Friday, 21 August 2026

वे नरगिस के फूल

                                                     

           मैं  भटक रहा था वहाँ अकेला -

          पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते  -

           किसी बादल की तरह।


     तभी अचानक मैंने देखा झील के किनारे खिले -

      सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -

      जो हवा के झोंकों  के साथ -- 

     झूमता हुआ नाच रहा था।


         अद्भुत दृश्य था वह!

      आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते -

        तारों की तरह वे भी फैले हुए थे-

         झील के किनारे, दूर तलक -

         एक अनंत रेखा में सजे हुए।


          एक ही नज़र में मैंने देखा -

         दस हज़ार फूलों को  एक साथ -- 

         आनंद में डूबे हुए,

         एक साथ सिर हिलाते,

              झूमते, नाचते।


         यूँ तो उनके पास ही झील में -

            लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -

           किन्तु इन पीले फूलों की ख़ुशी -

       उनकी चमक को कहीं पीछे छोड़ रही थी।


             ऐसी आनंदमयी संगति में भला -

               कवि कैसे न प्रमुदित  होता?



                 मैं वहाँ खड़ा, खड़ा निहारता रहा -

                 निहारता रहा देर तक --

                  बिना यह सोचे कि उसने मुझे -

                 किस अपूर्व आनंद - धन से-

                   समृद्ध कर दिया है।

                    क्योंकि उस दिन के बाद,

                   जब भी मैं होता हूँ फुर्सत  के पलों में,

                   अथवा  गहन विचारों में डूबा हुआ,

                    वे सुन्दर फूल मेरे कल्पना - लोक में - 

                     एकांत के उसअद्भुत आनंद में --

                     एक बार फिर खिल उठते हैं,

                    और आह्लाद से भर देते हैं मेरे ह्रदय को इस तरह-

                     कि वह भी नाच उठता है उनके साथ

                      अनायास ही!!




"I wandered lonely as a cloud " .....  William Wordsworth's poem 
Transcreated into Hindi 

Thursday, 20 August 2026

वे नरगिस के फूल

   मैं भटक रहा था वहाँ एकाकी -

    पहाड़ियों, घाटियों के ऊपर तैरते -

    किसी  बादल  की तरह।


 तभी अचानक मैंने  देखा --
 झील के किनारे खिले -
सुनहरे नरगिस फूलों का एक समूह -
जो हवा के झोंकों के साथ -
झूमता हुआ नाच रहा था।
अद्भुत दृश्य था वह!
आकाशगंगा में चमकते, टिमटिमाते-
 तारों की तरह वे भी फैले हुए थे -
 झील के किनारे,- दूर तक --
  एक अनंत रेखा में।
 एक ही नज़र में मैंने देखा -
दस हज़ार फूलों को एक साथ -
आनंद में डूबे हुए,
एक साथ सिर हिलाते-
झूमते, नृत्य करते।
यूँ तो उनके पास ही -
लहरें भी नृत्य कर रहीं थीं -
किन्तु उनकी  चमक को -
 बहुत पीछे छोड़  रही थी -
 इन पीले फूलों की ख़ुशी।
  ऐसी आनंदमयी  संगति में भला --
 कवि कैसे प्रसन्न न होता?
उस मनोरम दृश्य को -
 मैं निहारता रहा,
  निहारता  रहा देर तक -
  बिना यह सोचे  कि उसने मुझे -
 किस अपूर्व आनंद -धन से -
   समृद्ध कर दिया है।
क्योंकि उस दिन के बाद -
जब भी मैं फुर्सत के क्षणों में -
अथवा गहन विचारों में डूबा होता हूँ-
वे सुन्दर फूल, मेरी कल्पना में,
  एकांत के उस  आनंद में --
एक बार फिर खिल उठते हैं,
 और आह्लाद से  भर  देते हैं  मेरे ह्रदय को -
  इस तरह कि वह भी अनायास   ही 
   नाच उठता है उनके साथ।

A transcreation of "I wandered lonely as a Cloud " by William Wordsworth
x

Sunday, 16 August 2026

The Guest House ---- अतिथि - गृह (भावानुवाद )


    मनुष्य होना  भी ऐसा है --

  जैसे कोई अतिथि - गृह होना!

   जहाँ हर सुबह -

   आता है एक नया मेहमान,

   कभी ख़ुशी, कभी अवसाद 

    तो कभी नीचता के  भाव लेकर.

    और कभी -कभी क्षण भर के लिए -

    आ जाती है जागरूकता भी -

   किसी अप्रत्याशित अतिथि की तरह !


   तुम्हें करना होता  है समुचित -

 स्वागत -सत्कार सभी का,

  क्योंकि यही तो धर्म है -

  एक  अच्छे मेज़बान  का।


    भले ही वे दुखों की भीड़ बनकर आयें 

 तुम्हारे घर को तहस - नहस  कर डालें,

  और फेंक दें सारी चीज़ों को बाहर। 

  तुम तब भी हर एक अतिथि को सम्मान ही देना,

  कौन जाने वह तुम्हारे घर में -

   किस नई ख़ुशी  के लिए -

   जगह बना रहा हो!


