क्या यह पहाड़ी रास्ता -
बार - बार मुड़ता जाएगा?
हाँ, अपने अंतिम पड़ाव तक।
क्या यह यात्रा-
पूरे दिन चलती रहेगी?
हाँ, मेरे दोस्त, सुबह से शाम तक।
किन्तु रात में विश्राम के लिए -
कोई ठौर तो होगा न?
हाँ, मिलेगी एक छत,
जब अंधेरा उतरने लगेगा।
क्या अँधेरे में -
मैं उसे देख पाऊँगा?
तुम उसे अवश्य देख लोगे।
क्या वहाँ मुझे -
कुछ और यात्री भी मिलेंगे?
हाँ, वे -
जो तुमसे पहले वहाँ पहुँच चुके हैं.
तो क्या मुझे -
द्वार खटखटाना या उन्हें -
पुकारना होगा?
नहीं, वे तुम्हें प्रतीक्षा नहीं कराएँगे।
क्या यात्रा की थकान से-
शिथिल हुए मेरे शरीर को -
आराम मिलेगा वहाँ?
हाँ,
तुम्हारे श्रम का उचित प्रतिफल,
तुम्हें अवश्य मिलेगा।
क्या वहाँ शैयायें होंगी -
मेरे और आने वाले अन्य सब के लिए?
हाँ, पर्याप्त शैयायें हैं -
उन सब के लिए --
जो वहाँ आते हैं।
Transcreated from the original Poem " Up-- Hill "---- by Christina Rossetti -1830-- 1894
Christina Rossetti की यह कविता जीवन - यात्रा को एक कठिन
ऊँचाई की ओर बढ़ते मार्ग के रूपक में प्रस्तुत करती है यहाँ एक यात्रीऔर पथ -प्रदर्शक के बीच एक संवाद चलता है। यात्री प्रश्न करता है और उसका गाइड अपने उत्तरों से उसको आश्वस्त करता है। इस संवाद के माध्यम से जीवन की कठिनाइयों, थकान और अंतिम विश्राम की ओर संकेत किया गया है। मार्ग चाहे कितना ही लम्बा और कठिन क्यों न हो, यात्री के लिए सहारा और विश्रामके लिए स्थान उपलब्ध है। इस सरल संवाद में जीवन के संघर्ष के साथ एक गहरी आध्यात्मिक आश्वस्ति जुड़ी हुई है कि हमें कठिन यात्रा से घबराने के बजाय विश्वास और धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए।






