एकांत का गान
कितना सुखी है वह इंसान
जिसकी सारी इच्छायें, चिंतायें
सिमटी हों अपनी पैतृक धरती की -
सीमाओं के भीतर।
जो संतुष्ट हो विरासत में मिले,
चंद खेतों के बीच रहकर
अपनी जन्मभूमि की हवा में,
सुखपूर्वक साँस लेते हुए।
जिसके पशुधन से प्राप्त होता हो -
अमृत सा निर्मल दूध,
खेतों से पोषण के लिये भरपूर अन्न
और भेड़ों से शरीर के लिये ऊनी वस्त्र।
वृक्षों से मिलती हो ग्रीष्म ऋतु में छाया
और शीतकाल में ठिठुरने से बचाता,
बहुमूल्य ईंधन।
धन्य है वह संतोषी आदमी --
जो स्वस्थ तन और शांत मन के साथ -
निश्चिन्त भाव से देखता रहता -
समय के अदृश्य कारवाँ को -
घंटों, दिनों और वर्षों को लेकर
निः शब्द गुजरते हुए।
परिश्रम , अध्ययन और विश्राम से -
संतुलित दिनचर्या के उपरांत -
जिसको सुलभ हो गहन निद्रा का वरदान -
अनुप्राणित हो जिसका जीवन संघर्ष -
निष्कपट विनोद और शांत आत्म मंथन से।
चाहता हूँ कि जी सकूँ उसी की तरह मैं भी,
अनदेखा, अनजान रहते हुए,
मेरी मृत्यु पर न तो शोक मनाये कोई
और न ही लगाया जाये शिलापट्ट
मेरी समाधि पर,
यह बताने कि यहाँ सोया हुआ हूँ मैं -
चिर निद्रा में।
Ode To Solitude -- Alexander Pope 16888--1744)
अंग्रेज़ कवि Alexendar Pope की यह कविता शांत, सरल और आत्मनिर्भर जीवन की आकांक्षा को अभिव्यक्त करती है। कवि ऐसी जीवन - शैली की कल्पना करता है जिसमें बाहरी वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा प्रकृति, स्वास्थ्य, आत्मिक संतोष और मन की शांति को अधिक महत्व मिले। एकांत यहाँ अकेलेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्म - चिंतन और स्वतंत्र जीवन का अवसर है। कविता भौतिक उपलब्धियों की चमक से दूर उस संतुलित जीवन की ओर संकेत करती है जिसमें मनुष्य प्रकृति के निकट रहकर संतोष और आत्मिक स्वतंत्रता का अनुभव कर सके।