     निराशा, आत्म - ग्लानि और दुर्भावना 

     इन सबसे मिलो द्वार पर जाकर, 

     हँसते हुए आमंत्रित करो उनको 

     अंदर आने के लिए।

     आभार मानो उन सबका -

     क्योंकि उन सब में  हर एक को -

     कहीं दूर से भेजा गया है,

     तुम्हारा पथ - प्रदर्शक बनाकर।


  A transcreation  of  sufi mystc poet Rumi's  poem                "The Guest House "

Saturday, 15 August 2026

On Children ----- Khalil Gibran

                                                    तुम्हारे  बच्चे 

      


        तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे नहीं हैं,

       वे तो जीवन की अपनी आकांक्षाओं  के -

       पुत्र -पुत्रियाँ हैं।

       वे दुनिया में  आते हैं तुम्हारे माध्यम से 

        पर  तुमसे नहीं,

        और भले ही वे तुम्हारे साथ हैं--

        उन पर  तुम्हारा  कोई अधिकार  नहीं।


        तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो -

        किन्तु  उन पर अपने विचार थोप नहीं सकते -

      अपने जीवन में आश्रय दे सकते हो उनके शरीर को 

       किन्तु उनकी आत्मा को नहीं,

       क्योंकि वह निवास करती है भविष्य के भवन में -

      जहाँ तुम कभी नहीं जा सकते,-- स्वप्न में भी।


          तुम उनके जैसा बनने का प्रयास कर सकते हो -

         किन्तु उन्हें अपने जैसा बनाने की इच्छा न करना -

          क्योंकि जीवन कभी पीछे की ओर नहीं जाता -

        और न ही कभी ठहरता है --

        बीते हुए कल के साथ।


             तुम  वह  धनुष हो, जिसके द्वारा  तुम्हारे बच्चे -

              भेजे जाते हैं आगे, जीवंत बाणों की तरह -

              वह अदृश्य धनुर्धर सुनिश्चित करता है -

               अनंत पथ  में कोई एक लक्ष्य --

              और फिर साधता है तुम्हे अपनी शक्ति से इस तरह,

               कि  वेग से दूर तक जा सकें उसके बाण.


                उस धनुर्धर के हाथों  सौंप देना

                 तुम स्वयं को सहर्ष  और 

                 निश्चिन्त  हो कर 

                क्योंकि  वह तुम्हे भी उतना ही प्यार करता है 

                 जितना उन दूर जाते बाणों को।



Thursday, 13 August 2026

The Solitary Reaper ----- Williaam Shakespeare हिंदी भावानुवाद भावानुवाद

   


 


   देखो!

  दूर  खेत में काम कर रही

  उस किसान - बाला को,

   जो अकेली ही फसल काट रही है  

  और अपने में ही खोई - सी --

 गाती जा रही है कोई दुखभरा गीत।

   थोड़ी देर रुको,

  या चुपचाप गुजर जाओ यहाँ से ।


    सुनो!

   कैसे यह सारी घाटी ही -

    भर उठी है उसके स्वरों की गूँज से।


   शायद ही किसी बुलबुल ने कभी -

   गाये हों इतने  कर्णप्रिय गीत -

 अरब के तपते रेगिस्तान में --

  छायादार आश्रय की तलाश में भटकते -

  थके - हारे  पथिकों के स्वागत में।


  वसंत ऋतु में 

  कोयल की आवाज़ भी 

  नहीं  सुनाई दी है कभी 

 इससे अधिक मधुर --

 जब वह गूँजती है 

 सुदूर हेब्रिडीज़ द्वीपों में -

समुद्र के सन्नाटे को -

   भेदती हुई।



क्या कोई मुझे बताएगा -

कि वह क्या गा रही है?

शायद इन करुण स्वरों का स्रोत -

सुदूर अतीत की स्मृतियों में  है -

जैसे कि बहुत पहले हुआ युद्ध,

या वर्तमान  की ही  कोई अप्रिय घटना --

 सहज मानवीय  दुःख, हानि,या पीड़ा -

जो पूर्व  में कष्ट का कारण रही हो -

 और पुनः  घटित हो सकती हो।

 

चाहे जो हो उसके गीत का विषय 

पर वह  इस तरह गा रही है   --

मानों वह कभी समाप्त नहीं होगा।



  मैंने देखा उसे काम करते हुए 

 अपने हँसिये पर झुके -झुके--

  और ठिठक कर वहाँ  खड़ा मैं 

 कुछ देर तक  सुनता रहा  उसका गीत,

 और फिर चलने लगा ऊपर  की  ओर,

  उस संगीत  को  ह्रदय में लिए --

   देर तक उसकी गूँज बनी रही मन में 

   सुनाई  देना बंद होने पर भी.

   


   




Tuesday, 11 August 2026

Sonnet 18 --- William Shakespeare -- हिंदी भावानुवाद


    अप्रतिम है तुम्हारा सौंदर्य, प्रिय !

    किससे  तुलना करुँ मैं इसकी?

क्या ग्रीष्म के किसी सुहाने दिन से?

नहीं,नहीं!

तुम तो कहीं अधिक सुन्दर हो उससे--

शांत और निश्छल!



