कभी किसी ऐसे संवेदनशून्य व्यक्ति को देखा है -
जिसके ह्रदय मे देश के लिये प्रेम न हो -
जिसने कभी भाव - विह्वल हो कर -
अपने आप से न कहा हो -
" यह मेरी जन्मभूमि है, मेरी अपनी जन्मभूमि!"?
विदेश में घूमकर आने के बाद -
अपनी धरती की ओर कदम बढ़ाते हुए -
प्रफुल्लित न हो जाता हो जिसका ह्रदय?
क्या सचमुच कहीं कोई है ऐसा?
यदि हाँ, तो जाओ-
पहचान लो उसको भली भाँति।
उसके सम्मान में कभी कोई कविता -
नहीं लिखी जाती, और न ही गाया जाता है -
कोई प्रशंसा गीत।
भले ही कितनी बड़ी उपाधियाँ -
जुड़ी हों उसके नाम के साथ,
अकूत धन-सम्पदा और शक्तियों का -
स्वामी होने के बल पर।
किन्तु केवल संकीर्ण स्वार्थ में डूबा -
वह अभागा तो निश्चित रूप से एक दिन -
खो देगा सारा नाम, वैभव और प्रभाव,
अपने जीते जी ही,
और यह स्थिति मरण से कम -
नहीं होगी उसके लिये।
जीवन के अंत में -
जब मृत्यु दूसरी बार उसके पास आयेगी -
तो चला जायेगा चुपचाप दुनिया से -
उसी तुच्छ माटी में मिलने के लिये -
जिससे जन्मा था वह कभी।
किन्तु उसके जाने पर-
न कहीं शोक के आँसू बहाये जायेंगे -
और न ही किया जायेगा कोई स्तुतिगान -
उसके सम्मान में।
Breathes There The Man - Sir Walter Scott (1771-1832)
सर वाल्टर स्कॉट की यह कविता मातृभूमि के प्रति प्रेम और मनुष्य की अपनी जन्मभूमि से जुड़ी भावनात्मक पहचान को व्यक्त करने वाली प्रभावशाली रचना है। कवि उस व्यक्ति के अस्तित्व पर प्रश्न उठाता है जिसके ह्रदय में अपनी जन्मभूमि के लिए प्रेम और गौरव की भावना नहीं है। कविता में मातृभूमि केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है अपितु वह पहचान, स्मृतियों और आत्मीय संबंधों का प्रतीक बन जाती है। इसकी भाव - भूमि देशप्रेम से आगे बढ़कर मनुष्य और उसकी जड़ों के बीच गहरे सम्बन्ध को उजागर करती है.
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