मैं स्वप्न देखता हूँ,
एक ऐसी दुनिया का-
जहाँ एक इंसान दूसरे इंसान से -
नफरत न करता हो.
जहाँ प्रेम - रस से सिक्त हो सारी धरती -
और रास्ते सजे हों अनुपम शांति से।
मैं देखता हूँ एक ऐसी दुनिया का स्वप्न -
जहाँ हर किसी को मिले पूर्ण स्वतंत्रता -
जहाँ धन - लिप्सा आत्मा को दुर्बल न बना दे -
और लोलुपता न बन जाये -
जीवन का अभिशाप!
जहाँ लेश मात्र भी रंग भेद न हो -
और उदारता से बँटते हों सबमें -
धरती के अनुपम उपहार.
जहाँ हर मनुष्य स्वतंत्र हो अपने जीवन में -
दुष्टता शर्मिंदा होकर सर झुकाये खड़ी हो,
और ख़ुशी, अनमोल मोतियों की तरह -
मानव -मात्र की जरूरतों को -
पूरा करने में जुटी हो।
हाँ, एक ऐसी ही दुनिया का स्वप्न देखता हूँ मैं
ऐसी ही दुनिया का!!
Walt Whitman - (1819 - 1892) की कविता का भावानुवाद

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