  मई के महीने की उग्र हवायें,

 झकझोर देतीं  कोमल  कलिकाओं को,

और फिर ग्रीष्म की अपनी अवधि भी तो

 कितनी अल्प होती  है न !


   कभी - कभी अधिक गर्म हो जाता है सूरज,

  उसके सुनहरे  चेहरे की  वह चमक -

अक्सर ही  धूमिल पड़ जाया करती है,

 जब घिर जाता वह बादलों से.


  यूँ तो हर सुन्दर मनुष्य की सुंदरता,

 एक दिन ढल ही जाती है,

 संयोग से, या प्रकृति की --

  परिवर्तनशील गति में,


    किन्तु  तुम्हारा शास्वत ग्रीष्म -

   कभी  निष्प्रभ नहीं होगा,

     और न ही तुम कभी खोओगे -

    अपनी स्वाभाविक  सुंदरता को।


      न कभी मृत्यु अभिमान कर पायेगी,

      कि तुम उसकी छाया में  विचरते हो।

      जब तुम, समय की सीमाओं से दूर --

       इस कविता की पंक्तियों में रहोगे  --


     जब तक इस संसार में लोग साँसें लेते रहेंगे,

      और  रहेगी ज्योति उनकी आँखों में,

       जब तक  मेरी यह कविता जीवित रहेगी,

       निश्चित ही तुमको भी जीवित रखेगी।



      


Sunday, 9 August 2026

जीवन -गीत ---- H. W. Longfellow

      



                                            जीवन कोई कपोल - कल्पना नहीं 

                                             एक  ठोस  यथार्थ   है 

                                                गंभीर और  सार्थक।

        क़ब्र ही नहीं इसका अंतिम लक्ष्य 

    "  मिट्टी हो तुम, और मिट्टी में ही लौटोगे "

         यह कथन शरीर के लिए था,

            आत्मा के लिए नहीं।


                                                       दुःख भरे स्वरों में -

                                                      यह मत बताओ मुझे --

                                                   कि जीवन एक खोखला सपना है,

                                                   क्योंकि सोई रहने वाली आत्मा -

                                                             मृतक के समान है,

                                                     और सब कुछ जैसा दिखता है

                                                       वैसा हमेशा होता नहीं।


       सदैव आमोद - प्रमोद में लिप्त रहना -

          या दुःख में ही डूबे रहना,

          नहीं हैं जीवन के मार्ग या लक्ष्य -

       किन्तु कर्तव्य - पथ पर  कुछ ऐसे चलना,

       कि  आने वाला हर दिन  हमें पाए -

        बीते दिन की तुलना में कुछ और आगे।


                                                      कला चिर - स्थायी  है और समय  गतिमान,

                                                       यद्यपि हमारे ह्रदय दृढ और साहसी हैं,

                                                        फिर भी वे बज रहे हैं उदास स्वरों में,

                                                         क़ब्र की ओर बढ़ती अंतिम यात्रा के -

                                                         मंद -मंद आवाज़ वाले --

                                                         ढोलों की तरह।


                    संसार के इस विराट युद्ध - क्षेत्र में,

                    जीवन के इस अस्थायी पड़ाव में,

                      तुम नहीं बनना  वे गूंगे मवेशी,

                    जो हाँके जाते  दूसरों के द्वारा,

                   बल्कि  बनना स्वयं नायक, इस सारे संघर्ष के।


                                                            प्रतीत  हो भविष्य कितना भी आकर्षक ,

   .                                                        भरोसा कभी न करना  तुम इस पर, 

                                                            बीते  हुए कल को भी जाने दो अतीत में,

                                                            कर्म में जुटे रहो बस  इसी वर्तमान में,

                                                             मन में  उमंग और प्रभु  में विश्वास  लिए।

 

                            महान लोगों के जीवन दिलाते हमें याद,

                           कि हम भी बना सकते जीवन को  सार्थक,

                         और अपने पद - चिह्न भी - जाते - जाते 

                          छोड़  सकते   हैं 

                          समय की रेत पर।

       

                                  वे पद -चिह्न जिन्हे देखने पर 

                                जीवन - संघर्ष में टूटे जहाज का 

                                कोई अकेला, निराश, दुखी यात्री 

                                फिर बाँध सके हिम्मत आगे बढ़ने की।

                            

                   तो आओ, हम सब उठ कर 

                    जुट जायें अपने काम में 

                   हो कर तैयार कुछ भी झेलने को 

                   निरंतर उपलब्धियाँ करते हुए अर्जित 

                    आगे ही आगे  बढ़ते रहें निरंतर 

                     सीखते हुए कठोर परिश्रम करना 

                 और करना प्रतीक्षा  फल की धैर्य पूर्वक।


                            

       

                                                

                      H. W. Longfellow.

                     ( A  Transcreation )




