उस काली रात से निकल कर -
जो मुझे चारों ओर से घेरे है -
मैं अपना आभार भेजता हूँ -
उन सब ज्ञात - अज्ञात देवताओं को -
जिनकी कृपा से मिली है मुझे -
मेरी यह अजेय आत्मा.
अनगिनत आपदाओं की कठोर गिरफ्त में भी मैं -
कभी विचलित नहीं हुआ -
और न ही किया मैंने करुण विलाप.
दुर्योग के कठोर प्रहारों से -
रक्त - रंजित भले ही हुआ मेरा शीश -
किन्तु झुका नहीं कभी.
क्रोध और आँसुओं से भरी इस दुनिया में -
फैला है चारों ओर अंधकार का भय-
किन्तु राह में आये संकटों ने मुझे सदैव निर्भीक पाया -
और ऐसा ही होगा आगे भी.
तनिक परवाह नहीं मुझे कि-
कितना दुर्गम होगा मेरा रास्ता -
कितने अभियोग, कितने दंडादेश -
अंकित हैं मेरे भाग्य लेख में।
क्योंकि मुझे विश्वास है कि --
कि मैं स्वयं अपने भाग्य का स्वामी हूँ -
और अपनी अजेय आत्मा का नियंता भी।
( A transcreation of William Ernest Henley's poem INVICTUS )

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