1999 में प्रकाशित काव्य - कृति का नवीनतम संस्करण --
Friday, 13 February 2026
Monday, 26 January 2026
रचयिता का संक्षिप्त परिचय
नाम -- स्व. ईश्वरी दत्त द्विवेदी
पिता का नाम -- स्व. पं. हरिदत्त द्विवेदी 'शास्त्री'
जन्मतिथि --- 6 जुलाई, 1923
शिक्षा ------- हाई स्कूल 1942, मिशन स्कूल, देहरादून
स्वाध्याय ------ हिन्दी, अंग्रेज़ी साहित्यिक पुस्तकों एवं संस्कृत धार्मिक ग्रंथों का सतत अध्ययन
छात्र जीवन से ही काव्य रचना में रुचि, स्थानीय पत्र - पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन
उत्तरप्रदेश पुलिस विभाग में 1946 से 1981 तक सेवारत
1981 में कार्यालय अधीक्षक के पद से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् निम्नलिखित
रचनायें :---
1. श्रीमद् भगवद् गीता का हिन्दी काव्य रूपान्तर
2. कविवर नरोत्तम दास रचित सुदामा चरित का गढ़वाली भाषा में रूपान्तर
3. महाबली कुम्भकर्ण --- खंड काव्य
4. हमारी कहानी --- पारिवारिक परिवेश पर गद्यात्मक कथ्य
निधन. 13 दिसंबर, 2008
Sunday, 18 January 2026
Addition on page 12 अनुक्रमणिका
अध्याय विषय पृष्ठ संख्या
1. 14 ---- 21
2. 22 -- 36
3. 37 -- 45
4. 46 -- 54
5. 55. 61
6. 62 ---- 71
7. 72 --- 78
8. 79 ---- 85
9. 86 ----- 93
10. 94 --- 101
11. 102 ---- 115
12. 116 ----- 120
13. 121 ------- 128
14. 128 ----- 134
15. 135 ---- 140
16. 141 ------ 145
17. 146 ----- 151
18. 152 ------ 167
Saturday, 17 January 2026
Friday, 16 January 2026
Copyright page
श्रीमद भगवद गीता : हिन्दी काव्य रूपान्तर
प्रकाशक: ईश्वरी दत्त द्विवेदी
शिव पुर, कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखंड
© लेखका धीन
इस पुस्तक के समस्त अधिकार सुरक्षित हैं। लेखक एवं प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना इस पुस्तक का कोई भी अंश किसी भी रूप में पुनर्रप्रकाशित या प्रसारित नहीं किया जा सकता।
अस्वीकरण :
यह कृति श्रीमद् भगवद् गीता का हिंदी काव्य रूपान्तर है। इसका उद्देश्य मूल ग्रन्थ के दार्शनिक संदेशों को सरल एवं काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करना है। यह किसी भी प्रकार की शास्त्रीय व्याख्या, मतान्तर या आधिकारिक भाष्य का दावा नहीं करती।
प्रथम संस्करण : -- 1999
द्वितीय संस्करण :-- 2009
तृतीय संस्करण :-- 2026
@
मुद्रण स्थान
मुंबई, महाराष्ट्र
मुद्रक --
Wednesday, 14 January 2026
Saturday, 27 December 2025
धृतराष्ट्र की व्यथा
दिव्य - दृष्टि - वरदान प्राप्त तुम
वेदव्यास से हे संजय!
युद्ध - भूमि की गतिविधि मुझको
बतलाते जाओ निर्भय.
दुर्योधन की हठधर्मी, उस पर --
मेरी ममता की डोर
खींच ले गयी सारे कुल को --
महाकाल के मुख की ओर
कुरुक्षेत्र के धर्म -धाम में
होगा अब भीषण संग्राम
पाण्डु और मेरे पुत्रों का
क्या होगा संजय! परिणाम?
युद्ध नहीं यह महाकाल का --
होगा नृत्य भयंकर
याद दिलाएंगे युग - युग तक
रक्तवर्ण माटी प्रस्तर
लिखने वाला है क्रूर काल
कुरुकुल की करुण कहानी
मिटने वाली है भव्य राष्ट्र की
गौरवमयी कहानी
जो भी हो अब देख रहे जो --
सब कुछ मुझको बतलाओ
बना लिया पत्थर है मन को
यथा घटित कहते जाओ.
