संसार की समस्त सुन्दर वस्तुओं से प्रेम करता हूँ मैं
उन्हें खोजता हूँ और पूजता हूँ - --
ईश्वर की प्रशंसा करने का
इससे बेहतर कोई ढंग --
मुझे नहीं आता।
और आपा - धापी भरे इस जीवन में
इन्ही के द्वारा मिलता है मनुष्य को सम्मान।
चाहता हूँ, मैं भी बनाऊँ कुछ ऐसा
जो हो सुन्दर और सराहनीय
और आनंद का अनुभव करुँ
ऐसा करने में -
भले ही आने वाले कल में
मेरी रचनाएँ प्रतीत हों
नींद से जागने पर स्वप्न के निरर्थक शब्दों जैसी।
रौबर्ट ब्रिजेश (Robert Bridges --, 1844- 1930 ) की यह कविता सौंदर्य के प्रति प्रेम को एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि के लिए संसार की सुन्दर वस्तुओं को खोजना, उन्हें नमन करना, उनके माध्यम से ईश्वर की स्तुति करना -- ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा है। यहाँ केवल सुंदरता को देखने की आकांक्षा ही नहीं, अपितु स्वयं कुछ सुन्दर और सराहनीय रचने की विनम्र इच्छा भी व्यक्त होती है। कवि स्वीकार करता है कि भविष्य में उसकी रचनाएँ निरर्थक स्वपनों जैसी प्रतीत हो सकती हैं, फिर भी सृजन की उसकी आकांक्षा क्षीण नहीं होती।











