Sunday, 19 July 2026

क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी.....

                 



                    क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी मृत्यु के लिए..


                            दुनियादारी  के चक्र में बँधी -

                             मैं बस चलती चली जा रही थी -

                              मानो रुकने की तो क्या -

                             मरने की भी फुर्सत -

                              नहीं थी मेरे पास।


                           तभी वह  सौम्य सा सारथि --

                            स्वयं मेरे पास आ रुका -

                             मुझे अपने साथ चलने का -

                            स्नेहिल निमंत्रण देता हुआ।


                            उसके रथ में यूँ तो हम दो ही थे -

                              किन्तु कोई एक और  भी -

                          अदृश्य रूप में उपस्थित थी वहाँ -

                              सर्व-कालिक, अशरीरी और-

                              चिर -रहस्यमयी -- "अमरता "।


                            हम धीरे, धीरे आगे बढ़ते रहे -

                            उसे कोई जल्दी नहीं थी --

                            और उसके सौजन्यपूर्ण निमंत्रण पर -

                             मैं भी पीछे छोड़ आई थी -

                             अपनी सारी व्यस्ततायें और आकांक्षायें।


                           हम गुज़रे एक स्कूल के पास से -

                           जहाँ भोजनावकाश में -

                            गोल घेरा बनाकर -

                             हँसते, खेलते बच्चे -

                             एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे।


                         फिर और आगे बढ़े -

                        पके हुए धान के खेतों के पास से -

                        डूबते हुए सूरज को पीछे छोड़ते हुए -

                        या शायद वही हमें छोड़ कर चला गया था।        

   

                       गहराते अँधेरे के साथ -

                        ओस की बूँदें गिरने लगीं थीं -

                       सिर्फ एक पतले गाउन और हल्के स्कार्फ में -

                       ठण्ड से सिहरने लगीं थी मैं.


                      तभी हम आकर रुक गये -

                      एक ऐसे घर के सामने -

                      जो धरती पर बस एक उभार सा लगता था -

                       जिसकी छत भी मुश्किल से दिखती थी -

                      और नींव तो मानो कहीं गहराई में दबी हो।


                      उस दिन के बाद न जाने -

                     कितनी सदियाँ बीत गयी हैं -

                     फिर भी लगता है मानों वह सब -

                     कल की ही बात हो।



                    उसी दिन मैंने जाना था यह रहस्य 

                    कि उस रथ के घोड़ों के मुख -

                    अमरत्व की दिशा में थे  जहाँ --

                     मेरा अपना ही स्थायी घर था, --

                      चिर - विश्राम के लिये।



             Emily Dickinson's   (1830- 1886 )    की  कविता   --"Because I could Not                        Stop For Death"--मृत्यु और  समय के  रहस्य पर आधारित उनकी सर्वाधिक  प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। कवयित्री मृत्यु को भयावह रूप में प्रस्तुत करने के बजाय एक शांत और विनम्र सहयात्री के रूप में देखती है जो जीवन - यात्रा को एक अन्य आयाम की ओर ले जाती है। यात्रा के विभिन्न दृश्य जीवन की अलग - अलग अवस्थाओं और समय के अनवरत प्रवाह का प्रतीक बन जाते हैं। कविता मृत्यु के प्रति एक गहन, शांत और दार्शनिक दृष्टि प्रस्तुत करती है तथा जीवन की क्षणभंग़ु रता  और अनंतता के रहस्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

  


                        



Sunday, 14 June 2026

अवकाश के पल

कितना नीरस है यह जीवन -

चिंताओं में डूबे  हम -

भाग - दौड़ में लगे हैं  रात दिन

 कि पल भर भी ठहर नहीं पाते -

प्रकृति के सौंदर्य को -

आँख भर देखने।


फुर्सत नहीं  मिलती कभी -

पेड़ की छाया में  खड़े होकर -

भेड़ों और गायों   की तरह -

देर तक देखने की।


जंगलों से गुजरते हुए -

देख नहीं पाते कभी -

सयानी गिलहरियों को -

अपने मेवे और दानों को -

 घास में छिपाते।


 नहीं देख पाते उन -

बहती जलधाराओं को -

दिन के उजाले में -

तारों भरे आकाश की तरह -

जगमगाते।

 

अवकाश नहीं मिलता  कभी -

प्रकृति- सुन्दरी के नयनों  में झाँकने का

या मुग्ध  हो कर निहारना -

उसके नृत्य -रत  चरणों को।


  ठहरना यह देखने कि -

उसकी आँखों में जन्मी

 हल्की सी मुस्कान -

कैसे खिल उठती है -

अधरों तक पहुँच कर।


  सचमुच, बड़ा  ही निर्धन है वह जीवन -

जो जकड़ा रहता चिंताओं के जाल में -

 मुक्त नहीं हो पाता कभी भी जाने को -

 आस -पास बिखरे सौंदर्य  के ख़ज़ाने तक।


     