( गीतेतर -- क्षमा याचना सहित)
Friday, 26 December 2025
दो शब्द
( 1)
श्रीमद्भगवद् गीता भारत की आत्मा है. भारत का धर्मग्रन्थ है. नीति शास्त्र का चितेरा है. कर्मयोग का अग्रणी शास्त्र है. इतना अधिक गंभीर है कि जिसने भी इसका अध्ययन किया, उसीने उसके अपने गूढ अर्थ निकाले. अर्थात गीता सबकी चहेती हो गयी. गीता का पढ़ना इसीलिए धार्मिक कृत्यों में गिना जाने लगा.
भारत को समझने के लिये गीता का अध्ययन आवश्यक समझा जाता है. कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान दिया, परन्तु यह ज्ञान मात्र अर्जुन को नहीं दिया गया, अपितु अर्जुन के व्याज से यह ज्ञान सर्वत्र जगत को दिया गया उद्बोधन है, जिसके माध्यम से भारत को समझने के लिये आसान मार्ग दिखाया गया है.
अब तक गीता के सैकड़ों अनुवाद हो चुके हैं. कई महत्वपूर्ण टीकायें लिखी गयी हैं. अनुवादों में भी विनोबा तक ने गीता के अनेक रहस्य उद्घाटित किये हैं, फिर भी नित नये ग्रन्थ प्रकाश में आ रहे हैं.हिंदी भाषा में भी गीता के सरल अनुवाद प्रकाश में आये हैं. श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी का यह ग्रन्थ भी उसी श्रेष्ठ परंपरा का महत्वपूर्ण अनुवाद ग्रन्थ है.
ईश्वरी दत्त द्विवेदी धार्मिक विचारों के जाने माने विद्वान हैं. उन्होंने अपने जीवन के श्रेष्ठ पचास वर्ष धार्मिक विचारों को प्राणवंत बनाने में लगा दिये. गीता उनकी प्रिय पुस्तक रही है. उन्होंने अध्ययन ही नहीं किया बल्कि गीता के गूढतम अर्थो के रहस्य को भी जानने की चेष्टा की है. यह स्पष्ट है कि द्विवेदी का यह गीता अनुवाद उनके दीर्घ कालीन अध्ययन और मनन का ही सुफल है.
मैंने श्री द्विवेदी द्वारा अनूदित इस ग्रन्थ के महत्वपूर्ण अंशों को पढ़ा. सभी पद सरस हैं. शब्द रचना मौलिक रचना का आभास देती है. ऐसा नहीं लगता कि यह किसी रचना का अनुवाद है.कर्मयोग की व्याख्या 'गीता ' का अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश है. यहाँ उस अंश को बड़ी सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है. अध्याय 2 के 47 वें श्लोक का अनुवाद इस प्रकार है --
मात्र कर्म कर्त्तव्य तुम्हारा
फल पर है अधिकार नहीं
फल इच्छा से किया कर्म
परमेश्वर को स्वीकार नहीं. 2/47
सिद्धि, असिद्धि समान समझ कर
दोनों में समभाव गहो
कार्य सफल, असफल दोनों में
एक भाव से मित्र! रहो 2/48
इसी प्रकार की सरल पंक्तियों में श्री द्विवेदी ने श्रीमद् भगवद् गीता का अनुवाद किया है. सरस काव्य में सम्पूर्ण गीता ज्ञान को पिरोया गया है. भाषा के सुन्दर प्रयोग हुए हैं. मैंने गीता के चार और अनुवाद भी पढ़े हैं परन्तु मुझे श्री द्विवेदी का अनुवाद सबसे उत्तम और आकर्षक लगा है.
हिंदी जगत में इस ग्रन्थ का विशेष आदर होगा, ऐसा मेरा विश्वास है. श्री द्विवेदी के श्रम को विद्वान स्वीकारेंगे और इस विशिष्ट कृति की सराहना करेंगे. साथ ही सामान्य पाठक भी इस अनुवाद को सहज रूप से अपनाएंगे और इसके अमृत संदेशों का लाभ उठाएंगे.
श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी के इस प्रशंसनीय कार्य के लिये मैं उन्हें साधुवाद देता हूँ और उनके सतत अध्ययन और मनन के प्रतिफल के रूप में उनकी जो यह अद्भुत उपहार हिंदी जगत को मिला है उसके लिये उन्हें बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि भविष्य में भी वे ऐसी ही महत्वपूर्ण कृतियों की रचना कर के हिंदी साहित्य को निरंतर समृद्ध करते रहेंगे.
