रय की तलाश में आये लोगों का स्वागत करती है। कविता का मूल सन्देश किसी एक देश तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और खुले ह्रदय की सार्वभौंमिक
पुकार है. यह रचना हमें याद दिलाती है कि किसी राष्ट्र की महानता उसकी सामरिक शक्ति में नहीं, बल्कि उसकी स्वीकार करने,आश्रय देने और आशा जगाने की क्षमता में निहित होती है।

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