मेरे प्रभु!
मैं तुमसे इस लिये प्रार्थना नहीं करता -
कि मुझ पर कभी कोई संकट न आयें -
किन्तु इसलिए कि कर सकूँ उनका सामना -
निर्भीक हो कर।
मैं नहीं माँगता कि स्वयं ही -
शांत हो जाये मेरी पीड़ा -
अपितु यह, कि उस पर विजय पा सके -
मेरा ह्रदय!
संकट आने पर भयभीत होकर -
प्राण रक्षा के लिये आकुल न हो जाऊँ -
बल्कि धैर्य पूर्वक संघर्ष कर सकूँ -
अपनी स्वतंत्रता के लिये।
वरदान दो मुझे मेरे प्रभु!
कि मैं कायर न बनूँ कभी,-
कि महसूस कर सकूँ तुम्हारी दया को -
केवल अपनी सफलता में नहीं --
विफलताओं में भी मुझे -
मिलता रहे तुम्हारा साथ।
(गुरुदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर की कविता का भावानुवाद)

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