डॉ शिवानंद नौटियाल
पूर्व उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री
8, तिलक मार्ग, डाली बाग, लखनऊ, उ. प्र.
20.12.95
( 2 )
'श्रीमदभगवदगीता ' स्वयं भगवान के मुख से निः सृत अलौकिक वाणी है . विश्व के महिमामय ग्रंथों में यह सर्वोत्कृष्ट है. इस ग्रन्थ का प्रत्येक शब्द मुक्ता एवं प्रत्येक पद गंभीर पयोनिधि है. ईश्वर के गुण,स्वरुप एवं प्रभाव तथा उपासना, कर्म, ज्ञान- विज्ञान और रहस्य का जैसा प्रतिपादन महर्षि वेदव्यास ने इसमें किया है, वैसा विश्व के किसी अन्य ग्रन्थ में दुर्लभ है. यह ग्रन्थ शास्त्रों का शास्त्र है, वेदों का सार है,, ज्ञान का समुद्र है तथा मुक्ति की गंगा है.
संस्कृत में विरचित ऐसे अद्भुत ग्रन्थ का हिंदी भाषा में काव्यानुवाद अत्यंत दुष्कर है, किन्तु पंडित ईश्वरी दत्त द्विवेदी जी ने इस असाध्य कार्य को अपनी भक्ति एवं लगन से साध्य बना डाला है. राष्ट्र भाषा के माध्यम से साधारण जन भी गीता के मर्म को समझ सकेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है.
इस काव्यानुवाद में कवि ने गीता की मूल संवेदना व भावात्मकता की सर्वत्र रक्षा की है. भाषा सरल, सहज व स्वाभाविक है, भाव अविच्छिन्न हैं, लय व प्रवाह अबाधित है. संस्कृत भाषा का इतना सुन्दर हिंदी काव्यानुवाद इससे पहले मेरे देखने में नहीं आया. गीता के एक श्लोक का एक ही छंद में काव्यानुवाद कर पाना किसी प्रतिभा संपन्न कवि की ही सामर्थ्य है. यहाँ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा --
सुख दुःखे समे कृत्वा लाभा लाभो जयाजयो
ततो युध्याय युज्यस्व नैवं पापमवाप्यसि
--- श्रीमद् भगवद्गीता 2/ 38
जब लाभ- हानि, सुख- दुःख जयाजय में समभाव रहोगे
तुम तभी युद्ध करने पर भी सब पाप - विमुक्त रहोगे "
अस्तु, करोड़ों हिंदी भाषियों तक गीता के अनुपम ज्ञान को पहुँचाने के लिये कवि पंडित ईश्वरी दत्त द्विवेदी साधुवाद के पात्र हैं.
डॉ डी. एस. पोखरिया
एम. ए., पीएच. डी., डी. लिट.
रीडर, हिंदी विभाग
कुमाऊं विश्वविद्यालय., परिसर,अल्मोड़ा
Friday, 3 October 2025
श्रीमदभगवद गीता ( काव्य रूपान्तर )
Front cover
श्रीमद् भगवद् गीता
हिंदी काव्य- रूपान्तर
Page one
Left side
प्रकाशक
ईश्वरी दत्त द्विवेदी
शिवपुर, कोटद्वार, (पौड़ी गढ़वाल)
प्रथम संस्करण--- 1999
सर्वाधिकार -- प्रकाशकाधीन
-
द्वितीय संस्करण -- 2009
स्व. ईश्वरीदत्त द्विवेदी जी की पुण्य स्मृति में उनके सुपुत्र श्री दिनेश चंद्र द्विवेदी द्वारा प्रकाशित
तृतीय संस्करण ------ 2025
डॉ इन्दु नौटियाल द्वारा संपादित एवं पुनर्प्रकाशित
मुद्रक -----
पेज 1 right side
आत्मकथ्य (फोटो सहित )
पेज 2
1--प्रस्तावना / शुभकामनायें
1 से 2 तक
तृतीय संस्करण
1-भूमिका / संपादकीय
2-गीता महिमा
3- अनुक्रमणिका
4- धृतराष्ट्र की व्यथा
मुख्य रूपान्तर
अध्याय 1 से प्रारम्भ
Tuesday, 30 September 2025
श्रीमदभगवदगीता -- हिंदी काव्य रूपान्तर (तृतीय संस्करण)
