जब स्थितियाँ प्रतिकूल हो गयी हों,
और कठिन होता जा रहा हो रास्ता -
जेब हल्की और कर्ज़ भारी हो गया हो,
मुस्कराना चाहो किन्तु दिल से आह निकले,
और चिंताओं का बोझ दबा रहा हो तुम्हें.
तब थोड़ी देर विश्राम अवश्य कर लेना,
किन्तु हार मान कर रुकना नहीं!
कदम - कदम पर हमें अहसास होता है,
कि अनेक उतार - चढ़ाओं
और अप्रत्याशित मोड़ों से भरा -
बड़ा ही विचित्र है यह जीवन -पथ!
कई बार जीत के बहुत पास पहुंचकर भी,
असफल हो जाते हैं हम,
जब कि यदि हार नहीं मानी होती -
तो शायद जीत गये होते.
इस लिये चलते रहो बिना रुके,
भले ही गति धीमी हो जाये,
निरंतर आगे बढ़ते कदम ही तुम्हें -
पहुँचा सकते हैं सफलता के शिखर पर.
सच है कि विफलता के अंतर में ही -
छिपी रहती है स्वर्णिम सफलता,
संशय के काले बादलों के बीच चमकती -
आकाशीय विद्युत की तरह.
कभी - कभी तुम नहीं जान पाते,
कि कितने पास पहुँच गये हो,
तुम अपनी मंज़िल के,
जबकि वह तुम्हें बहुत दूर लग रही है.
जीत पाने के लिये लड़ते रहना होगा तुम्हें,
बड़े से बड़ा आघात झेलते हुए,
विकटतम युद्ध में भी-,
डटे रहना होगा मोर्चे पर!
A transcreation of "Don't Quit" a poem by Edgar A. Guest (1881-- 1959)
No comments:
Post a Comment