Tuesday, 28 July 2026

दोराहे पर


पतझड़ की ऋतु थी 

और मैं गुजर रहा था 

पीले पत्तों से आच्छादित 

एक जंगल के रास्ते से।


एक जगह पहुँच कर 

ठिठक गये मेरे कदम 

क्योंकि वहाँ रास्ता  बँट गया था 

दो अलग, अलग दिशाओं में 

और मैं, अकेला पथिक

 चल नहीं सकता  था 

दोनों पर एक साथ।


इसलिए  वहीं ठहर कर मैं 

देर तक निहारता रहा, 

जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी,

वहाँ तक, जहाँ वह रास्ता 

झुरमुटों के बीच मुड़कर 

 ओझल हो गया था।


 फिर मैंने दूसरे पथ को देखा 

वह भी पहले जैसा ही सुन्दर, बल्कि -

 कुछ अधिक ही आकर्षक लगा 

क्योंकि उसकी मखमली घास 

अब तक अनछुई  प्रतीत होती थी 

यद्यपि,वास्तव में  दोनों ही रास्ते 

समान रूप से 

पद चिन्होँ से परिचित थे 


और उस सुबह दोनों ही 

सूखी पत्तियों से ढके हुए थे 

एक समान 

जिन पर किसी के भी

पद - चिन्ह नहीं पड़े थे।


बस, मैंने चुन लिया दूसरा रास्ता 

पहले वाले को किसी और दिन-

 के लिए छोड़ कर 

यह जानते हुए भी कि हर रास्ता 

आगे चलकर जा मिलता है 

किसी नये रास्ते से 

और मेरा यहाँ लौटकर आना 

शायद ही संभव हो।


और वर्षों बाद 

एक लम्बी साँस भरकर 

मैं यह कथा सुना रहा होऊँगा 

कि कैसे जंगल का वह रास्ता -

बँट गया था दो दिशाओं में 

उनमें से मैंने चुना था वह मार्ग 

जिस पर कम लोग चले थे 

और उस फैसले ने ही बदल दिया है 

मेरा जीवन।


A transcreation of the poem " The Road Not Taken"  by Robert Frost.




Wednesday, 22 July 2026

Desiderata ---- एक जीवन - दर्शन



       कोलाहल और  उतावली के बीच भी 

       तुम  शांतचित्त रह कर आगे बढ़ते रहो 

       और  स्मरण रखो कि -

        मौन  में भी निहित रहती है -

       गहन शांति।


     जहाँ तक संभव हो -

    सबके साथ सौहार्द बनाए रखो,

    अपने स्वाभिमान से समझौता किए बिना।


     सरल और शांत स्वर में कहो अपनी बात,

    और दूसरों की भी धैर्यपूर्वक सुनो,

     चाहे वे नीरसता और अज्ञानता से भरी हों -

    क्योंकि हर व्यक्ति के पास -

  अपनी एक अलग कहानी होती है -


आक्रामक और उपद्रवी लोगों से बच कर रहो 

    वे तुम्हारे मन की शांति भंग कर देते हैं,

    अपनी तुलना दूसरों से मत करो,

  क्योंकि  यदि तुम ऐसा करोगे

   तो कभी अभिमान का अनुभव होगा,

    और कभी हीनता का, क्योंकि -

  तुमसे अधिक और तुमसे कम सफल लोग -

          संसार में हमेशा ही रहेंगे।


   अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का आनंद लो,

   और अपने व्यवसाय में  रूचि बनाए रखो,

    चाहे वह कितना ही साधारण हो,

    समय के निरंतर बदलते प्रवाह में -

     वही तुम्हारी नैया पार लगाएगा ।


        कामकाज सम्बन्धी व्यवहार में सावधान रहे,

        क्योंकि यह दुनिया छल - छद्म  से भरी है।

        किन्तु उन अच्छाइयों से विमुख न हो जाना,

         जो तुम्हारे चारों ओर विद्यमान हैं -

         अनेक लोग  उच्च आदर्शो के लिए -

          सतत प्रयत्नशील हैं इस विश्व - मंच पर-

             वीर और आदर्श नायकों की यहाँ 

                    कोई कमी नहीं।


           तुम जैसे हो वैसे ही बने रहो

            अपने प्रति सदैव ईमानदार,

           विशेषतः प्रेम के विषय में --

            न प्रेम  का दिखावा करो -

           और न ही उसके प्रति संशय पालो,

          क्योंकि जीवन की समस्त शुष्कता-

           और निराशा के बावजूद-- 

          दूब घास की तरह  शाश्वत 

              और जीवंत रहता है प्रेम।

            

       बीतते वर्षों से मिलती सलाह को- 

           शालीनता से स्वीकार करो,

          और  विदा करो गरिमापूर्वक 

          युवावस्था के मोह को।

        

          आत्म -बल  को बढ़ाते रहो निरंतर 

         ताकि अकस्मात  आने वाली विपदा का,

          दृढ़ता से सामना  किया जा सके.