धर्म, कर्म और अध्यात्म की त्रिवेणी श्रीमदभगवदगीता मानवता का वह अमर गान है- जो आत्मा को प्रकाश, चित्त को शांति और कर्म को दिशा प्रदान करता है. महर्षि वेद व्यास की यह कालजयी कृति मेरे पूज्य पिताजी श्री ईश्वरीदत्त द्विवेदी की सर्वाधिक प्रिय पुस्तक थी, जिसका अध्ययन वे आजीवन करते रहे. इसके दिव्य सन्देश को सरल और सुगम काव्य रूप में ढालना उनके कवि ह्रदय की प्रबल इच्छा थी, जैसा कि उन्होंने प्रथम संस्करण के 'आत्म कथ्य 'में लिखा है. उनका अनुभव था कि गीता की वाणी जब छन्दों की लय और काव्य की सुरभि से आप्लावित होकर कानों में गूँजती है तो वह केवल मनन का विषय न रहकर सीधे ह्रदय से संवाद करती है.इसी भाव और विश्वास के साथ, अपने सतत अध्ययन और साहित्य साधना के बल पर उन्होंने इस कृति का सृजन करके अपनी चिर आकांक्षा को पूर्ण किया.
गीता जैसे अप्रतिम, कालजयी संस्कृत ग्रन्थ का यह काव्य -रूपान्तर अपनी सरलता और माधुर्य से पाठकों को उस शाश्वत सत्य से परिचित कराता है जो श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर अर्जुन को उपदेश स्वरुप प्रदान किया था. यह ज्ञान केवल अर्जुन को ही नहीं, बल्कि उनके माध्यम से समस्त जगत को दिया गया उद्बोधन है, जिसमें जीवन को समझने के अनमोल सूत्र निहित हैं. यह रूपान्तर मेरे पूज्य पिताश्री की कठिन साधना का प्रतिफल है, उनका श्रद्धा भाव, गहन अध्ययन और भाषा कौशल इस कृति में सर्वत्र परिलक्षित है. संस्कृत के गूढ श्लोकों का भावार्थ सहज और प्रवाहपूर्ण छन्दों में इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है कि गीता का दार्शनिक गाँभीर्य भी बना रहता है और इसकी जीवनोपयोगी शिक्षायें भी पाठक तक सरलता से पहुँच जाती हैं.
इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 1999 में स्वयं उनके कर कमलों द्वारा हुआ था. अब से लगभग ढाई दशक पूर्व प्रकाशित इस रचना को सामान्य पाठकों के साथ -साथ साहित्य जगत में भी व्यापक सराहना मिलती रही है जिसके कुछ उदाहरण इस संस्करण में भी पढ़े जा सकते हैं.
वर्ष 2008 में पिताजी के स्वर्गवास के पश्चात् उनकी पुण्य- स्मृति में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण मेरे अनुज श्री दिनेश चंद्र द्विवेदी द्वारा सन 2009 में प्रकाशित किया गया, जिसे पूर्व की भाँति ही भरपूर प्रशंसा मिली. उल्लेखनीय है कि प्रथम प्रकाशन से अब तक की सुदीर्घ अवधि में समय समय पर पाठकों की मौखिक / लिखित प्रतिक्रियायें निरंतर मिलती रही हैं जो इस बात की द्योतक हैं कि इतने वर्षो के बाद भी यह रचना कहीं न कहीं अब भी पढ़ी जा रही है, और मूल ग्रन्थ की भाँति आज भी प्रासंगिक और प्रभावी बनी हुई है.
इस उत्कृष्ट काव्य रचना को एक नवीन संस्करण द्वारा कुछ और पाठकों तक पहुँचाने का विचार अनायास ही मेरे मस्तिष्क में आया, जिसे किसी दैवी प्रेरणा का संकेत मानकर मैंने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य करते हुए साकार करने का प्रयास किया. मेरा मानना है कि यह कृति न केवल गीता के सन्देश को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम है, वरन उस श्रेष्ठ परंपरा का भी उदाहरण है जिसमें अध्यात्म और साहित्य का सुन्दर संगम दिखाई देता है यहाँ न केवल शास्त्र की गंभीरता है, बल्कि काव्य का सौंदर्य भी है, न केवल उपदेश है, बल्कि आत्मीय संवाद भी है.
