शीश ऊँचा, और -
ज्ञान स्वतंत्र
जहाँ संसार को --
बाँटा न गया हो छोटे - छोटे टुकड़ों में
संकीर्ण घरेलू दीवारों द्वारा
जहाँ शब्द मुख से नहीं
सत्य की गहराई से निकलते हों
जहाँ अथक प्रयास
पसारता हो अपनी बाँहें
पूर्णता की ओर.
जहाँ विवेक की निर्मल जलधारा
जड़ रूढ़ियों की रेतीली धरती में
खो न गई हो.
जहाँ तुम्हारे निर्देशन में
मन अग्रसर हो निरंतर व्यापक होते
विचार और कर्म की दिशा में --
उस स्वाधीनता के स्वर्ग में
मेरे देश को जागृत होने दो -
हे मेरे पिता!
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