         किन्तु काल्पनिक आशंकाओं  से,

          स्वयं को व्यथित  मत करो।

          जीवन में अधिकांश  भय --

          थकान और  अकेलेपन से जन्म लेते हैं। 


      समुचित अनुशासन में  जीते हुए,

          स्वयं के प्रति भी सदैव  दयालु रहो,

          तुम इस ब्रह्माण्ड की संतान हो -

       धरती के समस्त वृक्षों और आकाश के तारों की तरह - 

         तुम्हें भी पूरा अधिकार है यहाँ रहने का।


          और चाहे तुम्हें  यह स्पष्ट हो या न  हो,

                यह ब्रह्माण्ड उसी प्रकार आगे बढ़ रहा है,

                        जैसा इसे बढ़ना चाहिए।


             इसलिए ईश्वर के साथ शांति से रहो - 

             जिस रूप में भी तुम उसे मानते हो,

          तमाम उलझनों और आकांक्षाओं के बीच-

                जीवन के इस कोलाहल में,

              अपनी आत्मा में शांति बनाए रखो.


     सच तो यह है कि तमाम कपट, थकावट 

               और टूटे सपनों के बावज़ूद --

               यह एक सुन्दर दुनिया है, 

            प्रसन्न रहो, और हर परिस्थिति में -

            प्रसन्न रहने का प्रयास करते रहो।


                                                                                     


                         Desiderata by Max Ehrmann  का  हिंदी भावानुवाद 

        


    




     

Sunday, 19 July 2026

क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी.....

                 



                    क्योंकि मैं रुक नहीं सकती थी मृत्यु के लिए..


                            दुनियादारी  के चक्र में बँधी -

                             मैं बस चलती चली जा रही थी -

                              मानो रुकने की तो क्या -

                             मरने की भी फुर्सत -

                              नहीं थी मेरे पास।


                           तभी वह  सौम्य सा सारथि --

                            स्वयं मेरे पास आ रुका -

                             मुझे अपने साथ चलने का -

                            स्नेहिल निमंत्रण देता हुआ।


                            उसके रथ में यूँ तो हम दो ही थे -

                              किन्तु कोई एक और  भी 

                          अदृश्य रूप में उपस्थित थी वहाँ -

                              सर्व-कालिक, अशरीरी और

                              चिर -रहस्यमयी -- "अमरता "।


                            हम धीरे, धीरे आगे बढ़ते रहे -

                            उसे कोई जल्दी नहीं थी --

                            और उसके सौजन्यपूर्ण निमंत्रण पर -

                             मैं भी पीछे छोड़ आई थी -

                             अपनी सारी व्यस्ततायें और आकांक्षायें।


                           हम गुज़रे एक स्कूल के पास से -

                           जहाँ भोजनावकाश में -

                            गोल घेरा बनाकर -

                             हँसते, खेलते बच्चे -

                             एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे।


                         फिर और आगे बढ़े -

                        पके हुए धान के खेतों के पास से -

                        डूबते हुए सूरज को पीछे छोड़ते हुए -

                        या शायद वही हमें छोड़ कर चला गया था।        

   

                       गहराते अँधेरे के साथ -

                        ओस की बूँदें गिरने लगीं थीं -

                       सिर्फ एक पतले गाउन और हल्के स्कार्फ में -

                       ठण्ड से सिहरने लगीं थी मैं.


