हे प्रचंड पश्चिमी पवन!.
तुम जो साँस हो पतझड़ की --
जिसकी अदृश्य उपस्थिति -
निर्जीव सूखी पत्तियों को -
उड़ा ले जाती है बरबस -.
जादूगर से भयभीत -
प्रेतात्माओं की तरह!
पीली, काली, फीके और गहरे लाल रंग की -
महामारी की शिकार जैसी अनगिनत पत्तियों को
तुम पहुँचा देती हो उनकी -
अँधेरी, शीतकालीन समाधि में,
जहाँ वे पड़ी रहती हैं -
अपने पँखों वाले बीजों के साथ
दबी - ढकी, निष्क्रिय अवस्था में -
मृत शरीरों की तरह।
जब तक तुम्हारी वसंत की नीली बहन
अपनी सुमधुर पुकार से
स्वप्न में डूबी हुई धरती को
जगा नहीं देती -
और सुन्दर कलियों को हवा में खिला कर
उनके जीवंत रंगों और सुगन्धियों से
सिंचित नहीं कर देती -
सारे मैदानों और पर्वत प्रदेशों को!
ओ उग्र आत्मा!
तुम जो विचरण कर रही हो सर्वत्र --
विनाशक पुसृ
बारी - बारी,
सुनो! ज़रा सुनो तो मेरी बात!

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