Friday, 25 September 2026

हे मृत्यु !



हे मृत्यु!
अभिमान मत करो अपने पर 

क्योंकि तुम न तो परम शक्तिमान  हो -

और न ही  हो  डरावनी, 

यद्यपि कुछ लोग  तुम्हें  ऐसा  समझते हैं,

क्योंकि, जिन्हें तुम अपने द्वारा पराजित -

अथवा मारा गया समझती हो -

 वे वास्तव में मरे नहीं होते - 

  हे दुर्बल मृत्यु !

और हाँ, मुझे भी मार नहीं सकतीं तुम।


निद्रा और विश्राम की तरह, जो तुम्हारे ही रूप हैं, 

तुम भी अवश्य  सुखद  लगती होगी 

संभवतः  उनसे कुछ अधिक ही आनंददायक.

क्योंकि हमारे श्रेष्ठ लोग तुम्हारे साथ चले जाते हैं 

शीघ्र ही अपने शरीर को त्याग
मुक्त हो गई आत्मा के  साथ।


मृत्यु!


तुम भी एक दासी हो --

नियति की, संयोग की, राजाओं की 

और हताश मनुष्यों की।

मौजूद रहती हो सर्वत्र -

विष, युद्ध और बीमारियों के रूप में।


अफीम और जादू भी सुला सकते हैं -

हमें  गहरी नींद में -

तुमसे कहीं अच्छी तरह।

फिर,  किस बात का घमंड है तुम्हें?


एक छोटी सी नींद -- 

और हम जाग जाएँगे सदा के लिए।

तब तुम स्वयं  अपना अस्तित्व 

खो  बैठोगी --

ओ अभिमानी मृत्यु!


   


  Death be not Proud--- John Donne 1572-- 1631

  A transcreation of the poem ' Death be not Proud '

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