Friday, 7 August 2026

Seven Ages---- William Shakespeare



   एक विराट रंगमंच  है यह समूचा संसार,

   और सारे नर - नारी  हैं 

  इस पर  होने  वाले विचित्र  नाटक के  

  मात्र अभिनेता 

  वे करते हैं  प्रवेश   इस पर बारी -बारी 

   और  उतर जाते हैं  नीचे 

   अपनी -अपनी भूमिकायें निभाकर।


      यह नाटक   खेला जाता 

      सात अवस्थाओं में 

     और हर मनुष्य  अपने  जीवन - काल में

     निभाता  भिन्न - भूमिकायें 


    रंगमंच पर सबसे पहले 

    दिखाई देता  वह 

     नवजात शिशु के रूप में 

    नर्स की बांहों में रोता, मिमियाता 

     मुँह से दूध उलीचता।


       फिर आता स्कूली बालक बनकर 

        पीठ पर बस्ता लादे 

        उजला मुख, पर अनमने भाव लिए 

         घोंघे सी रेंगती चाल में 

          स्कूल की ओर बढ़ता हुआ।


     अगली बार होता एक प्रेमी वह 

     आग की भट्टी से निकलती हवा जैसी 

      गरम साँसे भरता हुआ 

     अपनी प्रेयसी  की सुंदरता की याद में 

      एक दुःख भरा  प्रेमगीत गाता हुआ।


      चौथी अवस्था में वह बनता एक सैनिक 

     तेन्दुए सी घनी दाढ़ी सजाए 

     अजीब - अजीब सी कसमें खाता हुआ 

     अति संवेदनशील आत्म -सम्मान के प्रति,

     अचानक क्रोध में भर उठने वाला 

      क्षणभंगुर यश की प्राप्ति के लिए 

      तोप के मुँह में  भी जाने को तत्पर।


      पाँचवी  भूमिका होती न्यायाधीश की 

      सुस्वादु व्यंजनों से पोषित -

      भरा - पूरा शरीर लिए,

       गंभीर ऑंखें, करीने से सजी दाढ़ी  में -

       नीति - वचनों और जीवन - सूक्तियों के संग 

        समसामायिक उदाहरणों का पुट देता 

       भरपूर आत्मविश्वास से, पूरी गरिमा के साथ 

        निभाता अपना शानदार  किरदार।


            छठी अवस्था में वह दिखता  दुबला - पतला 

          ढीले - ढाले, बदन पर झूलते से कपड़ों में 

          नाक पर खिसकती ऐनक और लटकते गालों वाला।

          जवानी के समय के सहेज कर रखे मौजे 

          अब बड़े पड़ जाते हैं उसके सिकुड़े पैरों के लिए 


          भारी, कड़क आवाज़ अब बदलने लगती है -

            बच्चों की  जैसी कोमल तुतलाहट में,

          और कभी  अस्पष्ट सी फुसफुसाहट 

           तो कभी सीटी - सी  ध्वनि बनकर 

            निकलती है मुँह से।


            और अंत में घटित होता इस रंगमंच पर 

            विचित्र घटनाओं से भरे जीवन - नाटक  का

            वह करुण दृश्य --


            जब बिना दाँत, बिना स्वाद, बिना दृष्टि  के --

           नितांत असहाय हो कर 

           जीने लगता वह इसी जीवन में 

                    दूसरा बचपन!!

           


             

                



          






   




    


Monday, 3 August 2026

Sonnet 116 -- William Shakespeare


 सच्चे प्रेमियों के मिलन में -


 किसी अवरोध को -

 स्वीकार नहीं करता मैं।


 वह प्रेम ही क्या, जो  बदल जाए -

परिस्थितियों के साथ -

या स्वयं  ही झुक जाए -

परिवर्तन के आगे।


 एक प्रकाश - स्तम्भ है  प्रेम -

आकाशदीप - सा  अटल -

 प्रचंड तूफानों में भी -

 जो रहता है अडिग।



 समुद्र में भटके जहाजों का 

मार्गदर्शक ध्रुवतारा है प्रेम,

जिसकी ऊँचाई तो नापी जा सकती है -

पर  वास्तविक मूल्य 

 सदा रहता है अज्ञात।



सच्चा प्रेम नहीं होता समय का दास,

गुलाबी अधर और कपोलों का सौंदर्य 

 मुरझा जाता है, निरंतर घूमते हुए

समय - चक्र के साथ 



किन्तु  नहीं बदलता  प्रेम --

 बीतते पलों  के साथ -

वह तो अक्षुण्ण  रहता  है -

प्रलयकाल के छोर तक।


यदि यह असत्य हो,

और  सिद्ध हो जाए मुझ पर 

तो मैं मान लूँगा कि मैंने कुछ नहीं लिखा,

और  न ही  कभी किसी ने  किया प्रेम।





A transcreation of  sonnet 116 by William Shakespeare.


Trees --- Joyce Kilmer वृक्ष (भावानुवाद )

मुझे लगता है कि मैं -

शायद ही कभी देख पाऊँगा 

 वृक्ष -सी सुन्दर किसी कविता को।


वृक्ष, जिसका मुँह सदा  सटा रहता है -

धरती माँ की छाती से-

अमृत- तुल्य   जीवन -रस का -

पोषण लेता हुआ।


वह, जो दिन भर देखता रहता है ईश्वर को -

अपनी पत्तों से लदी बाहें  -

प्रार्थना की मुद्रा में उठाये हुए 



जिसकी घनी शाखाओं के बीच -

बनाती है बुलबुल अपना घरौंदा-

हर ग्रीष्म ऋतु में.