अपने स्वर्गीय पिताजी की इस अमूल्य धरोहर को उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरुप पुनः प्रकाशित करते हुए मुझे परम संतोष की अनुभूति हो रही है. यह केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु उनकी गहन तपस्या, साहित्यिक मेधा, जीवन दृष्टि और आत्मीय स्मृतियों का जीवंत अभिलेख है . यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनकी कठिन साधना के इस सुफल को एक बार फिर पाठकों तक पहुँचाने का अवसर मिला है. आशा करती हूँ कि मेरा यह विनम्र प्रयास गीता के शाश्वत सन्देश को नई पीढ़ियों तक भी पहुँचाने का माध्यम बन कर अधिकाधिक पाठकों के जीवन में सार्थक एवं गुणात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होगा.
नये और पुराने सभी पाठकों के लिये,
अनेक शुभकामनाओं के साथ,
डॉ इन्दु नौटियाल
विजयादशमी , 02 अक्टूबर, 2025
Friday, 5 September 2025
गीता- महिमा
गीताध्ययन शीलस्य प्राणायाम परस्य च
नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्म कृतानि च
जो गीता का सतत अध्ययन
श्रद्धा से करता रहता
पूर्व जन्म के पाप मुक्त हो
प्रभु में विलय किया करता.
गीता शास्त्रमिदम पुण्यम यः पठेत्प्रयतः पुमान
विष्णो: पद्मवापनोति भय शोकादि वर्जितः
शुद्ध चित्त से जो मनुष्य --
पावन गीता का पठन करे
शोक और भय रहित हुआ,
वह विष्णु धाम को गमन करे.
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्नैः, शास्त्र विस्तरै:
या स्वयंपद्मनाभस्य मुखपद्माद्वि निःसृता.
कमल नाभ के मुख से निकला--
सकल वेद शास्त्रों का सार
गीताध्ययन, मनन, चिंतन से --
करता नर भव सागर पार.
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दनः
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्
शास्त्र, उपनिषद गोधन समय हैं,
दुहने वाले बृजनन्दन
वत्स रूप में अर्जुन ने ---
अमृत का किया प्रथम सेवन
एकम् शास्त्रम देवकीपुत्र गीतमेको देवो देवकीपुत्र एव
एको मंत्रस्तस्य, नामानि यानि कर्मार्प्येकं तस्य देवस्य सेवा.
शास्त्रों में सर्वोत्तम गीता -
निकली जिन प्रभु के मुख से।
उनके नाम - मन्त्र की माला,
जो जपता रहता सुख से।।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यान गम्यं।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्व लोकैकनाथं।।
परम शान्त आकृति जिनकी है,
शेषनाग शैय्या जिनकी।
जो आराध्य देव, ऋषि -गण के
नाभि कमल- शोभित जिनकी।।
गगन सदृश जो सर्व- व्याप्त हैँ,
मेघ-वर्ण सर्वांग शुभम।
जो त्रिलोक के स्वामी हैं,
जो जन्म - मरणआधार अगम।।
लक्ष्मी पति उन कमल- नयन को --
मेरा बारम्बार नमन।
जिनकी कृपा - दृष्टि से होते --
भक्तों के सब कष्ट शमन।।
श्री मदभगवदगीता के मुख्य- मुख्य विषयों की अनुक्रमणिका
विषय
अध्याय 1 -- मोह से व्याप्त अर्जुन के विषाद का वर्णन
2 -- अर्जुन की कायरता पर कृष्णार्जुन संवाद 3 -- कर्म योग
4-- ज्ञान कर्म सन्यास योग
5 -- कर्म सन्यास योग
6 -- आत्म सन्यास योग
7 -- ज्ञान- विज्ञान योग
8 -- अक्षर ब्रह्म योग
9 -- राजविद्या राज गुह्य योग
10 -- विभूति योग
11 -- विश्वरूप दर्शन योग
12 -- भक्ति योग
13 - क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ विभाग योग
14 - त्रिगुण विभाग योग
15 - पुरुषोत्तम योग
16 - देवासुर संपद्विवभाग योग
17 - श्रद्धामय विभाग योग
18 - मोक्ष सन्यास योग.
