कोई भी मनुष्य नहीं है --
अपने आप में सम्पूर्ण और स्वतंत्र
किसी द्वीप की तरह।
वह तो मात्र अंश है --
एक विशाल महाद्वीप का -
उसका एक छोटा सा भूखंड.
जिसकी मुट्ठी भर मिट्टी भी -
सागर की लहरें बहा ले जायें,
तो धरती उतनी ही क्षीण हो जाती है --
जैसे कि कोई प्रायद्वीप खो गया हो,
जैसे ढह गया हो तुम्हारे मित्र के घर का कोई हिस्सा ,
या तुम्हारा अपना ही घर ।
दुनिया के किसी कोने में -
किसी भी इंसान की मृत्यु -
मुझे दुर्बल बना देती है।
क्योंकि मैं मानव -परिवार का एक अंग हूँ।
इसलिए यह कभी नहीं पूछता
कि चर्च की यह घंटी
किसके मृत्यु -शोक में बज रही है,
(जानता हूँ उत्तर मिलेगा )
यह तुम्हारे लिये ही बज रही है!
अंग्रेज कवि जॉन डोन की सुविख्यात कविता "नो मैन इज एन आइलैंड" का भावानुवाद
जॉन डन की यह प्रसिद्ध कविता मानव - एकता और पारस्परिक संबंधों का गहरा सन्देश देती है।कवि कहता है कि कोई भी मनुष्य अपने आप में पूर्णतः अकेला या स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, हम सभी एक - दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक व्यक्ति का दुःख अथवा हानि समस्त मानवता को प्रभावित करती हैं। यह कविता करुणा, सह - अस्तित्व और मानवीय संवेदना का महत्व रेखांकित करती है तथा हमें सन्देश देती है कि मानवमात्र की वास्तविक शक्ति एक -दूसरे से जुड़े रहने में ही है।
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