Friday, 15 May 2026

हार न मानो कभी




                                    जब  स्थितियाँ प्रतिकूल हो गयी हों,

                                   और कठिन होता जा रहा हो रास्ता -

                                   जब  जेब हो हल्की और कर्ज़ का बोझ भारी,

                                   मुस्कराना चाहो पर  ह्रदय से आह निकले,

                                    जब चिंताओं का बोझ दबा रहा हो तुम्हे।

   

                                        तब थोड़ा  विश्राम अवश्य कर लेना,

                                      किन्तु हार मान कर रुकना नहीं!


                                    कदम - कदम पर अहसास होता है,

                                    कि अनेक-उतार -चढ़ाओं-

                                        और अप्रत्याशित मोड़ों से  भरा -

                                     बड़ा ही विचित्र है यह जीवन -पथ!


                                     कई बार जीत के बहुत पास पहुंचकर भी,

                                      असफल हो जाते हैं हम,

                                      काश हार नहीं मानी होती -

                                       तो  शायद जीत गये होते।


                                      इस लिये चलते रहो बिना रुके,

                                      भले ही गति धीमी हो जाये,

                                       निरंतर बढ़ते कदम ही तुम्हें -

                                       पहुँचा सकते हैं सफलता के शिखर पर।


                                       सच है कि विफलता के अंतर में ही -

                                        छिपी रहती है स्वर्णिम सफलता,

                                       संशय के काले बादलों के बीच चमकती -

                                            आकाशीय बिजली सी।


                                        कभी - कभी तुम नहीं जान पाते,

                                        कि कितने पास पहुँच गये हो,

                                         तुम अपनी मंज़िल के,

                              यद्यपि वह तुम्हें  अब  भी बहुत दूर प्रतीत होती हो ।  

      

                                              जीत पाने के लिये लड़ते रहना होगा तुम्हें,

                                              बड़े से बड़ा आघात झेलते हुए,

                                             विकटतम युद्ध में भी-,

                                             डटे रहना होगा मोर्चे पर!

                      

   

                             Don't Quit -- Edgar A. Guest - 1881-- 1959

                    यह संघर्ष के दिनों में हार  न मानने  की प्रेरणा देने वाली कविता है!                                        जीवन में ऐसे पल भी आते हैं जब सारे प्रयास निष्फल दिखाई देते हैं और                                मंज़िल बहुत दूर प्रतीत होती है। कवि ऐसे क्षणों में धैर्य बनाए रखने और                                  प्रयास जारी रखने का सन्देश देता है। कविता की सरल और सहज भाषा इसे                            सीधे  पाठक के ह्रदय तक पहुँचाती है। इसका मूल विश्वास है कि असफलता                           अंतिम सत्य नहीं होती। कई बार सफलता उस बिंदु के ठीक आगे प्रतीक्षा कर रही                     होती है जहाँ मनुष्य हार मानने वाला होता है।  यह कविता दृढ़ता और आशा का                       प्रेरक  स्वर है।




Sunday, 10 May 2026

आस का पंछी

   



   आशा --

  एक नन्ही सी चिड़िया -

   जो रहती मन के भीतर -

   निरन्तर  गुनगुनाती -

  शब्दहीन गीत।


   आँधियों  के बीच भी -

  सुनाई देता है उसका मीठा संगीत -

भला कौन सा तूफान  -- 

विचलित कर पायेगा उसे -

जो रखती अगणित ह्रदयों को -

जीवन - ऊष्मा से अनुप्राणित?


 मैंने सुना है उसका गान -

हिमशीतल प्रदेशों में -

और अजनबी समुद्रोँ के बीच -- 

किन्तु विषमतम परिस्थिति में भी -

नहीं माँगा उसने मुझसे -

रोटी का एक टुकड़ा!!


 परिचय --

 एमिली डिकिंसन  की यह कविता आशा की अदम्य  शक्ति का सुन्दर प्रतीकात्मक चित्रण करती है। कवयित्री ने आशा की तुलना एक छोटे पंखों वाली चिड़िया से की है जो स्थायी रूप से मानव - ह्रदय में निवास करती है और निरंतर मधुर गीत गाती रहती है। जीवन के कठिनतम  क्षणों, तूफानों और अन्य विपरीत परिस्थितियों में भी यह हमारा साथ नहीं छोड़ती। विशेष बात यह है कि यह बदले में हमसे कुछ नहीं माँगती।

सरल प्रतीकों के माध्यम से यह कविता जीवन में आशा की अटूट उपस्थिति और उसकी प्रेरणादायी शक्ति को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है।

Saturday, 9 May 2026

मेरी प्रार्थना


     मेरे प्रभु!

मैं तुमसे इस लिये प्रार्थना नहीं करता -

कि मुझ पर कभी कोई संकट न आयें -

किन्तु इसलिए कि कर सकूँ उनका सामना -

     निर्भीक हो कर।


मैं नहीं माँगता कि स्वयं ही -

शांत हो जाये मेरी पीड़ा -

अपितु यह, कि उस पर विजय पा सके -

   मेरा ह्रदय!