                      तभी हम आकर रुक गये -

                      एक ऐसे घर के सामने -

                      जो धरती पर बस एक उभार सा लगता था -

                       जिसकी छत भी मुश्किल से दिखती थी -

                      और नींव तो मानो कहीं गहराई में दबी हो।


                      उस दिन के बाद न जाने -

                     कितनी सदियाँ बीत गयी हैं -

                     फिर भी लगता है मानों वह सब -

                     कल की ही बात हो।



                    उसी दिन मैंने जाना था यह रहस्य 

                    कि उस रथ के घोड़ों के मुख -

                    अमरत्व की दिशा में थे  जहाँ --

                     मेरा अपना ही स्थायी घर था, --

                      चिर - विश्राम के लिये।



            A transcreation of Emily Dickinson's poem     "Because I could Not Stop               For Death"

  


                        



Sunday, 14 June 2026

प्रकृति और हम

कितना नीरस है यह जीवन 

चिंताओं में डूबे  हम 

भाग - दौड़ में लगे हैं  रात दिन

 कि पल भर भी ठहर नहीं पाते 

प्रकृति के सौंदर्य को 

आँख भर देखने।


फुर्सत नहीं  मिलती कभी 

पेड़ की छाया में  खड़े होकर 

भेड़ों और गायों   की तरह 

देर तक देखने की।


जंगलों से गुजरते हुए 

देख नहीं पाते कभी 

सयानी गिलहरियों को 

अपने मेवे और दानों को 

 घास में छिपाते।


 नहीं देख पाते उन 

बहती जलधाराओं को 

दिन के उजाले में 

तारों भरे आकाश की तरह 

जगमगाते।

 

अवकाश नहीं मिलता  कभी 

प्रकृति- सुन्दरी के नयनों  में झाँकने का

या मुग्ध  हो  

कर निहारना 

उसके नृत्य -रत  चरणों को।


  ठहरना यह देखने कि 

उसकी आँखों में जन्मी

 हल्की सी मुस्कान 

कैसे खिल उठती है 

अधरों तक पहुँच कर।


  सचमुच, बड़ा  ही निर्धन है वह जीवन 

जो जकड़ा रहता चिंताओं के जाल में 

 मुक्त नहीं हो पाता कभी भी जाने को 

 आस -पास बिखरे सौंदर्य  के ख़ज़ाने तक.


      W. H. Davies ki  " Lesure" poem ka whanuwad


फोटो साभार 

श्री  डी. एस. नेगी 

Thursday, 11 June 2026

करुणा की शक्ति

     करुणा! 

एक सुकोमल भावना -


मानव- मन  की गहराइयों में बसी -

  शाश्वत अच्छाई।


 कहीं दुःख, अन्याय -

या क्रूरता होते  देख अनायास 

बह निकलती ह्रदय से-

हर अवरोध को -

नकारते हुए।


वह होती -

स्वर्ग से धरती पर उतरती -

वर्षा की  बूँदों की तरह  निःशब्द 

किन्तु सुखद,शीतल और 

  कल्याणकारी।


अपने अदृश्य आँचल में लिये आती 

राहत और खुशियों की सौगातें -

जिन्हें बाँट देती भेदभाव बिना -

देने और लेने वाले दोनों में ,

 बराबर।


शक्तियों में भी सर्वोत्तम है -

  किसी सम्राट के ह्रदय में बसी करुणा -

 जो बढ़ाती उसकी शोभा -

 उसके शीश पर सजे 

रत्न - मुकुट से भी अधिक।


 राजदंड होता -

लौकिक सत्ता, राजसी वैभव -

और निरंकुश शक्ति का प्रतीक -

जो जगाये रखता जन -मन में -

राजसत्ता के प्रति भय - मिश्रित सम्मान।


 इन सब राजसी प्रतीकों से-

कहीं ऊँचा होता करुणा का स्थान-

वह निवास करती है

 स्वयं राजा के ह्रदय में -

ईश्वरीय गुण का स्वरुप धर कर ।


और  प्रजा के लिये  --

राजा का न्याय भी बन जाता-

 ईश्वरीय  न्याय  के समतुल्य -

जब  मिला हो  उसमें,

करुणा का अमृत - रस।



A Transcreation of  William Shakespeare's   "The Quality Of Mercy "



 

Sunday, 7 June 2026

सपने

             अपने सपनों को जीवित रखो 

             प्राणपण से रक्षा करो उनकी 


              उनके  निष्प्राण हो जाने से-

              अक्षम हो जायेगा तुम्हारा जीवन,

              उस टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह

              जो चाह कर भी उड़ नहीं सकती।


           मजबूती से पकड़े रहो  उनको 

           यदि  वे फिसल गये हाथों से 

          तो तुम्हारा जीवन  बन जायेगा 

        बर्फ़ में दबे खेतोँ जैसा  अनुर्वर 

          जिसमें कुछ भी उग नहीं सकता।

           


            धन की  सीमाओं का सत्य तो बता चुके हैं 

             ईसा से लेकर गाँधी तक 

           क्या असीसी के संत फ्रांसिस भी 

            सिद्ध नहीं करते इसकी निस्सारता?