           W. H. Davies की कविता Leisure आधुनिक जीवन की व्यस्तता पर एक सरल किन्तु गहरी टिप्पणी है। कवि प्रश्न करता है कि यदि मनुष्य के पास प्रकृति कि सुंदरता को देखने और उसका आनंद लेने का समय ही न हो तो ऐसा जीवन कितना अधूरा है. कवि का विचार है कि जीवन केवल काम, दौड़ -भाग और चिंताओं का नाम नहीं  है, प्रकृति के सौंदर्य का अनुभव करना भी जीवन का एक आवश्यक पक्ष है। यह रचना पाठक को कुछ ठहर कर अपने आस - पास की दुनिया को देखने और जीवन के छोटे - छोटे आनंदों को महसूस करने की प्रेरणा देती है।

            

Thursday, 11 June 2026

     करुणा! 

एक सुकोमल भावना -


मानव- मन  की गहराइयों में बसी -

  शाश्वत अच्छाई।


 कहीं दुःख, अन्याय -

या क्रूरता होते  देख अनायास -

बह निकलती ह्रदय से-

हर अवरोध को -

नकारते हुए।


वह होती -

स्वर्ग से धरती पर उतरती -

वर्षा की  बूँदों की तरह  निःशब्द -

किन्तु सुखद,शीतल और -

  कल्याणकारी।


अपने अदृश्य आँचल में लिये आती -

राहत और खुशियों की सौगातें -

जिन्हें बाँट देती भेदभाव बिना -

देने और लेने वाले दोनों में ,

 बराबर।


शक्तियों में भी सर्वोत्तम है -

  किसी सम्राट के ह्रदय में बसी करुणा -

 जो बढ़ाती उसकी शोभा -

 उसके शीश पर सजे -

रत्न - मुकुट से भी अधिक।


 राजदंड होता -

लौकिक सत्ता, राजसी वैभव -

और निरंकुश शक्ति का प्रतीक -

जो जगाये रखता जन -मन में -

राजसत्ता के प्रति भय - मिश्रित सम्मान।


 इन सब राजसी प्रतीकों से-

कहीं ऊँचा होता करुणा का स्थान-

वह निवास करती है-

 स्वयं राजा के ह्रदय में -

ईश्वरीय गुण का स्वरुप धर कर ।


और  प्रजा के लिये  --

राजा का न्याय भी बन जाता-

 ईश्वरीय  न्याय  के समतुल्य -

जब  मिला हो  उसमें,

करुणा का अमृत - रस।



A Transcreation of  William Shakespeare's   "The Quality Of Mercy "

          The Quality Of Mercy -- William Shakespeare --- 1564--1616

शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक The Merchant of Venice से लिया गया यह काव्यांश करुणा और क्षमा के मानवीय मूल्य को अत्यंत प्रभावशाली  ढंग से प्रस्तुत करता है। कवि के अनुसार सच्ची करुणा किसी बाहरी दबाव या आदेश से नहीं, अपितु ह्रदय की सहज उदारता से जन्म लेती है। वह देने वाले और पाने वाले -- दोनों को समृद्ध करती है। जहाँ न्याय दंड और अधिकार की बात करता है, वहीं करुणा मनुष्य को उसके उदात्त स्वरुप से परिचित कराती है. यह कविता हमें  बताती है कि शक्ति का सर्वोत्तम रूप कठोरता में नहीं, अपितु क्षमा करने की क्षमता में निहित है।

   

 

Sunday, 7 June 2026

Dreams -- Langston Hughes

             अपने सपनों को जीवित रखो 

             प्राणपण से रक्षा करो उनकी 


              उनके  निष्प्राण हो जाने से-

              अक्षम हो जायेगा तुम्हारा जीवन,

              उस टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह

              जो चाह कर भी उड़ नहीं सकती।


           मजबूती से पकड़े रहो  उनको 

           यदि  वे फिसल गये हाथों से 

          तो तुम्हारा जीवन  बन जायेगा 

        बर्फ़ में दबे खेतोँ जैसा  अनुर्वर 

          जिसमें कुछ भी उग नहीं सकता।

           


            धन की  सीमाओं का सत्य तो बता चुके हैं 

             ईसा से लेकर गाँधी तक 

           क्या असीसी के संत फ्रांसिस भी 

            सिद्ध नहीं करते इसकी निस्सारता?