  जिसकी फूलों से भरी डालियों पर -

  विश्राम करती है शीत ऋतु में बर्फ़ -

  और वर्षा जिसके साथ  रहती है --

     अंतरंग सखी की तरह।


    सच  है, कवितायें तो   बना लेते हैं-

    मुझ जैसे मूर्ख भी, किन्तु--

   केवल ईश्वर ही कर सकता है -

    एक वृक्ष की रचना।

















Sunday, 2 August 2026

My Heart Leaps Up ---- William Wordsworth --- इंद्रधनुष


 आनंद  से उमग उठता है मेरा ह्रदय -

जब भी  देखता हूँ -

आकाश - पटल पर प्रकट होते -

सप्तवर्णी  इंद्रधनुष  को।

 ऐसा होता था जब मैं -

एक छोटा बालक था,

और आज भी, जबकि मैं बड़ा हो गया हूँ, 

ठीक वैसी ही  अनुभूति होती है।


चाहता हूँ कि  ऐसा ही  लगता रहे -

मुझे जीवन के हर पड़ाव  पर -

अन्यथा जीने का अर्थ ही क्या?


बालक ही गढ़ता है  भविष्य के वयस्क को -

उसके ही गुण विकसित होकर -

रचना करते हैं एक परिपूर्ण मनुष्य की.।


चाहता हूँ कि बालमन की वह निष्कलुष आस्था -

 सदैव अक्षुण्ण रहे, 

और मेरे जीवन का हर दिन बँधा रहे 

 उसी सहज प्रेम और श्रद्धा की डोर से -

जिसने बचपन से  आज तक -

 मुझे प्रकृति से जोड़े रखा है।


  ( विलियम वर्ड्सवर्थ  की कविता का भावानुवाद )

Tuesday, 28 July 2026

दोराहे पर --- The Road Not Taken -- Robert Frost


पतझड़ की ऋतु थी 

और मैं गुजर रहा था 

पीले पत्तों से आच्छादित 

एक जंगल के रास्ते से।


एक जगह पहुँच कर 

ठिठक गये मेरे कदम 

क्योंकि वहाँ रास्ता  बँट गया था 

दो अलग, अलग दिशाओं में 

और मैं, अकेला पथिक

 चल नहीं सकता  था 

दोनों पर एक साथ।


इसलिए  वहीं ठहर कर मैं 

देर तक निहारता रहा, 

जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी,

वहाँ तक, जहाँ वह रास्ता 

झुरमुटों के बीच मुड़कर 

 ओझल हो गया था।


 फिर मैंने दूसरे पथ को देखा 

वह भी पहले जैसा ही सुन्दर, बल्कि -

 कुछ अधिक ही आकर्षक लगा 

क्योंकि उसकी मखमली घास 

अब तक अनछुई  प्रतीत होती थी 

यद्यपि,वास्तव में  दोनों ही रास्ते 

समान रूप से 

पद चिन्होँ से परिचित थे 


और उस सुबह दोनों ही 

सूखी पत्तियों से ढके हुए थे 

एक समान 

जिन पर किसी के भी

पद - चिन्ह नहीं पड़े थे।


बस, मैंने चुन लिया दूसरा रास्ता 

पहले वाले को किसी और दिन-

 के लिए छोड़ कर 

यह जानते हुए भी कि हर रास्ता 

आगे चलकर जा मिलता है 

किसी नये रास्ते से 

और मेरा यहाँ लौटकर आना 

शायद ही संभव हो।


और वर्षों बाद 

एक लम्बी साँस भरकर 

मैं यह कथा सुना रहा होऊँगा 

कि कैसे जंगल का वह रास्ता -

बँट गया था दो दिशाओं में 

उनमें से मैंने चुना था वह मार्ग 

जिस पर कम लोग चले थे 

और उस फैसले ने ही बदल दिया है 

मेरा जीवन।


A transcreation of the poem " The Road Not Taken"  by Robert Frost.




