Friday, 26 December 2025

दो शब्द

                                                              ( 1)


      श्रीमद्भगवद् गीता   भारत की आत्मा है. भारत का धर्मग्रन्थ है. नीति शास्त्र का चितेरा है. कर्मयोग का अग्रणी शास्त्र है. इतना अधिक गंभीर है  कि जिसने भी इसका अध्ययन किया, उसीने उसके अपने गूढ अर्थ निकाले. अर्थात गीता सबकी चहेती हो गयी. गीता का पढ़ना इसीलिए धार्मिक कृत्यों  में गिना जाने लगा.

   भारत को समझने के लिये गीता का अध्ययन आवश्यक समझा जाता  है. कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान दिया, परन्तु यह ज्ञान मात्र अर्जुन को नहीं दिया गया, अपितु अर्जुन के व्याज से यह ज्ञान  सर्वत्र जगत को दिया गया उद्बोधन है, जिसके माध्यम से भारत को समझने के लिये आसान मार्ग दिखाया गया है.

अब तक गीता के सैकड़ों  अनुवाद हो चुके हैं. कई  महत्वपूर्ण टीकायें लिखी गयी हैं. अनुवादों में भी विनोबा तक ने  गीता के अनेक रहस्य उद्घाटित किये हैं, फिर भी नित नये ग्रन्थ प्रकाश में आ रहे हैं.हिंदी भाषा में भी गीता के सरल अनुवाद प्रकाश में आये हैं. श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी  का यह ग्रन्थ भी उसी श्रेष्ठ परंपरा का महत्वपूर्ण अनुवाद ग्रन्थ है.

ईश्वरी दत्त द्विवेदी धार्मिक विचारों के जाने माने विद्वान हैं. उन्होंने अपने जीवन के श्रेष्ठ पचास वर्ष धार्मिक विचारों को प्राणवंत बनाने में लगा दिये. गीता उनकी प्रिय पुस्तक रही है. उन्होंने अध्ययन ही नहीं किया बल्कि गीता के गूढतम अर्थो के रहस्य को भी जानने  की चेष्टा की  है. यह स्पष्ट है कि द्विवेदी का यह  गीता अनुवाद उनके दीर्घ कालीन अध्ययन और मनन का ही सुफल है.

मैंने श्री द्विवेदी द्वारा अनूदित इस ग्रन्थ के महत्वपूर्ण अंशों को पढ़ा. सभी पद सरस हैं. शब्द रचना  मौलिक रचना का आभास देती है. ऐसा नहीं  लगता कि यह किसी रचना का अनुवाद है.कर्मयोग की व्याख्या 'गीता ' का अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश है. यहाँ उस अंश को बड़ी सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है. अध्याय 2 के 47 वें श्लोक  का अनुवाद  इस प्रकार है  --


     मात्र कर्म कर्त्तव्य तुम्हारा 

                फल पर है अधिकार नहीं 

      फल इच्छा से किया कर्म 

                       परमेश्वर को स्वीकार नहीं.       2/47


    सिद्धि, असिद्धि समान समझ कर 

             दोनों में समभाव गहो

      कार्य सफल, असफल  दोनों में

              एक भाव से  मित्र! रहो                    2/48


     इसी प्रकार की सरल पंक्तियों में श्री द्विवेदी ने श्रीमद् भगवद् गीता का अनुवाद किया है. सरस काव्य में सम्पूर्ण गीता ज्ञान को पिरोया गया है. भाषा के सुन्दर प्रयोग हुए हैं. मैंने गीता के चार और अनुवाद भी पढ़े हैं परन्तु मुझे श्री द्विवेदी  का अनुवाद सबसे उत्तम और आकर्षक लगा है.

हिंदी जगत  में इस ग्रन्थ का विशेष आदर होगा, ऐसा मेरा विश्वास है. श्री द्विवेदी के  श्रम को विद्वान  स्वीकारेंगे और इस विशिष्ट कृति की सराहना करेंगे. साथ ही सामान्य पाठक भी इस अनुवाद को सहज रूप से  अपनाएंगे और इसके अमृत संदेशों का लाभ उठाएंगे.

 श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी के इस प्रशंसनीय कार्य के लिये मैं उन्हें साधुवाद देता हूँ और उनके सतत अध्ययन और मनन  के प्रतिफल के रूप में उनकी जो यह अद्भुत उपहार हिंदी जगत को मिला है उसके लिये उन्हें बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि भविष्य में भी वे ऐसी ही महत्वपूर्ण कृतियों की रचना कर के  हिंदी साहित्य को निरंतर  समृद्ध करते रहेंगे.

                       डॉ शिवानंद नौटियाल

                    पूर्व उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री 

                     8, तिलक मार्ग, डाली बाग, लखनऊ, उ. प्र.

20.12.95



                                                              ( 2  )


'श्रीमदभगवदगीता '  स्वयं भगवान के मुख से निः सृत अलौकिक वाणी है . विश्व के  महिमामय ग्रंथों में यह सर्वोत्कृष्ट है.  इस ग्रन्थ का  प्रत्येक शब्द मुक्ता एवं प्रत्येक पद गंभीर पयोनिधि है. ईश्वर के गुण,स्वरुप एवं प्रभाव तथा उपासना,  कर्म,  ज्ञान- विज्ञान और रहस्य का जैसा प्रतिपादन महर्षि वेदव्यास ने इसमें किया है, वैसा विश्व के किसी अन्य ग्रन्थ में दुर्लभ है. यह ग्रन्थ शास्त्रों का शास्त्र है, वेदों का सार है,, ज्ञान का समुद्र है तथा मुक्ति की गंगा है.


संस्कृत में विरचित ऐसे अद्भुत ग्रन्थ का  हिंदी भाषा में काव्यानुवाद अत्यंत दुष्कर है, किन्तु पंडित ईश्वरी दत्त द्विवेदी जी ने  इस असाध्य कार्य को  अपनी भक्ति एवं लगन से   साध्य बना डाला है. राष्ट्र भाषा के माध्यम से  साधारण जन भी गीता के मर्म को समझ सकेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है.

 इस काव्यानुवाद में कवि ने  गीता की मूल संवेदना व भावात्मकता की  सर्वत्र रक्षा की है. भाषा सरल, सहज व स्वाभाविक है, भाव अविच्छिन्न हैं,  लय व प्रवाह अबाधित है. संस्कृत भाषा का इतना सुन्दर  हिंदी काव्यानुवाद  इससे पहले मेरे देखने में नहीं आया.  गीता के एक श्लोक का एक ही छंद में काव्यानुवाद  कर पाना किसी प्रतिभा संपन्न कवि की ही सामर्थ्य है. यहाँ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा  -- 


   सुख दुःखे समे कृत्वा  लाभा लाभो जयाजयो

        ततो युध्याय युज्यस्व नैवं पापमवाप्यसि          

               --- श्रीमद् भगवद्गीता    2/ 38 


जब लाभ- हानि, सुख- दुःख  जयाजय में समभाव  रहोगे

तुम तभी युद्ध करने पर भी सब पाप - विमुक्त रहोगे "



अस्तु, करोड़ों हिंदी भाषियों तक  गीता के अनुपम ज्ञान को पहुँचाने के लिये कवि पंडित ईश्वरी दत्त द्विवेदी साधुवाद के पात्र हैं.


डॉ डी. एस. पोखरिया

एम. ए., पीएच. डी.,  डी. लिट.

रीडर, हिंदी विभाग 

 कुमाऊं विश्वविद्यालय., परिसर,अल्मोड़ा




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