--
Thursday, 4 September 2025
आत्म - कथ्य
अपने अल्प ज्ञान के आधार पर किये गये इस काव्य रूपान्तर को मैं सर्व प्रथम अपने आराध्य देव वासुदेव
Tuesday, 2 September 2025
गीता काव्य रूपान्तर -- तृतीय संस्करण
ऐसे अप्रतिम ग्रन्थ गीता का यह काव्यरूपांतर अपनी सरलता और माधुर्य से पाठकों को उस शाश्वत सत्य से परिचित कराता है जो श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर अर्जुन को उपदेश स्वरुप प्रदान किया था. यह ज्ञान केवल अर्जुन को ही नहीं बल्कि उनके माध्यम से समस्त जगत को दिया गया उद्बोधन है जिसमें जीवन को समझने के अनमोल सूत्र निहित हैं. प्रस्तुत रूपान्तर मेरे पूज्य पिताजी की कठिन साधना का प्रतिफल है. उनका श्रद्धा भाव, गहन अध्ययन और भाषा कौशल इस कृति में परिलक्षित है. संस्कृत के गूढ श्लोकों का भावार्थ सहज और प्रवाहपूर्ण छन्दों में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया हैं कि गीता का दार्शनिक गांभीर्य भी बना रहता है और साथ ही इसकी जीवनोपयोगी शिक्षायें भी पाठक तक सरलता से पहुँच जाती हैं.
वर्ष 1999 में प्रकाशित इस रचना को सामान्य पाठकों के साथ - साथ साहित्य जगत में व्यापक सराहना मिली. पिताजी के स्वर्गवास के पश्चात् सन 2009 में मेरे अनुज श्री दिनेश चंद्र द्विवेदी द्वारा इसका द्वितीय संस्करण मुद्रित कराया गया, जिसे पुनः भरपूर प्रशंसा मिली. इन दो दशकों की अवधि में समय - समय-- पर अनेक पाठकों से प्रतिक्रियायें मिलती रही हैं, जो इस बात की द्योतक हैं कि इतने वर्षों के बाद भी यह पुस्तक कहीं न कहीं पढ़ी और सराही जा रही है और मूल ग्रन्थ की भाँति आज भी प्रासंगिक और प्रभावी बनी हुई है, अतः एक नवीन संस्करण द्वारा इस रचना को पुनः प्रकाशित कर कुछ और सुधी पाठकों तक भी पहुँचाने का विचार मेरे मन में आया, जिसे किसी दैवी प्रेरणा का संकेत मानकर मैंने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य करके साकार करने का प्रयास किया है.
प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से पूर्ववर्ती संस्करणों के स्वरुप में सामान्य सा परिवर्तन है ,किन्तु मूल रचना यथावत है. वह स्वयं में ही इतनी परिपूर्ण है कि उसमें कुछ भी जोड़ने या घटाने की न तो आवश्यकता है और न औचित्य, अतएव इस नवीन कलेवर में भी उसे पूर्ण सम्मान के साथ ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है.
अपने स्वर्गीय पिताश्री की इस अनमोल कृति के नवीन संस्करण को उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरुप प्रकाशित करते हुए मुझे परम संतोष की अनुभूति हो रही है. यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनकी अमूल्य साधना के इस सुफल को पुनः पाठकों तक पहुँचाने का अवसर मिला है. आशा करती हूँ कि पूर्व की भाँति यह पुस्तक भी नये \ पुराने सभी पाठकों को गीता के अमृत सन्देशों से समृद्ध और आनंदित करेगी और वे इसको उसी श्रद्धा और प्रेम से अंगीकार करेंगे जिस भाव से इसे पुनर्प्रकाशित किया गया है
. इन्दु नौटियाल Not to be included in the new edition.
देहरादून
Monday, 1 September 2025
श्री मद्भगवद्गीता-- हिंदी काव्य रूपान्तर -- श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है. यह केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं अपितु मानव जीवन का परम मार्गदर्शक है, जो मानव को उसके कर्तव्य, धर्म और आत्म ज्ञान की ओर उन्मुख करता है. गीता का उपदेश केवल युद्ध - भूमि तक सीमित नहीं है, वरन यह समस्त मानवता के लिये एक शाश्वत सन्देश है, जो प्रत्येक युग में प्रासंगिक बना रहता है. इसमें अर्जुन और श्री कृष्ण का संवाद हर जिज्ञासु आत्मा और उसके अन्तःकरण में स्थित ईश्वर के बीच का संवाद है. इसका प्रत्येक श्लोक जीवन के जटिलतम प्रश्नों का उत्तर प्रदान करता है और जिज्ञासु को आत्मिक शांति और समाधान की ओर ले जाता है.गीता हमें यह सिखाती है कि संकट, मोह और भ्रम की घड़ी में भी कर्तव्य परायणता, निष्काम भाव और आत्मिक दृढ़ता ही मानव का सच्चा आश्रय है.