           अच्छाई  की  गरिमा अनायास ही -

           पीछे छोड़ देती है राज -शक्तियों को 

          करुणा का प्रभामण्डल चमकता है -

          रत्नजटित सोने के मुकुट से अधिक,

          और प्रेम के ओस कण धूमिल कर देते हैं -

          हीरे की  आभा को भी -

         अपनी  अप्रतिम जगमगाहट से।



         Langston Hughes   (1901------  1967)  की  कविता 'Dreams' का भावानुवाद 

         Swapnonलैंगस्टन ह्युज की यह संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली कविता मनुष्य के जीवन में सपनों की अनिवार्यता को रेखांकित करती है। कवि के लिए सपने केवल कल्पनाएं नहीं, बल्कि जीवन को दिशा और अर्थ देने वाली आतंरिक ऊर्जा हैं। जब मनुष्य अपने सपनों को त्याग देता है तो जीवन अपनी उड़ान और संभावनाएँ खोने लगता है। कविता का सरल कथ्य एक गहरा सन्देश देता है --परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही कठिन हों, आशा और सपनों को जीवित रखना आवश्यक है. यह कविता पाठक को अपने भीतर के उस प्रकाश को बचाए रखने की प्रेरणा देती है, जो उसे आगे बढ़ने का साहस देता है.

          

    

Friday, 5 June 2026

मैं स्वप्न देखता हूँ.... ( I Dream A world - )

 मैं  देखता हूँ  सपना 

 एक ऐसी दुनिया का-

😜

जहाँ  एक इंसान दूसरे इंसान  से -

नफरत न करता हो.

 जहाँ प्रेम - रस से  भीगी हो सारी धरती -

और रास्ते  सजे हों अनुपम शांति से।


मैं देखता हूँ एक ऐसी दुनिया का स्वप्न -

जहाँ हर किसी को मिले   पूर्ण स्वतंत्रता -

जहाँ धन - लिप्सा  आत्मा को दुर्बल  न बना दे -

और  लोलुपता न  बन जाये -

 जीवन का अभिशाप!


 जहाँ  लेश मात्र भी  रंग भेद न हो -

और उदारता से  बँटते  हों सबमें 

धरती के अनुपम उपहार.

जहाँ हर मनुष्य स्वतंत्र हो अपने जीवन में - 

 दुष्टता शर्मिंदा होकर सर झुकाये खड़ी हो,

 और ख़ुशी,  अनमोल   मोतियों की तरह -e

 मानव -मात्र की जरूरतों को -

 पूरा करने में जुटी हो।

                   हाँ, एक ऐसी ही दुनिया  का स्वप्न देखता हूँ मैं

                             ऐसी ही दुनिया का!!



                                       I  Dream a World   -    Langston Hughes (1901-- 1967)

                  I Dream a World  में कवि एक ऐसे संसार का स्वप्न देखता है जहाँ प्रेम,           स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का वास हो। कवि का स्वप्न किसी एक व्यक्ति या समुदाय तक सीमित नहीं,  बल्कि  समस्त मानवता के लिए है। यहाँ ऐसे समाज की  कल्पना की गई है जहाँ घृणा, भेदभाव और अन्याय के स्थान पर भाईचारा और पारस्परिक सम्मान हो। ऐसे आदर्श संसार की कल्पना के माध्यम से कवि मानवता की श्रेष्ठ संभवनाओं में अपना विश्वास व्यक्त करता           है। यह रचना आशा, समानता और शांतिपूर्ण सह - अस्तित्व का  सुन्दर काव्यात्मक घोष है.

Wednesday, 3 June 2026

यदि तुम मुझे भूल जाओ

 

सुनो!

मैं चाहता हूँ कि 

एक बात भली भाँति

समझ लो तुम --

कि जब भी मैं देखता हूँ 

अपनी खिड़की से 

बर्फ़ से ढकी टहनी पर टिके 

 स्फटिक जैसे चमकते चाँद को 


कभी आग के पास बैठा,

छूने की कोशिश करता हूँ,

अंगारों से झरती नर्म राख की परतों को 

या जली हुई लकड़ी की देह  पर -

उभर आई झुर्रियों को।


इस सब के बीच न जाने क्यों 

मेरा मन अनायास ही 

 खिंचा चला जाता है 

 तुम्हारी  ओर।


मानों दुनिया की हर एक चीज़ 

और वह हर चीज़ जो मेरे आस - पास है --

खुशबू, रौशनी और धातुओं की चमक 

सब मिलकर छोटी -छोटी नावें बन गई हों 

मुझे तुम्हारे उन द्वीपों की ओर ले जाने के लिये 

जहाँ तुम मेरी प्रतीक्षा में हो ।


और अब, इस के उलट --

यदि तुम धीरे, धीरे 

मुझे प्रेम करना बंद कर दोगी 

तो सच मानो, मैं भी वही करूँगा 

 ठीक तुम्हारी तरह,

  धीरे, धीरे।

    

  और हाँ, 

यदि तुम अचानक ही मुझे भूल जाओ 

तो फिर कभी मुझे मिलने की 

उम्मीद न रखना, क्योंकि मैं 

पहले ही भूल चुका होऊँगा तुम्हें।


यदि तुम्हे मेरा जीवन - संघर्ष 

कुछ अधिक ही लम्बा और उन्मादी  लगे 

और विचलित करें -

मेरे रास्ते में आने वाली -

निरंतर झिँझोड़ती, डराती -

तूफानी हवायें.

