Friday, 16 January 2026

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                                           श्रीमद भगवद गीता :  हिन्दी काव्य रूपान्तर 

     प्रकाशक: ईश्वरी दत्त द्विवेदी

   शिव पुर, कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल

            उत्तराखंड

© लेखका धीन

इस पुस्तक  के समस्त अधिकार सुरक्षित हैं। लेखक एवं प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना इस पुस्तक का कोई भी अंश किसी भी रूप में पुनर्रप्रकाशित या प्रसारित नहीं किया जा सकता।


अस्वीकरण :

यह कृति श्रीमद् भगवद् गीता का हिंदी काव्य रूपान्तर है। इसका उद्देश्य मूल ग्रन्थ के दार्शनिक संदेशों को सरल एवं काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करना है। यह किसी भी प्रकार की शास्त्रीय व्याख्या, मतान्तर या आधिकारिक भाष्य का दावा नहीं करती।


प्रथम संस्करण : --    1999

द्वितीय संस्करण :--     2009

तृतीय संस्करण :--      2026

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मुद्रण स्थान 

मुंबई, महाराष्ट्र 

मुद्रक -- 

Saturday, 27 December 2025

धृतराष्ट्र की व्यथा

  दिव्य - दृष्टि - वरदान  प्राप्त तुम 

         वेदव्यास से हे संजय!

युद्ध - भूमि  की गतिविधि मुझको 

          बतलाते जाओ निर्भय.


  दुर्योधन  की हठधर्मी, उस पर --

          मेरी ममता की डोर 

 खींच ले गयी सारे कुल को --

          महाकाल के मुख की ओर 


   कुरुक्षेत्र  के धर्म -धाम  में 

       होगा अब भीषण संग्राम 

पाण्डु और मेरे पुत्रों का 

        क्या होगा संजय! परिणाम?


     युद्ध  नहीं  यह महाकाल का --

         होगा नृत्य भयंकर 

याद दिलाएंगे युग - युग तक 

           रक्तवर्ण माटी   प्रस्तर 


लिखने वाला है  क्रूर काल 

      कुरुकुल की करुण कहानी 

मिटने वाली है भव्य राष्ट्र की 

       गौरवमयी कहानी 


जो भी हो अब देख रहे जो --

    सब कुछ  मुझको बतलाओ 

बना लिया पत्थर है मन को 

      यथा घटित  कहते जाओ.


  ( गीतेतर -- क्षमा याचना सहित) 

Friday, 26 December 2025

दो शब्द

                                                              ( 1)


      श्रीमद्भगवद् गीता   भारत की आत्मा है. भारत का धर्मग्रन्थ है. नीति शास्त्र का चितेरा है. कर्मयोग का अग्रणी शास्त्र है. इतना अधिक गंभीर है  कि जिसने भी इसका अध्ययन किया, उसीने उसके अपने गूढ अर्थ निकाले. अर्थात गीता सबकी चहेती हो गयी. गीता का पढ़ना इसीलिए धार्मिक कृत्यों  में गिना जाने लगा.

   भारत को समझने के लिये गीता का अध्ययन आवश्यक समझा जाता  है. कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान दिया, परन्तु यह ज्ञान मात्र अर्जुन को नहीं दिया गया, अपितु अर्जुन के व्याज से यह ज्ञान  सर्वत्र जगत को दिया गया उद्बोधन है, जिसके माध्यम से भारत को समझने के लिये आसान मार्ग दिखाया गया है.

अब तक गीता के सैकड़ों  अनुवाद हो चुके हैं. कई  महत्वपूर्ण टीकायें लिखी गयी हैं. अनुवादों में भी विनोबा तक ने  गीता के अनेक रहस्य उद्घाटित किये हैं, फिर भी नित नये ग्रन्थ प्रकाश में आ रहे हैं.हिंदी भाषा में भी गीता के सरल अनुवाद प्रकाश में आये हैं. श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी  का यह ग्रन्थ भी उसी श्रेष्ठ परंपरा का महत्वपूर्ण अनुवाद ग्रन्थ है.