इसी गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रन्थ को सुलभ और सरस बनाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी ने. उनका यह काव्य रूपांतर संस्कृत श्लोकों की गंभीरता को बनाये रखते हुए हिंदी छन्दों की मधुरता में ढला हुआ है. इस प्रस्तुति से गीता का अमृत सन्देश केवल विद्वानों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि साधारण पाठक भी उसकी गहराई को सहज भाव से आत्मसात कर सकता है.
लेखक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने भावानुवाद में कहीं भी मूल ग्रन्थ की गरिमा से समझौता नहीं किया. गीता के प्रत्येक अध्याय, प्रत्येक श्लोक के सार को उन्होंने ऐसे सरल और प्रवाहपूर्ण छन्दों में ढाला है जो पाठक को दार्शनिक गंभीरता से बोझिल नहीं करते, बल्कि रस और प्रेरणा से भर देते हैं. उनके शब्दों में दार्शनिक विवेक के साथ -साथ भक्ति का माधुर्य और काव्य की सरसता भी झलकती है.
आज के समय में, जब जीवन की भागदौड़, भौतिकता और तनाव ने मनुष्य को अशांति और असंतोष से भर दिया है, गीता के उपदेश पहले से भी अधिक आवश्यक प्रतीत होते हैं. श्री द्विवेदी द्वारा किया गया यह रूपान्तर केवल उपदेशात्मक ग्रन्थ नहीं अपितु आत्मा के लिये अमृत स्रोत बन कर सामने आ जाता है.छन्दों का लयात्मक प्रवाह पाठक को बाँध लेता है और सन्देश ह्रदय तक सहजता से पहुँच जाता है. यही इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वह मन और मस्तिष्क दोनों को ही स्पर्श करती है.
यह काव्य - रूपान्तर केवल अनुवाद नहीं, बल्कि साधक का आत्मानुभव है. इसमें लेखक का गहन अध्ययन, अध्यात्म के प्रति उनकी आस्था और साहित्यिक अभिरुचि का अद्भुत संगम दिखाई देता है उन्होंने गीता को अपने अन्तःकरण से जी कर ही उसके भावों को कवित्व में ढाला है, इसीलिए यह कृति ह्रदय स्पर्शी बन पड़ी है.
इस रूपान्तर के माध्यम से गीता का शाश्वत सन्देश नई पीढ़ी तक पहुँचाना सराहनीय प्रयास है. यह केवल गीता का पुनर्पाठ नहीं बल्कि जीवन- मूल्यों की पुनर्स्थापना भी है. जब - जब मनुष्य अपने मार्ग से विचलित होता है, तब - तब गीता का यह स्वर उसे सही दिशा दिखाता है. गीता के सन्देश निः संदेह उस आलोक स्तम्भ की तरह हैं जो अंधकार में भटके पथिक को उसकी सही राह दिखाता है.
यह कृति न केवल गीता के सन्देश को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम है वरन उस श्रेष्ठ परंपरा का भी उदाहरण है जिसमें अध्यात्म और साहित्य का सुन्दर संगम दिखाई देता है यहाँ न केवल शास्त्र की गंभीरता है, बल्कि काव्य का सौंदर्य भी है, न केवल उपदेश है, बल्कि आत्मीय संवाद भी है. यह काव्य - रूपान्तर समय की माँग है क्योंकि इसके माध्यम से गीता का शाश्वत सन्देश अधिकाधिक पाठकों तक पहुँच कर उनके जीवन की राह को आलोकित करेगा
Wednesday, 18 June 2025
एक पर्वत, एक योगी
एक पर्वत,एक योगी
नीला आकाश! दूर, दूर तक फैली हिमाच्छादित चोटियाँ
उनके बीच एक शिखर, दीखता है शांत,
लेकिन उसमें कम्पन भी है,
जैसे भीतर ध्यान चल रहा हो.
उसकी चुप्पी में गूँज है आत्मा की --
वह बोलता नहीं किन्तु सुनता है सब कुछ.
