हे मेरे प्रभु!
तुमसे विनती है कि -
मेरे हृदय की दरिद्रता को -
समूल मिटा डालो -
उस पर बार - बार प्रहार करके।
शक्ति दो मुझे देव -
सुख - दुःख दोनों को ही -
समान भाव से सहज रहकर -
सहन करने की।
शक्ति दो कि निर्बलों, निर्धनों से -
कभी विमुख न होऊँ -
और न कभी घुटने टेकूँ -
धृष्ट और दम्भी शक्तियों के समक्ष।
यह भी कि मन - मस्तिष्क को -
ऊपर उठा सकूँ -
नित्य प्रति की क्षुद्र बातों से -
और रह सकूँ उनसे अप्रभावित।
शक्ति दो कि अपने प्रेम को -
सेवा में फलीभूत कर सकूँ,
कर सकूँ स्वयं को तुम्हें समर्पित -
सम्पूर्ण प्रेम के साथ।
गीतांजलि --38
हिन्दी भावानुवाद
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