ईश्वरी दत्त द्विवेदी धार्मिक विचारों के जाने माने विद्वान हैं. उन्होंने अपने जीवन के श्रेष्ठ पचास वर्ष धार्मिक विचारों को प्राणवंत बनाने में लगा दिये. गीता उनकी प्रिय पुस्तक रही है. उन्होंने अध्ययन ही नहीं किया बल्कि गीता के गूढतम अर्थो के रहस्य को भी जानने  की चेष्टा की  है. यह स्पष्ट है कि द्विवेदी का यह  गीता अनुवाद उनके दीर्घ कालीन अध्ययन और मनन का ही सुफल है.

मैंने श्री द्विवेदी द्वारा अनूदित इस ग्रन्थ के महत्वपूर्ण अंशों को पढ़ा. सभी पद सरस हैं. शब्द रचना  मौलिक रचना का आभास देती है. ऐसा नहीं  लगता कि यह किसी रचना का अनुवाद है.कर्मयोग की व्याख्या 'गीता ' का अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश है. यहाँ उस अंश को बड़ी सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है. अध्याय 2 के 47 वें श्लोक  का अनुवाद  इस प्रकार है  --


     मात्र कर्म कर्त्तव्य तुम्हारा 

                फल पर है अधिकार नहीं 

      फल इच्छा से किया कर्म 

                       परमेश्वर को स्वीकार नहीं.       2/47


    सिद्धि, असिद्धि समान समझ कर 

             दोनों में समभाव गहो

      कार्य सफल, असफल  दोनों में

              एक भाव से  मित्र! रहो                    2/48


     इसी प्रकार की सरल पंक्तियों में श्री द्विवेदी ने श्रीमद् भगवद् गीता का अनुवाद किया है. सरस काव्य में सम्पूर्ण गीता ज्ञान को पिरोया गया है. भाषा के सुन्दर प्रयोग हुए हैं. मैंने गीता के चार और अनुवाद भी पढ़े हैं परन्तु मुझे श्री द्विवेदी  का अनुवाद सबसे उत्तम और आकर्षक लगा है.

हिंदी जगत  में इस ग्रन्थ का विशेष आदर होगा, ऐसा मेरा विश्वास है. श्री द्विवेदी के  श्रम को विद्वान  स्वीकारेंगे और इस विशिष्ट कृति की सराहना करेंगे. साथ ही सामान्य पाठक भी इस अनुवाद को सहज रूप से  अपनाएंगे और इसके अमृत संदेशों का लाभ उठाएंगे.

 श्री ईश्वरी दत्त द्विवेदी के इस प्रशंसनीय कार्य के लिये मैं उन्हें साधुवाद देता हूँ और उनके सतत अध्ययन और मनन  के प्रतिफल के रूप में उनकी जो यह अद्भुत उपहार हिंदी जगत को मिला है उसके लिये उन्हें बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि भविष्य में भी वे ऐसी ही महत्वपूर्ण कृतियों की रचना कर के  हिंदी साहित्य को निरंतर  समृद्ध करते रहेंगे.

                       डॉ शिवानंद नौटियाल

                    पूर्व उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री 

                     8, तिलक मार्ग, डाली बाग, लखनऊ, उ. प्र.

20.12.95



                                                              ( 2  )


'श्रीमदभगवदगीता '  स्वयं भगवान के मुख से निः सृत अलौकिक वाणी है . विश्व के  महिमामय ग्रंथों में यह सर्वोत्कृष्ट है.  इस ग्रन्थ का  प्रत्येक शब्द मुक्ता एवं प्रत्येक पद गंभीर पयोनिधि है. ईश्वर के गुण,स्वरुप एवं प्रभाव तथा उपासना,  कर्म,  ज्ञान- विज्ञान और रहस्य का जैसा प्रतिपादन महर्षि वेदव्यास ने इसमें किया है, वैसा विश्व के किसी अन्य ग्रन्थ में दुर्लभ है. यह ग्रन्थ शास्त्रों का शास्त्र है, वेदों का सार है,, ज्ञान का समुद्र है तथा मुक्ति की गंगा है.