संकट आने पर भयभीत होकर -

प्राण रक्षा के लिये आकुल न हो जाऊँ -

बल्कि धैर्य पूर्वक संघर्ष कर सकूँ -

अपनी स्वतंत्रता के लिये।


वरदान दो मुझे मेरे प्रभु!

कि मैं कायर न बनूँ कभी,-

कि महसूस कर सकूँ तुम्हारी दया को -

केवल अपनी सफलता में नहीं -- 

विफलताओं में भी मुझे -

मिलता रहे तुम्हारा साथ।


              गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर (1881 -1941)की कविता का भावानुवाद

        गुरुदेव टैगोर की यह प्रार्थनात्मक कविता मनुष्य को बाहरी कृपा की अपेक्षा आतंरिक शक्ति की ओर ले जाती है।  वे  ईश्वर से यह नहीं माँगते कि जीवन की कठिनाइयाँ उनसे दूर कर दी जाएँ, वे प्रार्थना करते हैं कि कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति उन्हें प्राप्त हो। इस दृष्टि से प्रार्थना याचना नहीं, आत्म -बल का जागरण बन जाती है। कविता का आध्यात्मिक स्वर मनुष्य को निर्भयता, धैर्य और आत्म - विश्वास कि ओर प्रेरित करता है। कवि की मान्यता है कि ईश्वर से सबसे बड़ी प्रार्थना संकटों से मुक्ति के लिए नहीं, अपितु उन्हें सहने और पार करने की शक्ति माँगना है।




Tuesday, 5 May 2026

यदि तुम..


   यदि तुम  रख सको स्वयं  को संयत -

  जब तुम्हारे आस -पास के लोग -

   आत्म - नियंत्रण खो रहे हों --

  और मढ़ रहे हों सारा दोष  तुम पर।


    जब सब तुम पर संदेह करें -

    किन्तु तुम बनाये रखो आत्मविश्वास -

     उनके संदेह को भी -

     ध्यान में रखते हुए।


    

      तुम प्रतीक्षा करो  बिना रुके,थके -

     झूठ का शिकार  बनने पर भी -

      बदले में झूठ का सहारा न लो -

      घृणा  किये जाने पर भी -

      घृणा करने से बच सको -

     और कोशिश न करो  कभी -

   अत्यधिक भला और समझदार दिखने की।


   यदि तुम सपने देखो -

   किन्तु उनके वश में हो जाने से बचो -

  विचारों का स्वागत तो करो -

   किन्तु उनमें ही उलझकर न रह जाओ।


यदि हार और जीत दोनों को ही -

एक समान भ्रामक मान सको -

  और  करो दोनों  स्थितियों  को -

      समभाव से स्वीकार।


यदि सह सको अपनी कही सत्य बातों को -

किन्ही कुटिल जनों द्वारा -

तोड़ मरोड़ कर, भोले लोगों को -

फँसाने हेतु प्रयोग होते देखना।


यदि जीवन भर के परिश्रम से बनी -

चीजों को टूटा देख,

 बिना  विचलित हुए झुक कर -

जुट सको उन्हें फिर  से जोड़ने में।


यदि अपनी सारी कमाई को  इकठ्ठा कर -

 हार या जीत के लिये --

 एक साथ दाँव पर लगा सको,

 और सब कुछ हार बैठो।

 

किन्तु फिर भी सब  भूलकर -

कर सको एक नई शुरुआत -

अपने भारी नुकसान का -

ज़िक्र तक किये बिना ।


यदि तन, मन और मस्तिष्क को -

उनके थक जाने के बाद भी -

काम पर लगाए रखो -

और बने रहो उनके साथ।


 जब तक शेष न हो जाये -

तुम्हारी  अपनी संकल्प शक्ति -

जो कहती रहती है निरंतर -

 " रुको मत, डटे रहो "।


यदि तुम  भीड़  के बीच भी -

अपने गुण बनाये रख सको -

और राजाओं की संगति में भी -

 बने रहो साधारण जन।


 यदि आहत न कर पायें -

 तुम्हें तुम्हारे शत्रु -

 अथवा परम स्नेही मित्र -

तुम विश्वास करो सब पर -

किन्तु अत्यधिक किसी पर नहीं।



 अपने अमूल्य समय के हर मिनट की -

     पूरे साठ क्षणों की अवधि  को -

    सार्थकता से  भर कर सको,


तो यह धरती, और उस पर जो कुछ है -

सब तुम्हारा हो जायेगा -

और उस से भी  बढ़ कर -

तुम बन जाओगे एक सच्चे मनुष्य, 

मेरे प्यारे बेटे!!





