Sunday, 31 May 2026

एकांत का गान ( Ode To Solitude by Alexandar Pope )

      कितना सुखी है वह  इंसान -

     जिसकी सारी  इच्छायें , चिंतायें-

     सिमटी हों अपनी पैतृक धरती की -

     सीमाओं के भीतर।

      जो संतुष्ट हो विरासत में मिले,

       चंद खेतों के बीच रहकर 

      अपनी जन्मभूमि की हवा में,

      सुखपूर्वक साँस लेते हुए।

    

       जिसके पशुधन से  प्राप्त होता हो -

       अमृत सा निर्मल दूध,

       खेतों से  पोषण के लिये  भरपूर अन्न 

       और भेड़ों से शरीर के लिये ऊनी वस्त्र।

      वृक्षों से मिलती हो ग्रीष्म ऋतु में छाया 

       और शीतकाल में  ठिठुरने से बचाता,

           बहुमूल्य ईंधन।


       धन्य है वह  संतोषी  आदमी --

      जो स्वस्थ तन और शांत मन के साथ -

      निश्चिन्त भाव से देखता रहता -

      समय के अदृश्य कारवाँ को -

      घंटों, दिनों और वर्षों को लेकर 

      निः शब्द गुजरते हुए।

   

      परिश्रम , अध्ययन और विश्राम से -

      संतुलित दिनचर्या के उपरांत -

     जिसको सुलभ हो गहन निद्रा का वरदान -

      अनुप्राणित हो  जिसका जीवन संघर्ष -

     निष्कपट विनोद और शांत आत्म मंथन से। 


     चाहता हूँ कि  जी सकूँ उसी की तरह मैं भी,

      अनदेखा, अनजान रहते हुए, 

      मेरी मृत्यु पर न तो  कोई शोक मनाये 

      और न  ही लगाया जाये  शिलालेख -

       मेरी समाधि पर,

      यह बताने कि कहाँ लेटा हुआ हूँ मैं -

       चिर निद्रा में।

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