कि तुम आगे न चलना चाहो मेरे साथ,

और छोड़ कर चली जाओ  मुझे-

 उसी जगह जहाँ मेरी जड़ें  

 गहराई  तक गड़ी हुई हैं।


  याद रहे कि --

ठीक उसी दिन, 

उसी बेला,

मैं अपना सब कुछ समेट कर 

  चल दूँगा,

  किसी और प्रेम -की तलाश में।


 किन्तु यदि  तुम --

 हर दिन, हर घड़ी,

यह महसूस करो 

कि अपनी अडिग मधुरता के साथ 

नियति ने तुम्हें बनाया है 

मुझसे ही जुड़ने के लिये।यदि हर दिन कोई फूल 

तुम्हारे होंठों तक पहुँच जाये 

 मुझे ढूँढते  हुए --

तो, समझ लेना प्रिये, कि -

मेरे प्रेम  की लौ फिर जगमगा उठेगी 

 जैसे कि कुछ भी न तो बुझा था,

न ही भुलाया गया।


  मेरा प्रेम तुम्हारे ही प्रेम से पुष्ट होता है, 

  और जब तक तुम इस दुनिया में हो,

    तुमसे बँधा रहेगा वह जीवन भर 

   अपने समूचे अस्तित्व के साथ।



(नोबेल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरुदा की कविता If You Forget Me  का भावानुवाद )



Sunday, 31 May 2026

एकांत का गान

     



        एकांत का गान 


     कितना सुखी है वह इंसान -

     जिसकी सारी इच्छायें, चिंतायें -

     सिमटी हों अपनी पैतृक धरती की -

     सीमाओं के भीतर।

      जो संतुष्ट हो विरासत में मिले,

       चंद खेतों के बीच रहकर -

      अपनी जन्मभूमि की हवा में,

      सुखपूर्वक साँस लेते हुए।

    

       जिसके पशुधन से  प्राप्त होता हो -

       अमृत सा निर्मल दूध,

       खेतों से  पोषण के लिये  भरपूर अन्न -

       और भेड़ों से शरीर के लिये ऊनी वस्त्र।

      वृक्षों से मिलती हो ग्रीष्म ऋतु में छाया -

       और शीतकाल में  ठिठुरने से बचाता,

           बहुमूल्य ईंधन।


       धन्य है वह  संतोषी  आदमी --

      जो स्वस्थ तन और शांत मन के साथ -

      निश्चिन्त भाव से देखता रहता -

      समय के अदृश्य कारवाँ को -

      घंटों, दिनों और वर्षों को लेकर -

      निः शब्द गुजरते हुए।

   

      परिश्रम , अध्ययन और विश्राम से -

      संतुलित दिनचर्या के उपरांत -

     जिसको सुलभ हो गहन निद्रा का वरदान -

      अनुप्राणित हो  जिसका जीवन संघर्ष -

     निष्कपट विनोद और शांत आत्म मंथन से। 


     चाहता हूँ कि  जी सकूँ उसी की तरह मैं भी,

      अनदेखा, अनजान रहते हुए, 

      मेरी मृत्यु पर न तो  शोक मनाये  कोई -

      और न  ही लगाया जाये  शिलापट्ट -

       मेरी समाधि पर,

      यह बताने कि यहाँ सोया हुआ हूँ मैं -

       चिर निद्रा में।


              Ode To Solitude -- Alexander  Pope 16888--1744)

         अंग्रेज़ कवि Alexendar Pope की यह कविता शांत, सरल और आत्मनिर्भर जीवन               की आकांक्षा को अभिव्यक्त करती  है। कवि ऐसी जीवन - शैली की कल्पना करता है                 जिसमें  बाहरी वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा प्रकृति, स्वास्थ्य, आत्मिक संतोष           और मन की शांति को अधिक महत्व मिले।   एकांत यहाँ अकेलेपन का प्रतीक नहीं,                   बल्कि आत्म - चिंतन और  स्वतंत्र जीवन का अवसर है। कविता भौतिक उपलब्धियों                की चमक से दूर उस संतुलित जीवन की ओर संकेत करती है जिसमें मनुष्य प्रकृति के               निकट रहकर संतोष और आत्मिक स्वतंत्रता का अनुभव कर सके।