अपने सपनों को जीवित रखो
प्राणपण से रक्षा करो उनकी
उनके निष्प्राण हो जाने से-
अक्षम हो जायेगा तुम्हारा जीवन,
उस टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह
जो चाह कर भी उड़ नहीं सकती।
मजबूती से पकड़े रहो उनको
यदि वे फिसल गये हाथों से
तो तुम्हारा जीवन बन जायेगा
बर्फ़ में दबे खेतोँ जैसा अनुर्वर
जिसमें कुछ भी उग नहीं सकता।
धन की सीमाओं का सत्य तो बता चुके हैं
ईसा से लेकर गाँधी तक
क्या असीसी के संत फ्रांसिस भी
सिद्ध नहीं करते इसकी निस्सारता?
अच्छाई की गरिमा अनायास ही -
पीछे छोड़ देती है राज -शक्तियों को
करुणा का प्रभामण्डल चमकता है -
रत्नजटित सोने के मुकुट से अधिक,
और प्रेम के ओस कण धूमिल कर देते हैं -
हीरे की आभा को भी -
अपनी अप्रतिम जगमगाहट से।
( Langston Hughes की कविता 'Dreams' का भावानुवाद )

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