कितना नीरस है यह जीवन
चिंताओं में डूबे हम
भाग - दौड़ में लगे हैं रात दिन
कि पल भर भी ठहर नहीं पाते
प्रकृति के सौंदर्य को
आँख भर देखने।
फुर्सत नहीं मिलती कभी
पेड़ की छाया में खड़े होकर
भेड़ों और गायों की तरह
देर तक देखने की।
जंगलों से गुजरते हुए
देख नहीं पाते कभी
सयानी गिलहरियों को
अपने मेवे और दानों को
घास में छिपाते।
नहीं देख पाते उन
बहती जलधाराओं को
दिन के उजाले में
तारों भरे आकाश की तरह
जगमगाते।
अवकाश नहीं मिलता कभी
प्रकृति- सुन्दरी के नयनों में झाँकने का
या मुग्ध हो
कर निहारना
उसके नृत्य -रत चरणों को।
ठहरना यह देखने कि
उसकी आँखों में जन्मी
हल्की सी मुस्कान
कैसे खिल उठती है
अधरों तक पहुँच कर।
सचमुच, बड़ा ही निर्धन है वह जीवन
जो जकड़ा रहता चिंताओं के जाल में
मुक्त नहीं हो पाता कभी भी जाने को
आस -पास बिखरे सौंदर्य के ख़ज़ाने तक.
W. H. Davies ki " Lesure" poem ka whanuwad
फोटो साभार
श्री डी. एस. नेगी














