अपने अल्प ज्ञान के आधार पर किये गये इस काव्य रूपान्तर को मैं सर्व प्रथम अपने आराध्य देव वासुदेव
Thursday, 4 September 2025
आत्म - कथ्य
अपने अल्प ज्ञान के आधार पर किये गये इस काव्य रूपान्तर को मैं सर्व प्रथम अपने आराध्य देव वासुदेव
Tuesday, 2 September 2025
गीता काव्य रूपान्तर -- तृतीय संस्करण
ऐसे अप्रतिम ग्रन्थ गीता का यह काव्यरूपांतर अपनी सरलता और माधुर्य से पाठकों को उस शाश्वत सत्य से परिचित कराता है जो श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर अर्जुन को उपदेश स्वरुप प्रदान किया था. यह ज्ञान केवल अर्जुन को ही नहीं बल्कि उनके माध्यम से समस्त जगत को दिया गया उद्बोधन है जिसमें जीवन को समझने के अनमोल सूत्र निहित हैं. प्रस्तुत रूपान्तर मेरे पूज्य पिताजी की कठिन साधना का प्रतिफल है. उनका श्रद्धा भाव, गहन अध्ययन और भाषा कौशल इस कृति में परिलक्षित है. संस्कृत के गूढ श्लोकों का भावार्थ सहज और प्रवाहपूर्ण छन्दों में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया हैं कि गीता का दार्शनिक गांभीर्य भी बना रहता है और साथ ही इसकी जीवनोपयोगी शिक्षायें भी पाठक तक सरलता से पहुँच जाती हैं.
वर्ष 1999 में प्रकाशित इस रचना को सामान्य पाठकों के साथ - साथ साहित्य जगत में व्यापक सराहना मिली. पिताजी के स्वर्गवास के पश्चात् सन 2009 में मेरे अनुज श्री दिनेश चंद्र द्विवेदी द्वारा इसका द्वितीय संस्करण मुद्रित कराया गया, जिसे पुनः भरपूर प्रशंसा मिली. इन दो दशकों की अवधि में समय - समय-- पर अनेक पाठकों से प्रतिक्रियायें मिलती रही हैं, जो इस बात की द्योतक हैं कि इतने वर्षों के बाद भी यह पुस्तक कहीं न कहीं पढ़ी और सराही जा रही है और मूल ग्रन्थ की भाँति आज भी प्रासंगिक और प्रभावी बनी हुई है, अतः एक नवीन संस्करण द्वारा इस रचना को पुनः प्रकाशित कर कुछ और सुधी पाठकों तक भी पहुँचाने का विचार मेरे मन में आया, जिसे किसी दैवी प्रेरणा का संकेत मानकर मैंने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य करके साकार करने का प्रयास किया है.
प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से पूर्ववर्ती संस्करणों के स्वरुप में सामान्य सा परिवर्तन है ,किन्तु मूल रचना यथावत है. वह स्वयं में ही इतनी परिपूर्ण है कि उसमें कुछ भी जोड़ने या घटाने की न तो आवश्यकता है और न औचित्य, अतएव इस नवीन कलेवर में भी उसे पूर्ण सम्मान के साथ ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है.
अपने स्वर्गीय पिताश्री की इस अनमोल कृति के नवीन संस्करण को उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरुप प्रकाशित करते हुए मुझे परम संतोष की अनुभूति हो रही है. यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनकी अमूल्य साधना के इस सुफल को पुनः पाठकों तक पहुँचाने का अवसर मिला है. आशा करती हूँ कि पूर्व की भाँति यह पुस्तक भी नये \ पुराने सभी पाठकों को गीता के अमृत सन्देशों से समृद्ध और आनंदित करेगी और वे इसको उसी श्रद्धा और प्रेम से अंगीकार करेंगे जिस भाव से इसे पुनर्प्रकाशित किया गया है
. इन्दु नौटियाल Not to be included in the new edition.
देहरादून
Monday, 1 September 2025
श्री मद्भगवद्गीता-- हिंदी काव्य रूपान्तर -- श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है. यह केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं अपितु मानव जीवन का परम मार्गदर्शक है, जो मानव को उसके कर्तव्य, धर्म और आत्म ज्ञान की ओर उन्मुख करता है. गीता का उपदेश केवल युद्ध - भूमि तक सीमित नहीं है, वरन यह समस्त मानवता के लिये एक शाश्वत सन्देश है, जो प्रत्येक युग में प्रासंगिक बना रहता है. इसमें अर्जुन और श्री कृष्ण का संवाद हर जिज्ञासु आत्मा और उसके अन्तःकरण में स्थित ईश्वर के बीच का संवाद है. इसका प्रत्येक श्लोक जीवन के जटिलतम प्रश्नों का उत्तर प्रदान करता है और जिज्ञासु को आत्मिक शांति और समाधान की ओर ले जाता है.गीता हमें यह सिखाती है कि संकट, मोह और भ्रम की घड़ी में भी कर्तव्य परायणता, निष्काम भाव और आत्मिक दृढ़ता ही मानव का सच्चा आश्रय है.
इसी गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रन्थ को सुलभ और सरस बनाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी ने. उनका यह काव्य रूपांतर संस्कृत श्लोकों की गंभीरता को बनाये रखते हुए हिंदी छन्दों की मधुरता में ढला हुआ है. इस प्रस्तुति से गीता का अमृत सन्देश केवल विद्वानों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि साधारण पाठक भी उसकी गहराई को सहज भाव से आत्मसात कर सकता है.
