Sunday, 1 November 2026

Ode to the West Wind


हे प्रचंड पश्चिमी पवन!.

तुम जो साँस हो पतझड़ की --

जिसकी अदृश्य उपस्थिति - 

निर्जीव सूखी पत्तियों को -

उड़ा ले जाती है बरबस -.

जादूगर से भयभीत -

प्रेतात्माओं की तरह!


पीली, काली, फीके और गहरे लाल रंग की -

महामारी की शिकार जैसी अनगिनत पत्तियों को 

तुम पहुँचा देती हो उनकी -

अँधेरी, शीतकालीन समाधि में,

जहाँ वे पड़ी रहती हैं -

अपने पँखों वाले बीजों के साथ 

दबी - ढकी, निष्क्रिय अवस्था में - 

मृत शरीरों की तरह।


जब तक तुम्हारी वसंत की नीली बहन

अपनी सुमधुर पुकार से 

 स्वप्न में डूबी  हुई धरती को 

जगा नहीं देती -

और सुन्दर कलियों  को हवा में खिला कर 

उनके जीवंत रंगों और सुगन्धियों से 

 सिंचित नहीं कर देती -

सारे मैदानों और पर्वत प्रदेशों को!


ओ उग्र आत्मा!

तुम जो विचरण कर रही हो सर्वत्र --

विनाशक पुसृ 

बारी - बारी, 

सुनो!   ज़रा सुनो  तो मेरी  बात!


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