           अच्छाई  की  गरिमा अनायास ही -

           पीछे छोड़ देती है राज -शक्तियों को 

          करुणा का प्रभामण्डल चमकता है -

          रत्नजटित सोने के मुकुट से अधिक,

          और प्रेम के ओस कण धूमिल कर देते हैं -

          हीरे की  आभा को भी -

         अपनी  अप्रतिम जगमगाहट से।



         ( Langston Hughes की  कविता 'Dreams' का भावानुवाद )


    

Friday, 5 June 2026

मैं स्वप्न देखता हूँ.... ( I Dream A world )

 मैं  देखता हूँ  सपना 

 एक ऐसी दुनिया का-


जहाँ  एक इंसान दूसरे इंसान  से -

नफरत न करता हो.

 जहाँ प्रेम - रस से  भीगी हो सारी धरती -

और रास्ते  सजे हों अनुपम शांति से।


मैं देखता हूँ एक ऐसी दुनिया का स्वप्न -

जहाँ हर किसी को मिले   पूर्ण स्वतंत्रता -

जहाँ धन - लिप्सा  आत्मा को दुर्बल  न बना दे -

और  लोलुपता न  बन जाये -

 जीवन का अभिशाप!


 जहाँ  लेश मात्र भी  रंग भेद न हो -

और उदारता से  बँटते  हों सबमें 

धरती के अनुपम उपहार.

जहाँ हर मनुष्य स्वतंत्र हो अपने जीवन में - 

 दुष्टता शर्मिंदा होकर सर झुकाये खड़ी हो,

 और ख़ुशी,  अनमोल   मोतियों की तरह -

 मानव -मात्र की जरूरतों को -

 पूरा करने में जुटी हो।

                   हाँ, एक ऐसी ही दुनिया  का स्वप्न देखता हूँ मैं

                             ऐसी ही दुनिया का!!



   Walt Whitman  - (1819 - 1892)   की कविता का भावानुवाद 

Wednesday, 3 June 2026

यदि तुम मुझे भूल जाओ

 

सुनो!

मैं चाहता हूँ कि 

एक बात भली भाँति

समझ लो तुम --

कि जब भी मैं देखता हूँ 

अपनी खिड़की से 

बर्फ़ से ढकी टहनी पर टिके 

 स्फटिक जैसे चमकते चाँद को 


कभी आग के पास बैठा,

छूने की कोशिश करता हूँ,

अंगारों से झरती नर्म राख की परतों को 

या जली हुई लकड़ी की देह  पर -

उभर आई झुर्रियों को।


इस सब के बीच न जाने क्यों 

मेरा मन अनायास ही 

 खिंचा चला जाता है 

 तुम्हारी  ओर।


मानों दुनिया की हर एक चीज़ 

और वह हर चीज़ जो मेरे आस - पास है --

खुशबू, रौशनी और धातुओं की चमक 

सब मिलकर छोटी -छोटी नावें बन गई हों 

मुझे तुम्हारे उन द्वीपों की ओर ले जाने के लिये 

जहाँ तुम मेरी प्रतीक्षा में हो ।


और अब, इस के उलट --

यदि तुम धीरे, धीरे 

मुझे प्रेम करना बंद कर दोगी 

तो सच मानो, मैं भी वही करूँगा 

 ठीक तुम्हारी तरह,

  धीरे, धीरे।

    

  और हाँ, 

यदि तुम अचानक ही मुझे भूल जाओ 

तो फिर कभी मुझे मिलने की 

उम्मीद न रखना, क्योंकि मैं 

पहले ही भूल चुका होऊँगा तुम्हें।


यदि तुम्हे मेरा जीवन - संघर्ष 

कुछ अधिक ही लम्बा और उन्मादी  लगे 

और विचलित करें -

मेरे रास्ते में आने वाली -

निरंतर झिँझोड़ती, डराती -

तूफानी हवायें.