लेखक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने भावानुवाद में कहीं भी मूल ग्रन्थ की गरिमा से समझौता नहीं किया. गीता के प्रत्येक अध्याय, प्रत्येक श्लोक के सार को उन्होंने ऐसे सरल और प्रवाहपूर्ण छन्दों में ढाला है जो पाठक को दार्शनिक गंभीरता से बोझिल नहीं करते, बल्कि रस और प्रेरणा से भर देते हैं. उनके शब्दों में दार्शनिक विवेक के साथ -साथ भक्ति का माधुर्य और काव्य की सरसता भी झलकती है.
आज के समय में, जब जीवन की भागदौड़, भौतिकता और तनाव ने मनुष्य को अशांति और असंतोष से भर दिया है, गीता के उपदेश पहले से भी अधिक आवश्यक प्रतीत होते हैं. श्री द्विवेदी द्वारा किया गया यह रूपान्तर केवल उपदेशात्मक ग्रन्थ नहीं अपितु आत्मा के लिये अमृत स्रोत बन कर सामने आ जाता है.छन्दों का लयात्मक प्रवाह पाठक को बाँध लेता है और सन्देश ह्रदय तक सहजता से पहुँच जाता है. यही इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वह मन और मस्तिष्क दोनों को ही स्पर्श करती है.
यह काव्य - रूपान्तर केवल अनुवाद नहीं, बल्कि साधक का आत्मानुभव है. इसमें लेखक का गहन अध्ययन, अध्यात्म के प्रति उनकी आस्था और साहित्यिक अभिरुचि का अद्भुत संगम दिखाई देता है उन्होंने गीता को अपने अन्तःकरण से जी कर ही उसके भावों को कवित्व में ढाला है, इसीलिए यह कृति ह्रदय स्पर्शी बन पड़ी है.
इस रूपान्तर के माध्यम से गीता का शाश्वत सन्देश नई पीढ़ी तक पहुँचाना सराहनीय प्रयास है. यह केवल गीता का पुनर्पाठ नहीं बल्कि जीवन- मूल्यों की पुनर्स्थापना भी है. जब - जब मनुष्य अपने मार्ग से विचलित होता है, तब - तब गीता का यह स्वर उसे सही दिशा दिखाता है. गीता के सन्देश निः संदेह उस आलोक स्तम्भ की तरह हैं जो अंधकार में भटके पथिक को उसकी सही राह दिखाता है.
यह कृति न केवल गीता के सन्देश को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम है वरन उस श्रेष्ठ परंपरा का भी उदाहरण है जिसमें अध्यात्म और साहित्य का सुन्दर संगम दिखाई देता है यहाँ न केवल शास्त्र की गंभीरता है, बल्कि काव्य का सौंदर्य भी है, न केवल उपदेश है, बल्कि आत्मीय संवाद भी है. यह काव्य - रूपान्तर समय की माँग है क्योंकि इसके माध्यम से गीता का शाश्वत सन्देश अधिकाधिक पाठकों तक पहुँच कर उनके जीवन की राह को आलोकित करेगा
Wednesday, 18 June 2025
एक पर्वत, एक योगी
एक पर्वत,एक योगी
नीला आकाश! दूर, दूर तक फैली हिमाच्छादित चोटियाँ
उनके बीच एक शिखर, दीखता है शांत,
लेकिन उसमें कम्पन भी है,
जैसे भीतर ध्यान चल रहा हो.
उसकी चुप्पी में गूँज है आत्मा की --
वह बोलता नहीं किन्तु सुनता है सब कुछ.
वह चलता नहीं,
पर बहती हैं असंख्य जलधारायें उस से.
उसकी ऊँचाई तुम्हें सिर झुकाना सिखाती है-
और उसकी कठोरता-- अपने भीतर करुणा को सहेज रखना
वह योगी है -- चिर - समाधिस्थ --
फिर भी सदैव जागृत.
Sunday, 20 April 2025
COUNT YOUR BLESSINGS
Start counting your blessings -
Right now.
scattered around they are-
In number and ways -
More than you can imagine.
Here is the great, good Earth -
You are standing upon-
Enjoying countless bounties-
She offers to you freely-
Without asking for a return favour.
Enveloping it is the atmosphere-
Balancing the vital elements-
The air, fire and water cycle-
To ensure life keeps flourishing-
Upon this vast planet.
And the seamless blue sky -
Overlooking like an angel -
Is Sending light and warmth -
From its heavenly lamps -
The glorious Sun and Moon.
Being alive herein -
With such unique gifts assured -
Isn't an ultimate blessing -
To feel truly grateful to-
The Supreme Provider?
Saturday, 14 December 2024
Nirjharini: याचना
Wednesday, 18 October 2023
Horrors of war
Scenes from the war zone!!
Missile and rockets darting
from one side to the other,
Making the sky tremble
No less than the earth below.
Houses and tall buildings,
Crumbling down like pack of cards,
Debris piled up on the ground,
Silent proof of utter devastation,
Caused by insane minds.
Hapless victims praying for life,
In the wake of unimaginable plight,
Keep asking themselves and others,
" What crime or sin did we commit,
To deserve this inhuman torture? "
What evil spirit did initiate,
This mad, mad, misadventure,
Thrusting unsuspecting lives,
Into the blazing flames of
Excruciating pain and death?
But what I seek to know is not,
Who to blame for this bloody venture,
Nor does it interest me to learn,
Who is losing ground in the battle,
Or, who is likely to emerge the winner.
For, I know it's never going to end,
As hatred begets hatred only,
And revenge with its deadly teeth,
Is ever on prowl to dig out again,
What appears to have been buried.
But my heart instinctively goes
Beyond the visuals on TV screen
Imagining the fate of those abducted
Destined to undergo untold sufferings
For no fault of theirs.
I know its rather futile to hope
An early end to this ugly warfare
But do wish some miracle to happen
Concluding it in amicable solutions
To avoid further loss of precious lives
Picture from internet
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