वह चलता नहीं,
पर बहती हैं असंख्य जलधारायें उस से.
उसकी ऊँचाई तुम्हें सिर झुकाना सिखाती है-
और उसकी कठोरता-- अपने भीतर करुणा को सहेज रखना
वह योगी है -- चिर - समाधिस्थ --
फिर भी सदैव जागृत.
Sunday, 20 April 2025
COUNT YOUR BLESSINGS
Start counting your blessings
Right now
scattered around they are
In number and ways
More than you can imagine.
Here is the great, good Earth
You are standing upon
Enjoying the countless bounties
She offers to you freely
Without asking for a return favour.
Enveloping it is the atmosphere
Balancing the vital elements
The air, fire and water cycle
To ensure life keeps flourishing
Upon this vast planet.
And the seamless blue sky
Overlooking like an angel
Is Sending light and warmth
From its heavenly lamps
The glorious Sun and Moon
Being alive herein
With such unique gifts assured
Isn't an ultimate blessing in itself
To feel truly grateful to
The Supreme Provider?
Saturday, 14 December 2024
Nirjharini: याचना
Wednesday, 18 October 2023
Horrors of war
Scenes from the war zone!!
Missile and rockets darting
from one side to the other,
Making the sky tremble
No less than the earth below.
Houses and tall buildings,
Crumbling down like pack of cards,
Debris piled up on the ground,
Silent proof of utter devastation,
Caused by insane minds.
Hapless victims praying for life,
In the wake of unimaginable plight,
Keep asking themselves and others,
" What crime or sin did we commit,
To deserve this inhuman torture? "
What evil spirit did initiate,
This mad, mad, misadventure,
Thrusting unsuspecting lives,
Into the blazing flames of
Excruciating pain and death?
But what I seek to know is not,
Who to blame for this bloody venture,
Nor does it interest me to learn,
Who is losing ground in the battle,
Or, who is likely to emerge the winner.
For, I know it's never going to end,
As hatred begets hatred only,
And revenge with its deadly teeth,
Is ever on prowl to dig out again,
What appears to have been buried.
But my heart instinctively goes
Beyond the visuals on TV screen
Imagining the fate of those abducted
Destined to undergo untold sufferings
For no fault of theirs.
I know its rather futile to hope
An early end to this ugly warfare
But do wish some miracle to happen
Concluding it in amicable solutions
To avoid further loss of precious lives
Picture from internet
Courtesy -- freepik. Com
Monday, 31 July 2023
A covid time poem
Welcome, August!
May you be a harbinger of happy change
Relief, resilience and restoration
To the human race suffering
Under the pangs of a calamity
Never known before.
May the good times return soon
And life wear its familiar colors again
Flourish, as it has been doing for ages
Under the loving care of the sun
And mother Nature!
Friday, 28 April 2023
चिर-स्मरणीया माँ
चिर - स्मरणीया माँ!
तुम्हें याद करने के लिए मुझे,
किसी विशेष दिन की नहीं अपेक्षा,
स्मृति पटल पर अंकित हो तुम,
जीवन के एक अंग की तरह ही,
अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित हो तुम
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व में, क्योंकि,
महसूस करती हूँ तुम्हारा प्रभाव सदैव
अपने हर विचार और व्यवहार में.
कठिन परिस्थितियों में भी जब सहज रहकर
करती हूँ प्रयास संघर्ष-रत रहने का
जाने -अनजाने तुम्हारे पद चिन्होँ पर ही
मैं भी तो निर्भय चल रही होती हूँ.
किसी का भी दुःख देख, सुन, कर
विचलित हो उठता है जब मेरा मन ,
तब,तुम्हारी सहज करुणा का उद्रेक ही तो,
छलक आता आँखों में अश्रु बनकर.
कहीं भी क्रूरता और अन्याय के विरुद्ध,
दृढ़ता से मुखरित होते मेरे स्वर,
तुम्हारी ही न्याय प्रियता को तो,
प्रतिध्वनित करते हैं घनीभूत होकर.
कुछ शुभ घटित होने पर, अनायास ही,
जुड़ जाते हैं हाथ , उस परम-पिता के प्रति ,
नत -मस्तक हो आभार प्रकट करने में,
तुम्हारा ही अनुसरण करती हूँ मैं,
अविस्मरणीया माँ!