कि तुम आगे न चलना चाहो मेरे साथ,

और छोड़ कर चली जाओ  मुझे-

 उसी जगह जहाँ मेरी जड़ें  

 गहराई  तक गड़ी हुई हैं।


  याद रहे कि --

ठीक उसी दिन, 

उसी बेला,

मैं अपना सब कुछ समेट कर 

  चल दूँगा,

  किसी और प्रेम -की तलाश में।


 किन्तु यदि  तुम --

 हर दिन, हर घड़ी,

यह महसूस करो 

कि अपनी अडिग मधुरता के साथ 

नियति ने तुम्हें बनाया है 

मुझसे ही जुड़ने के लिये।यदि हर दिन कोई फूल 

तुम्हारे होंठों तक पहुँच जाये 

 मुझे ढूँढते  हुए --

तो, समझ लेना प्रिये, कि -

मेरे प्रेम  की लौ फिर जगमगा उठेगी 

 जैसे कि कुछ भी न तो बुझा था,

न ही भुलाया गया।


  मेरा प्रेम तुम्हारे ही प्रेम से पुष्ट होता है, 

  और जब तक तुम इस दुनिया में हो,

    तुमसे बँधा रहेगा वह जीवन भर 

   अपने समूचे अस्तित्व के साथ।



(नोबेल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरुदा की कविता If You Forget Me  का भावानुवाद )



Sunday, 31 May 2026

एकांत का गान ( Ode To Solitude by Alexandar Pope )

     



        एकांत का गान 


     कितना सुखी है वह इंसान 

     जिसकी सारी इच्छायें, चिंतायें 

     सिमटी हों अपनी पैतृक धरती की -

     सीमाओं के भीतर।

      जो संतुष्ट हो विरासत में मिले,

       चंद खेतों के बीच रहकर 

      अपनी जन्मभूमि की हवा में,

      सुखपूर्वक साँस लेते हुए।

    

       जिसके पशुधन से  प्राप्त होता हो -

       अमृत सा निर्मल दूध,

       खेतों से  पोषण के लिये  भरपूर अन्न 

       और भेड़ों से शरीर के लिये ऊनी वस्त्र।

      वृक्षों से मिलती हो ग्रीष्म ऋतु में छाया 

       और शीतकाल में  ठिठुरने से बचाता,

           बहुमूल्य ईंधन।


       धन्य है वह  संतोषी  आदमी --

      जो स्वस्थ तन और शांत मन के साथ -

      निश्चिन्त भाव से देखता रहता -

      समय के अदृश्य कारवाँ को -

      घंटों, दिनों और वर्षों को लेकर 

      निः शब्द गुजरते हुए।

   

      परिश्रम , अध्ययन और विश्राम से -

      संतुलित दिनचर्या के उपरांत -

     जिसको सुलभ हो गहन निद्रा का वरदान -

      अनुप्राणित हो  जिसका जीवन संघर्ष -

     निष्कपट विनोद और शांत आत्म मंथन से। 


     चाहता हूँ कि  जी सकूँ उसी की तरह मैं भी,

      अनदेखा, अनजान रहते हुए, 

      मेरी मृत्यु पर न तो  शोक मनाये  कोई 

      और न  ही लगाया जाये  शिलापट्ट 

       मेरी समाधि पर,

      यह बताने कि यहाँ सोया हुआ हूँ मैं -

       चिर निद्रा में।

Friday, 22 May 2026

Breathes There The Man

        कभी किसी ऐसे संवेदनशून्य व्यक्ति को देखा है -

           जिसके ह्रदय मे देश के लिये प्रेम न हो -

           जिसने कभी भाव - विह्वल  हो कर 

           अपने आप  से न कहा हो -

        " यह मेरी जन्मभूमि है, मेरी अपनी जन्मभूमि!"?


           विदेश में घूमकर आने के बाद -

         अपनी धरती की ओर कदम बढ़ाते हुए -

          प्रफुल्लित न हो जाता हो जिसका ह्रदय?


             क्या सचमुच कहीं कोई है ऐसा?