  A transcreation of Rudyard Kipling's   (1865-1936)     renowned poem "IF"

      यह कविता जीवन के लिए धैर्य,  आत्म - संयम, साहस और संतुलित व्यक्तित्व का सन्देश प्रस्तुत करती है। कविता में सफलता और विफलता, विजय और पराजय, विश्वास और संदेह -- इन सभी के बीच संतुलन बनाऐ रखने की सीख दी गई है। कवि के अनुसार सच्ची परिपक्वता केवल उपाधियाँ अर्जित करने में नहीं, अपितु विपरीत परिस्थितियों में आत्म - विश्वास बनाए रखने में है। कविता का स्वर प्रेरक होने के साथ-साथ गहरे मानवीय अनुशासन की ओर संकेत करता है। यह पाठक को परिस्थितियों से ऊपर उठ कर संयम, दृढ़ता और गरिमा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।



     

      

Saturday, 25 April 2026

INVICTUS

        Out of night that covers me

       Black as the pit from pole to pole 

     I thank whatever gods may be 

     For my unconquerable soul.



       In the fell clutch of circumstances 

   I have not winced nor cried aloud 

   Under the bludgeoning of chance 

   My head is bloody  but unbowed.


    Beyond the place of wrath and tears 

  Looms but the horror of shade

  And yet the menace of the years

 Finds and shall find me unafraid.


It matters not how strait the gate

 Charged with punishments the scroll

       I am the master of my fate

       I am the captain of my soul.


      William Ernest Henley 

      From the collection Life And Death

Thursday, 23 April 2026

सफलता का स्वाद

     
                               सफलता सबसे अधिक  मीठी लगती उन्हें -

                                      जो कभी सफल न हो सके हों ...

                               अमृत का असली स्वाद  जानने के लिये - 

                                      प्यास भी तीव्र होनी चाहिए न!


                                         जीत का ध्वज  लिये लौटता -

                                           विजयी सेना का कोई सैनिक -

                                    नहीं कर सकता  जीत की ख़ुशी को -

                                        उतनी अच्छी तरह परिभाषित -


                                       जितना कि  युद्ध भूमि में घायल पड़ा -

                                         पराजित पक्ष का वह सैनिक -

                                        जो अपनी टूटती साँसों के बीच 

                                        विवश हो कर सुन रहा होता है --


                                           दूर -- शत्रु के शिविर से आ रही  -

                                        उसके लिये वर्जित और पीड़ाजनक -

                                             विजयोत्सव के नगाड़ों की -

                                                    कर्कष  आवाज़ ...।

           

          Transcreated from the poem  'Success is Counted Sweetest' -      --  Emily Dickinson ---1830- 1886

एमिली की यह कविता सफलता के मूल्य को एक  सूक्ष्म दृष्टि से देखती है। कवयित्री का संकेत है कि सफलता का वास्तविक स्वाद वही व्यक्ति सबसे गहराई से समयझ सकता है जो उससे वंचित रहा हो। जिस वस्तु की सहज उपलब्धता होती है उसका मूल्य प्रायः  उतना  प्रतीत नहीं होता जितना उसकी कमी का अनुभव करने वाला व्यक्ति  करता है। कविता सफलता और उसके अभाव के बीच एक गहरा विरोधाभास रचती है। यह हमें उपलब्धियों को केवल बाहरी विजय के रूप में नहीं बल्कि संघर्ष, प्रतीक्षा और आकांक्षा से जुड़े अनुभव के रूप में समझने की दृष्टि देती है।


 


              

Sunday, 19 April 2026

अकारथ नहीं होगा मेरा जीना..


   



                                                  जीना अकारथ नहीं होगा मेरा,

                                                   यदि रोक सकूँ एक भी दिल को -

                                                  टूटने से!

                                                       बँटा सकूँ किसी की पीड़ा को,

                                                 कम कर पाऊँ साझा करके!


                                                ज़मीन पर गिर पड़े किसी पंछी को,

                                              Rउसके घोंसले तक पहुँचने में कर सकूँ  --

                                           थोड़ी सी मदद!


                                               तो समझूँगी कि निष्फल  नहीं हुआ    --

                                    मेरा जीवन! 



     A transcreation of Emily Dickinson's poem" I Shall Not Live In               Vain " 

यह  कविता जीवन के अर्थ को किसी महान उपलब्धि से नहीं, अपितु किसी दूसरे के जीवन  को स्पर्श कर सकने की क्षमता में खोजती है।  यदि किसीके छोटे से प्रयास से किसी 
पीड़ित हृदय को राहत मिले, किसी पक्षी को सहारा मिले, या किसी के जीवन में आशा का संचार हो तो  उस मनुष्य का जीना सार्थक हो जाता है।कविता का सौंदर्य इसकी विनम्र मानवीय दृष्टि में है. यह हमें बताती है कि जीवन की सार्थकता हमेशा बड़े कार्यों में नहीं होती, संवेदना से किया गया एक छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत बड़ा अर्थ रख सकता है।