Wednesday, 22 July 2026

Desiderata ---- एक जीवन - दर्शन



       कोलाहल और  उतावली के बीच भी 

       तुम  शांतचित्त रह कर आगे बढ़ते रहो 

       और  स्मरण रखो कि -

        मौन  में भी निहित रहती है -

       गहन शांति।


     जहाँ तक संभव हो -

    सबके साथ सौहार्द बनाए रखो,

    अपने स्वाभिमान से समझौता किए बिना।


     सरल और शांत स्वर में कहो अपनी बात,

    और दूसरों की भी धैर्यपूर्वक सुनो,

     चाहे वे नीरसता और अज्ञानता से भरी हों -

    क्योंकि हर व्यक्ति के पास -

  अपनी एक अलग कहानी होती है -


आक्रामक और उपद्रवी लोगों से बच कर रहो 

    वे तुम्हारे मन की शांति भंग कर देते हैं,

    अपनी तुलना दूसरों से मत करो,

  क्योंकि  यदि तुम ऐसा करोगे

   तो कभी अभिमान का अनुभव होगा,

    और कभी हीनता का, क्योंकि -

  तुमसे अधिक और तुमसे कम सफल लोग -

          संसार में हमेशा ही रहेंगे।


   अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का आनंद लो,

   और अपने व्यवसाय में  रूचि बनाए रखो,

    चाहे वह कितना ही साधारण हो,

    समय के निरंतर बदलते प्रवाह में -

     वही तुम्हारी नैया पार लगाएगा ।


        कामकाज सम्बन्धी व्यवहार में सावधान रहे,

        क्योंकि यह दुनिया छल - छद्म  से भरी है।

        किन्तु उन अच्छाइयों से विमुख न हो जाना,

         जो तुम्हारे चारों ओर विद्यमान हैं -

         अनेक लोग  उच्च आदर्शो के लिए -

          सतत प्रयत्नशील हैं इस विश्व - मंच पर-

             वीर और आदर्श नायकों की यहाँ 

                    कोई कमी नहीं।


           तुम जैसे हो वैसे ही बने रहो

            अपने प्रति सदैव ईमानदार,

           विशेषतः प्रेम के विषय में --

            न प्रेम  का दिखावा करो -

           और न ही उसके प्रति संशय पालो,

          क्योंकि जीवन की समस्त शुष्कता-

           और निराशा के बावजूद-- 

          दूब घास की तरह  शाश्वत 

              और जीवंत रहता है प्रेम।

            

       बीतते वर्षों से मिलती सलाह को- 

           शालीनता से स्वीकार करो,

          और  विदा करो गरिमापूर्वक 

          युवावस्था के मोह को।

        

          आत्म -बल  को बढ़ाते रहो निरंतर 

         ताकि अकस्मात  आने वाली विपदा का,

          दृढ़ता से सामना  किया जा सके.

         किन्तु काल्पनिक आशंकाओं  से,

          स्वयं को व्यथित  मत करो।

          जीवन में अधिकांश  भय --

          थकान और  अकेलेपन से जन्म लेते हैं। 


      समुचित अनुशासन में  जीते हुए,

          स्वयं के प्रति भी सदैव  दयालु रहो,

          तुम इस ब्रह्माण्ड की संतान हो -

       धरती के समस्त वृक्षों और आकाश के तारों की तरह - 

         तुम्हें भी पूरा अधिकार है यहाँ रहने का।


          और चाहे तुम्हें  यह स्पष्ट हो या न  हो,

                यह ब्रह्माण्ड उसी प्रकार आगे बढ़ रहा है,

                        जैसा इसे बढ़ना चाहिए।


             इसलिए ईश्वर के साथ शांति से रहो - 

             जिस रूप में भी तुम उसे मानते हो,

          तमाम उलझनों और आकांक्षाओं के बीच-

                जीवन के इस कोलाहल में,

              अपनी आत्मा में शांति बनाए रखो.


     सच तो यह है कि तमाम कपट, थकावट 

               और टूटे सपनों के बावज़ूद --

               यह एक सुन्दर दुनिया है, 

            प्रसन्न रहो, और हर परिस्थिति में -

            प्रसन्न रहने का प्रयास करते रहो।


                                                                                     


                         Desiderata by Max Ehrmann  का  हिंदी भावानुवाद 

        


    




     

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