            यदि हाँ, तो जाओ-

            पहचान लो उसको भली भाँति।

            उसके सम्मान में कभी कोई कविता 

            नहीं  लिखी जाती, और न ही गाया जाता है -

            कोई प्रशंसा गीत।

             

               भले ही कितनी बड़ी उपाधियाँ -

          जुड़ी हों उसके नाम के साथ,

         अकूत धन-सम्पदा और शक्तियों का -

               स्वामी होने के बल पर।

         


              किन्तु  केवल संकीर्ण स्वार्थ में डूबा 

             वह अभागा तो निश्चित रूप से एक दिन 

             खो देगा सारा नाम, वैभव और प्रभाव,

              अपने जीते जी ही 

                और यह स्थिति मरण से कम -

                 नहीं  होगी उसके लिये। 


               जीवन के अंत में -

              जब मृत्यु दूसरी बार उसके पास आयेगी -

              तो चला जायेगा चुपचाप दुनिया से -

              उसी तुच्छ माटी में मिलने  के लिये -

               जिससे जन्मा था वह कभी।


                 किन्तु उसके जाने पर

                न कहीं शोक के आँसू बहाये जायेंगे 

              और न ही किया जायेगा कोई स्तुतिगान 

                उसके सम्मान  में।

               

      








       (A transcreation of Sir Walter Scott's poem)


         

             

              

    

                 

           

Tuesday, 19 May 2026

STILL I RISE -- मैं फिर उठ खड़ी होऊँगी --





इतिहास के पन्नों में 

                                     भले ही मेरे  नाम को तुम -

                                   अपने कड़वे, मनगढंत अभियोगों से -

                                            कलंकित कर दो। 

                                        चाहे मुझे कीचड़ में धकेल कर- 

                                       पैरों से रौँद डालो,


                                      मैं फिर भी ऊपर उठ जाऊँगी -

                                        धूल की आँधी बनकर।


                                        क्या मेरी जिंदादिली से जलन होती है तुम्हें?

                                         क्यों छाई है यह उदासी तुम पर-   

                                         क्या इसलिए कि मैं  ऐसे चलती हूँ -

                                          मानों मेरे ड्राइंग रूम में -

                                            तेल के कुएँ उफ़न रहे हों?


                                           हर सुबह के सूरज, हर रात के चाँद की तरह,

                                          समुद्र में उठते ज्वार के शाश्वत क्रम की तरह,

                                          आकाश की ओर उठती आशाओं की तरह,

                                           मैं फिर -फिर  उठ खड़ी होऊँगी।


                                       क्या तुमने चाहा था मुझे टूटा हुआ देखना-

                                         झुके सिर और नीची नज़रों के साथ?

                                        मेरे करुण विलाप से निकल कर बहती-                                                                            अश्रुधारा की तरह -

                                        नीचे गिरते मेरे कंधों को?


                                    क्या मेरा स्वाभिमानी होना अखरता है तुम्हें?

                                    असहनीय होता है  मुझे  इस तरह -

                                     खुलकर हँसते देखना मानों -

                                     पा गई  होऊँ  मैं  सोने की खानें -

                                    अपने ही आंगन में।


     

                                 अपने शब्द - बाणों  से -

                                  छलनी कर सकते हो मुझे तुम -

                                  कर सकते हो तीखी दृष्टि से घायल, 

                                  और पूरी तरह भस्म भी -

                                  अपनी घृणा की अग्नि में जलाकर 


                                           लेकिन मैं फिर भी उठ जाऊँगी-

                                                  हवा की तरह।


                                       क्या मेरा आत्मविश्वास भरा नारीत्व,

                                        असहज करता है तुम्हारे अहं को?

                                       क्या अचरज होता है यह देख कर  

                                       कि मैं ऐसे मुस्कराती हुई चलती हूँ -

                                       मानों मेरे शरीर में  कीमती हीरे छुपे हों?

                                        Ii


                                     इतिहास के उस शर्मनाक दौर से -

                                            मैं दूर निकल आई हूँ  -

                                       उठ आई हूँ ऊपर  पीड़ा और -

                                       दुखों की गर्त में डूबे अतीत से।


                                 एक विशाल, गहरा काला सागर हूँ मैं -

                             उमड़ते -सिकुड़ते ज्वार-भाटों को अंक में समेटे -

                                भय और आतंक के अवरोधों को लाँघती हुई -

                              निरन्तर ऊपर  उठ रही हूँ ,अपने पूर्वजों से मिले --

                                 दासता -मुक्त  जीवन के सपनों  को -

                                    साकार होते देखने के लिए।



                                    



                     अमेरिकी कवयित्री माया एंजेलों की प्रसिद्ध कविता                                          "STILL I RISE " का भावानुवाद         

    

                                             

         

    


                                                


                

      

Saturday, 16 May 2026

अपराजेय

                                                           




                                              उस काली रात से निकल कर -

                                             जो मुझे चारों ओर से घेरे है -

                                            मैं अपना आभार भेजता हूँ -

                                        उन सब ज्ञात - अज्ञात  देवताओं को -

                                         जिनकी कृपा से मिली है मुझे -

                                              मेरी यह अजेय आत्मा.