Wednesday, 22 July 2026

Desiderata ---- एक जीवन - दर्शन --- Max Ehrmann



       कोलाहल और  उतावली के बीच भी 

       तुम  शांतचित्त रह कर आगे बढ़ते रहो 

       और  स्मरण रखो कि -

        मौन  में भी निहित रहती है -

       गहन शांति।


     जहाँ तक संभव हो -

    सबके साथ सौहार्द बनाए रखो,

    अपने स्वाभिमान से समझौता किए बिना।


     सरल और शांत स्वर में कहो अपनी बात,

    और दूसरों की भी धैर्यपूर्वक सुनो,

     चाहे वे नीरसता और अज्ञानता से भरी हों -

    क्योंकि हर व्यक्ति के पास -

  अपनी एक अलग कहानी होती है -


आक्रामक और उपद्रवी लोगों से बच कर रहो 

    वे तुम्हारे मन की शांति भंग कर देते हैं,

    अपनी तुलना दूसरों से मत करो,

  क्योंकि  यदि तुम ऐसा करोगे

   तो कभी अभिमान का अनुभव होगा,

    और कभी हीनता का, क्योंकि -

  तुमसे अधिक और तुमसे कम सफल लोग -

          संसार में हमेशा ही रहेंगे।


   अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का आनंद लो,

   और अपने व्यवसाय में  रूचि बनाए रखो,

    चाहे वह कितना ही साधारण हो,

    समय के निरंतर बदलते प्रवाह में -

     वही तुम्हारी नैया पार लगाएगा ।


        कामकाज सम्बन्धी व्यवहार में सावधान रहे,

        क्योंकि यह दुनिया छल - छद्म  से भरी है।

        किन्तु उन अच्छाइयों से विमुख न हो जाना,

         जो तुम्हारे चारों ओर विद्यमान हैं -

         अनेक लोग  उच्च आदर्शो के लिए -

          सतत प्रयत्नशील हैं इस विश्व - मंच पर-

             वीर और आदर्श नायकों की यहाँ 

                    कोई कमी नहीं।


           तुम जैसे हो वैसे ही बने रहो

            अपने प्रति सदैव ईमानदार,

           विशेषतः प्रेम के विषय में --

            न प्रेम  का दिखावा करो -

           और न ही उसके प्रति संशय पालो,

          क्योंकि जीवन की समस्त शुष्कता-

           और निराशा के बावजूद-- 

          दूब घास की तरह  शाश्वत 

              और जीवंत रहता है प्रेम।

            

       बीतते वर्षों से मिलती सलाह को- 

           शालीनता से स्वीकार करो,

          और  विदा करो गरिमापूर्वक 

          युवावस्था के मोह को।

        

          आत्म -बल  को बढ़ाते रहो निरंतर 

         ताकि अकस्मात  आने वाली विपदा का,

          दृढ़ता से सामना  किया जा सके.

         किन्तु काल्पनिक आशंकाओं  से,

          स्वयं को व्यथित  मत करो।

          जीवन में अधिकांश  भय --

          थकान और  अकेलेपन से जन्म लेते हैं। 


      समुचित अनुशासन में  जीते हुए,

          स्वयं के प्रति भी सदैव  दयालु रहो,

          तुम इस ब्रह्माण्ड की संतान हो -

       धरती के समस्त वृक्षों और आकाश के तारों की तरह - 

         तुम्हें भी पूरा अधिकार है यहाँ रहने का।


          और चाहे तुम्हें  यह स्पष्ट हो या न  हो,

                यह ब्रह्माण्ड उसी प्रकार आगे बढ़ रहा है,

                        जैसा इसे बढ़ना चाहिए।


             इसलिए ईश्वर के साथ शांति से रहो - 

             जिस रूप में भी तुम उसे मानते हो,

          तमाम उलझनों और आकांक्षाओं के बीच-

                जीवन के इस कोलाहल में,

              अपनी आत्मा में शांति बनाए रखो.


     सच तो यह है कि तमाम कपट, थकावट 

               और टूटे सपनों के बावज़ूद --

               यह एक सुन्दर दुनिया है, 

            प्रसन्न रहो, और हर परिस्थिति में -

            प्रसन्न रहने का प्रयास करते रहो।


                                                                                     


                         Desiderata by Max Ehrmann  का  हिंदी भावानुवाद 

        


    




     

Sunday, 19 July 2026

क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी.....

                 



                    क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी मृत्यु के लिए..


                            दुनियादारी  के चक्र में बँधी -

                             मैं बस चलती चली जा रही थी -

                              मानो रुकने की तो क्या -

                             मरने की भी फुर्सत -

                              नहीं थी मेरे पास।


                           तभी वह  सौम्य सा सारथि --

                            स्वयं मेरे पास आ रुका -

                             मुझे अपने साथ चलने का -

                            स्नेहिल निमंत्रण देता हुआ।


                            उसके रथ में यूँ तो हम दो ही थे -

                              किन्तु कोई एक और  भी 

                          अदृश्य रूप में उपस्थित थी वहाँ -

                              सर्व-कालिक, अशरीरी और

                              चिर -रहस्यमयी -- "अमरता "।


                            हम धीरे, धीरे आगे बढ़ते रहे -

                            उसे कोई जल्दी नहीं थी --

                            और उसके सौजन्यपूर्ण निमंत्रण पर -

                             मैं भी पीछे छोड़ आई थी -

                             अपनी सारी व्यस्ततायें और आकांक्षायें।


                           हम गुज़रे एक स्कूल के पास से -

                           जहाँ भोजनावकाश में -

                            गोल घेरा बनाकर -

                             हँसते, खेलते बच्चे -

                             एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे।


                         फिर और आगे बढ़े -

                        पके हुए धान के खेतों के पास से -

                        डूबते हुए सूरज को पीछे छोड़ते हुए -

                        या शायद वही हमें छोड़ कर चला गया था।        

   

                       गहराते अँधेरे के साथ -

                        ओस की बूँदें गिरने लगीं थीं -

                       सिर्फ एक पतले गाउन और हल्के स्कार्फ में -

                       ठण्ड से सिहरने लगीं थी मैं.


