Sunday, 14 June 2026

Leisure ---- W.H. Davies

कितना नीरस है यह जीवन 

चिंताओं में डूबे  हम 

भाग - दौड़ में लगे हैं  रात दिन

 कि पल भर भी ठहर नहीं पाते 

प्रकृति के सौंदर्य को 

आँख भर देखने।


फुर्सत नहीं  मिलती कभी 

पेड़ की छाया में  खड़े होकर 

भेड़ों और गायों   की तरह 

देर तक देखने की।


जंगलों से गुजरते हुए 

देख नहीं पाते कभी 

सयानी गिलहरियों को 

अपने मेवे और दानों को 

 घास में छिपाते।


 नहीं देख पाते उन 

बहती जलधाराओं को 

दिन के उजाले में 

तारों भरे आकाश की तरह 

जगमगाते।

 

अवकाश नहीं मिलता  कभी 

प्रकृति- सुन्दरी के नयनों  में झाँकने का

या मुग्ध  हो  

कर निहारना 

उसके नृत्य -रत  चरणों को।


  ठहरना यह देखने कि 

उसकी आँखों में जन्मी

 हल्की सी मुस्कान 

कैसे खिल उठती है 

अधरों तक पहुँच कर।


  सचमुच, बड़ा  ही निर्धन है वह जीवन 

जो जकड़ा रहता चिंताओं के जाल में 

 मुक्त नहीं हो पाता कभी भी जाने को 

 आस -पास बिखरे सौंदर्य  के ख़ज़ाने तक.


      W. H. Davies ki  " Lesure" poem ka whanuwad


           W. H. Davies की कविता Leisure आधुनिक जीवन की व्यस्तता पर एक सरल किन्तु गहरी टिप्पणी है। कवि प्रश्न करता है कि यदि मनुष्य के पास प्रकृति कि सुंदरता को देखने और उसका आनंद लेने का समय ही न हो तो ऐसा जीवन कितना अधूरा है. कवि का विचार है कि जीवन केवल काम, दौड़ -भाग और चिंताओं का नाम नहीं  है, प्रकृति के सौंदर्य का अनुभव करना भी जीवन का एक आवश्यक पक्ष है। यह रचना पाठक को कुछ ठहर कर अपने आस - पास की दुनिया को देखने और जीवन के छोटे - छोटे आनंदों को महसूस करने की प्रेरणा देती है।

            

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