                                   अनगिनत आपदाओं की कठोर  गिरफ्त में भी मैं -

                                              कभी विचलित नहीं हुआ -

                                      और  न ही किया मैंने करुण विलाप.


                                       दुर्योग के कठोर प्रहारों   से -

                                  रक्त - रंजित भले ही हुआ मेरा शीश -

                                        किन्तु झुका नहीं कभी.


                                  क्रोध और आँसुओं से भरी इस दुनिया में -

                                   फैला है चारों ओर अंधकार का भय-

                           किन्तु राह में आये संकटों  ने मुझे सदैव निर्भीक पाया -

                                     और ऐसा ही होगा आगे भी.


                                     तनिक परवाह नहीं मुझे कि-

                                    कितना दुर्गम होगा मेरा रास्ता -

                                  कितने अभियोग, कितने दंडादेश -

                                    अंकित हैं मेरे भाग्य लेख में।


                                       क्योंकि मुझे विश्वास है कि --

                                  कि मैं स्वयं अपने भाग्य का स्वामी हूँ -

                               और अपनी अजेय आत्मा का नियंता भी।

    

                             

                       

          ( A transcreation of William Ernest Henley's   poem INVICTUS )


  

                      


                       
                        

Friday, 15 May 2026

Don't Quit ---- हार न मानो कभी




                                    जब  स्थितियाँ प्रतिकूल हो गयी हों,

                                   और कठिन होता जा रहा हो रास्ता -

                                   जब  जेब हो हल्की और कर्ज़ का बोझ भारी 

                                   मुस्कराना चाहो पर  ह्रदय से आह निकले,

                                    जब चिंताओं का बोझ दबा रहा हो तुम्हें.     

   

                                        तब थोड़ा  विश्राम अवश्य कर लेना,

                                      किन्तु हार मान कर रुकना नहीं!


                                    कदम - कदम पर अहसास होता है,

                                    कि अनेक-उतार -चढ़ाओं

                                        और अप्रत्याशित मोड़ों से  भरा -

                                     बड़ा ही विचित्र है यह जीवन -पथ!


                                     कई बार जीत के बहुत पास पहुंचकर भी,

                                      असफल हो जाते हैं हम,

                                      काश हार नहीं मानी होती -

                                       तो  शायद जीत गये होते.


                                      इस लिये चलते रहो बिना रुके,

                                      भले ही गति धीमी हो जाये,

                                       निरंतर बढ़ते कदम ही तुम्हें -

                                       पहुँचा सकते हैं सफलता के शिखर पर.


                                       सच है कि विफलता के अंतर में ही -

                                        छिपी रहती है स्वर्णिम सफलता,

                                       संशय के काले बादलों के बीच चमकती -

                                            आकाशीय बिजली सी।


                                        कभी - कभी तुम नहीं जान पाते,

                                        कि कितने पास पहुँच गये हो,

                                         तुम अपनी मंज़िल के,

                              यद्यपि वह तुम्हें  अब  भी बहुत दूर प्रतीत होती हो ।  

      

                                              जीत पाने के लिये लड़ते रहना होगा तुम्हें,

                                              बड़े से बड़ा आघात झेलते हुए,

                                             विकटतम युद्ध में भी-,

                                             डटे रहना होगा मोर्चे पर!

                      

   A transcreation  of  "Don't Quit" a poem by  Edgar A. Guest                                                                                                             (1881-- 1959)




Sunday, 10 May 2026

आशा

   



   आशा --

  एक नन्ही सी चिड़िया -

   जो रहती मन के भीतर -

   निरन्तर  गुनगुनाती -

  शब्दहीन गीत 


   आँधियों  के बीच भी 

  सुनाई देता है उसका मीठा संगीत 

भला कौन सा तूफान  -- 

विचलित कर पायेगा उसे 

जो रखती अगणित ह्रदयों को 

जीवन - ऊष्मा से अनुप्राणित?


 मैंने सुना है उसका गान 

हिमशीतल प्रदेशों में 

और अजनबी समुद्रोँ के बीच -- 

किन्तु विषमतम परिस्थिति में भी 

नहीं माँगा उसने मुझसे 

रोटी का एक टुकड़ा!!