                      तभी हम आकर रुक गये -

                      एक ऐसे घर के सामने -

                      जो धरती पर बस एक उभार सा लगता था -

                       जिसकी छत भी मुश्किल से दिखती थी -

                      और नींव तो मानो कहीं गहराई में दबी हो।


                      उस दिन के बाद न जाने -

                     कितनी सदियाँ बीत गयी हैं -

                     फिर भी लगता है मानों वह सब -

                     कल की ही बात हो।



                    उसी दिन मैंने जाना था यह रहस्य 

                    कि उस रथ के घोड़ों के मुख -

                    अमरत्व की दिशा में थे  जहाँ --

                     मेरा अपना ही स्थायी घर था, --

                      चिर - विश्राम के लिये।



            A transcreation of Emily Dickinson's poem     "Because I could Not Stop               For Death"

  


                        



Sunday, 14 June 2026

प्रकृति और हम

कितना नीरस है यह जीवन 

चिंताओं में डूबे  हम 

भाग - दौड़ में लगे हैं  रात दिन

 कि पल भर भी ठहर नहीं पाते 

प्रकृति के सौंदर्य को 

आँख भर देखने।


फुर्सत नहीं  मिलती कभी 

पेड़ की छाया में  खड़े होकर 

भेड़ों और गायों   की तरह 

देर तक देखने की।


जंगलों से गुजरते हुए 

देख नहीं पाते कभी 

सयानी गिलहरियों को 

अपने मेवे और दानों को 

 घास में छिपाते।


 नहीं देख पाते उन 

बहती जलधाराओं को 

दिन के उजाले में 

तारों भरे आकाश की तरह 

जगमगाते।

 

अवकाश नहीं मिलता  कभी 

प्रकृति- सुन्दरी के नयनों  में झाँकने का

या मुग्ध  हो  

कर निहारना 

उसके नृत्य -रत  चरणों को।


  ठहरना यह देखने कि 

उसकी आँखों में जन्मी

 हल्की सी मुस्कान 

कैसे खिल उठती है 

अधरों तक पहुँच कर।


  सचमुच, बड़ा  ही निर्धन है वह जीवन 

जो जकड़ा रहता चिंताओं के जाल में 

 मुक्त नहीं हो पाता कभी भी जाने को 

 आस -पास बिखरे सौंदर्य  के ख़ज़ाने तक.


      W. H. Davies ki  " Lesure" poem ka whanuwad


फोटो साभार 

श्री  डी. एस. नेगी 

Thursday, 11 June 2026

करुणा की शक्ति

     करुणा! 

एक सुकोमल भावना -


मानव- मन  की गहराइयों में बसी -

  शाश्वत अच्छाई।


 कहीं दुःख, अन्याय -

या क्रूरता होते  देख अनायास 

बह निकलती ह्रदय से-

हर अवरोध को -

नकारते हुए।


वह होती -

स्वर्ग से धरती पर उतरती -

वर्षा की  बूँदों की तरह  निःशब्द 

किन्तु सुखद,शीतल और 

  कल्याणकारी।


अपने अदृश्य आँचल में लिये आती 

राहत और खुशियों की सौगातें -

जिन्हें बाँट देती भेदभाव बिना -

देने और लेने वाले दोनों में ,

 बराबर।


शक्तियों में भी सर्वोत्तम है -

  किसी सम्राट के ह्रदय में बसी करुणा -

 जो बढ़ाती उसकी शोभा -

 उसके शीश पर सजे 

रत्न - मुकुट से भी अधिक।


 राजदंड होता -

लौकिक सत्ता, राजसी वैभव -

और निरंकुश शक्ति का प्रतीक -

जो जगाये रखता जन -मन में -

राजसत्ता के प्रति भय - मिश्रित सम्मान।


 इन सब राजसी प्रतीकों से-

कहीं ऊँचा होता करुणा का स्थान-

वह निवास करती है

 स्वयं राजा के ह्रदय में -

ईश्वरीय गुण का स्वरुप धर कर ।


और  प्रजा के लिये  --

राजा का न्याय भी बन जाता-

 ईश्वरीय  न्याय  के समतुल्य -

जब  मिला हो  उसमें,

करुणा का अमृत - रस।



A Transcreation of  William Shakespeare's   "The Quality Of Mercy "



 

Sunday, 7 June 2026

सपने

             अपने सपनों को जीवित रखो 

             प्राणपण से रक्षा करो उनकी 


              उनके  निष्प्राण हो जाने से-

              अक्षम हो जायेगा तुम्हारा जीवन,

              उस टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह

              जो चाह कर भी उड़ नहीं सकती।


           मजबूती से पकड़े रहो  उनको 

           यदि  वे फिसल गये हाथों से 

          तो तुम्हारा जीवन  बन जायेगा 

        बर्फ़ में दबे खेतोँ जैसा  अनुर्वर 

          जिसमें कुछ भी उग नहीं सकता।

           


            धन की  सीमाओं का सत्य तो बता चुके हैं 

             ईसा से लेकर गाँधी तक 

           क्या असीसी के संत फ्रांसिस भी 

            सिद्ध नहीं करते इसकी निस्सारता?