(A transcreation  of Emily Dickinson's poem " Hope Is The Thing With Feathers)

Saturday, 9 May 2026

Let Me Not Pray...


     मेरे प्रभु!

मैं तुमसे इस लिये प्रार्थना नहीं करता -

कि मुझ पर कभी कोई संकट न आयें -

किन्तु इसलिए कि कर सकूँ उनका सामना -

     निर्भीक हो कर।


मैं नहीं माँगता कि स्वयं ही -

शांत हो जाये मेरी पीड़ा -

अपितु यह, कि उस पर विजय पा सके -

   मेरा ह्रदय!


संकट आने पर भयभीत होकर -

प्राण रक्षा के लिये आकुल न हो जाऊँ -

बल्कि धैर्य पूर्वक संघर्ष कर सकूँ -

अपनी स्वतंत्रता के लिये।


वरदान दो मुझे मेरे प्रभु!

कि मैं कायर न बनूँ कभी,-

कि महसूस कर सकूँ तुम्हारी दया को -

केवल अपनी सफलता में नहीं -- 

विफलताओं में भी मुझे -

मिलता रहे तुम्हारा साथ।


(गुरुदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर की कविता का भावानुवाद) 



Tuesday, 5 May 2026

यदि तुम...


   यदि तुम  रख सको स्वयं  को संयत -

  जब तुम्हारे आस -पास के लोग -

   आत्म - नियंत्रण खो रहे हों --

  और मढ़ रहे हों सारा दोष  तुम पर.


    जब सब तुम पर संदेह करें -

    किन्तु तुम बनाये रखो आत्मविश्वास -

     उनके संदेह को भी -

     ध्यान में रखते हुए.


    

      तुम प्रतीक्षा करो  बिना रुके,थके -

     झूठ का शिकार  बनने पर भी -

      बदले में झूठ का सहारा न लो -

      घृणा  किये जाने पर भी -

      घृणा करने से बच सको -

     और कोशिश न करो  कभी 

   अत्यधिक भला और समझदार दिखने की.


   यदि तुम सपने देखो -

   किन्तु उनके वश में हो जाने से बचो -

  विचारों का स्वागत तो करो -

   किन्तु उनमें ही उलझकर न रह जाओ.


यदि हार और जीत दोनों को ही -

एक समान भ्रामक मान सको -

  और  करो दोनों  स्थितियों  को -

      समभाव से स्वीकार.


यदि सह सको अपनी कही सत्य बातों को -

किन्ही कुटिल जनों द्वारा -

तोड़ मरोड़ कर, भोले लोगों को -

फँसाने हेतु प्रयोग होते देखना.


यदि जीवन भर के परिश्रम से बनी -

चीजों को टूटा देख,

 बिना  विचलित हुए झुक कर -

जुट सको उन्हें फिर  से जोड़ने में.


यदि अपनी सारी कमाई को  इकठ्ठा कर -

 हार या जीत के लिये --

 एक साथ दाँव पर लगा सको,

 और सब कुछ हार बैठो.

 

किन्तु फिर भी सब  भूलकर -

कर सको एक नई शुरुआत -

अपने भारी नुकसान का -

ज़िक्र तक किये बिना ।


यदि तन, मन और मस्तिष्क को -

उनके थक जाने के बाद भी -

काम पर लगाए रखो -

और बने रहो उनके साथ-


 जब तक शेष न हो जाये -

तुम्हारी  अपनी संकल्प शक्ति -

जो कहती रहती है निरंतर -

 " रुको मत, डटे रहो ".


यदि तुम  भीड़  के बीच भी -

अपने गुण बनाये रख सको -

और राजाओं की संगति में भी -

 बने रहो साधारण जन.


 यदि आहत न कर पायें -

 तुम्हें तुम्हारे शत्रु -

 अथवा परम स्नेही मित्र -

तुम विश्वास करो सब पर -

किन्तु अत्यधिक किसी पर नहीं.



 अपने अमूल्य समय के हर मिनट की -

     पूरे साठ क्षणों की अवधि  को -

    सार्थकता से  भर कर सको.


तो यह धरती, और उस पर जो कुछ है -

सब तुम्हारा हो जायेगा -

और उस से भी  बढ़ कर -

तुम बन जाओगे एक सच्चे मनुष्य, 

मेरे प्यारे बेटे!!





  A transcreation of Rudyard Kipling's renowned poem "IF"