           अच्छाई  की  गरिमा अनायास ही -

           पीछे छोड़ देती है राज -शक्तियों को 

          करुणा का प्रभामण्डल चमकता है -

          रत्नजटित सोने के मुकुट से अधिक,

          और प्रेम के ओस कण धूमिल कर देते हैं -

          हीरे की  आभा को भी -

         अपनी  अप्रतिम जगमगाहट से।



         ( Langston Hughes की  कविता 'Dreams' का भावानुवाद )


    

Friday, 5 June 2026

मैं स्वप्न देखता हूँ.... ( I Dream A world )

 मैं  देखता हूँ  सपना 

 एक ऐसी दुनिया का-


जहाँ  एक इंसान दूसरे इंसान  से -

नफरत न करता हो.

 जहाँ प्रेम - रस से  भीगी हो सारी धरती -

और रास्ते  सजे हों अनुपम शांति से।


मैं देखता हूँ एक ऐसी दुनिया का स्वप्न -

जहाँ हर किसी को मिले   पूर्ण स्वतंत्रता -

जहाँ धन - लिप्सा  आत्मा को दुर्बल  न बना दे -

और  लोलुपता न  बन जाये -

 जीवन का अभिशाप!


 जहाँ  लेश मात्र भी  रंग भेद न हो -

और उदारता से  बँटते  हों सबमें 

धरती के अनुपम उपहार.

जहाँ हर मनुष्य स्वतंत्र हो अपने जीवन में - 

 दुष्टता शर्मिंदा होकर सर झुकाये खड़ी हो,

 और ख़ुशी,  अनमोल   मोतियों की तरह -

 मानव -मात्र की जरूरतों को -

 पूरा करने में जुटी हो।

                   हाँ, एक ऐसी ही दुनिया  का स्वप्न देखता हूँ मैं

                             ऐसी ही दुनिया का!!



   Walt Whitman  - (1819 - 1892)   की कविता का भावानुवाद 

Wednesday, 3 June 2026

यदि तुम मुझे भूल जाओ

 

सुनो!

मैं चाहता हूँ कि 

एक बात भली भाँति

समझ लो तुम --

कि जब भी मैं देखता हूँ 

अपनी खिड़की से 

बर्फ़ से ढकी टहनी पर टिके 

 स्फटिक जैसे चमकते चाँद को 


कभी आग के पास बैठा,

छूने की कोशिश करता हूँ,

अंगारों से झरती नर्म राख की परतों को 

या जली हुई लकड़ी की देह  पर -

उभर आई झुर्रियों को।


इस सब के बीच न जाने क्यों 

मेरा मन अनायास ही 

 खिंचा चला जाता है 

 तुम्हारी  ओर।


मानों दुनिया की हर एक चीज़ 

और वह हर चीज़ जो मेरे आस - पास है --

खुशबू, रौशनी और धातुओं की चमक 

सब मिलकर छोटी -छोटी नावें बन गई हों 

मुझे तुम्हारे उन द्वीपों की ओर ले जाने के लिये 

जहाँ तुम मेरी प्रतीक्षा में हो ।


और अब, इस के उलट --

यदि तुम धीरे, धीरे 

मुझे प्रेम करना बंद कर दोगी 

तो सच मानो, मैं भी वही करूँगा 

 ठीक तुम्हारी तरह,

  धीरे, धीरे।

    

  और हाँ, 

यदि तुम अचानक ही मुझे भूल जाओ 

तो फिर कभी मुझे मिलने की 

उम्मीद न रखना, क्योंकि मैं 

पहले ही भूल चुका होऊँगा तुम्हें।


यदि तुम्हे मेरा जीवन - संघर्ष 

कुछ अधिक ही लम्बा और उन्मादी  लगे 

और विचलित करें -

मेरे रास्ते में आने वाली -

निरंतर झिँझोड़ती, डराती -

तूफानी हवायें.

कि तुम आगे न चलना चाहो मेरे साथ,

और छोड़ कर चली जाओ  मुझे-

 उसी जगह जहाँ मेरी जड़ें  

 गहराई  तक गड़ी हुई हैं।


  याद रहे कि --

ठीक उसी दिन, 

उसी बेला,

मैं अपना सब कुछ समेट कर 

  चल दूँगा,

  किसी और प्रेम -की तलाश में।


 किन्तु यदि  तुम --

 हर दिन, हर घड़ी,

यह महसूस करो 

कि अपनी अडिग मधुरता के साथ 

नियति ने तुम्हें बनाया है 

मुझसे ही जुड़ने के लिये।यदि हर दिन कोई फूल 

तुम्हारे होंठों तक पहुँच जाये 

 मुझे ढूँढते  हुए --

तो, समझ लेना प्रिये, कि -

मेरे प्रेम  की लौ फिर जगमगा उठेगी 

 जैसे कि कुछ भी न तो बुझा था,

न ही भुलाया गया।


  मेरा प्रेम तुम्हारे ही प्रेम से पुष्ट होता है, 

  और जब तक तुम इस दुनिया में हो,

    तुमसे बँधा रहेगा वह जीवन भर 

   अपने समूचे अस्तित्व के साथ।



(नोबेल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरुदा की कविता If You Forget Me  का भावानुवाद )