संस्कृत में विरचित ऐसे अद्भुत ग्रन्थ का  हिंदी भाषा में काव्यानुवाद अत्यंत दुष्कर है, किन्तु पंडित ईश्वरी दत्त द्विवेदी जी ने  इस असाध्य कार्य को  अपनी भक्ति एवं लगन से   साध्य बना डाला है. राष्ट्र भाषा के माध्यम से  साधारण जन भी गीता के मर्म को समझ सकेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है.

 इस काव्यानुवाद में कवि ने  गीता की मूल संवेदना व भावात्मकता की  सर्वत्र रक्षा की है. भाषा सरल, सहज व स्वाभाविक है, भाव अविच्छिन्न हैं,  लय व प्रवाह अबाधित है. संस्कृत भाषा का इतना सुन्दर  हिंदी काव्यानुवाद  इससे पहले मेरे देखने में नहीं आया.  गीता के एक श्लोक का एक ही छंद में काव्यानुवाद  कर पाना किसी प्रतिभा संपन्न कवि की ही सामर्थ्य है. यहाँ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा  -- 


   सुख दुःखे समे कृत्वा  लाभा लाभो जयाजयो

        ततो युध्याय युज्यस्व नैवं पापमवाप्यसि          

               --- श्रीमद् भगवद्गीता    2/ 38 


जब लाभ- हानि, सुख- दुःख  जयाजय में समभाव  रहोगे

तुम तभी युद्ध करने पर भी सब पाप - विमुक्त रहोगे "



अस्तु, करोड़ों हिंदी भाषियों तक  गीता के अनुपम ज्ञान को पहुँचाने के लिये कवि पंडित ईश्वरी दत्त द्विवेदी साधुवाद के पात्र हैं.


डॉ डी. एस. पोखरिया

एम. ए., पीएच. डी.,  डी. लिट.

रीडर, हिंदी विभाग 

 कुमाऊं विश्वविद्यालय., परिसर,अल्मोड़ा




Friday, 3 October 2025

श्रीमदभगवद गीता ( काव्य रूपान्तर )

Front cover  

 श्रीमद् भगवद् गीता 

 हिंदी काव्य- रूपान्तर 

Page one

Left side 

प्रकाशक

ईश्वरी दत्त द्विवेदी

शिवपुर, कोटद्वार, (पौड़ी गढ़वाल)

प्रथम संस्करण---   1999

सर्वाधिकार  --  प्रकाशकाधीन

-

द्वितीय संस्करण   --   2009

स्व. ईश्वरीदत्त द्विवेदी जी की पुण्य स्मृति में उनके सुपुत्र श्री दिनेश चंद्र द्विवेदी द्वारा  प्रकाशित

 तृतीय संस्करण ------    2025  

 डॉ इन्दु नौटियाल द्वारा संपादित एवं पुनर्प्रकाशित 


मुद्रक -----




पेज 1  right side


आत्मकथ्य  (फोटो सहित )


पेज 2  

1--प्रस्तावना / शुभकामनायें 

1 से 2 तक 

तृतीय संस्करण 

1-भूमिका / संपादकीय

2-गीता महिमा

3-  अनुक्रमणिका 

4-  धृतराष्ट्र की व्यथा 


    मुख्य रूपान्तर 

अध्याय 1 से प्रारम्भ 


Tuesday, 30 September 2025

श्रीमदभगवदगीता -- हिंदी काव्य रूपान्तर (तृतीय संस्करण)

 धर्म, कर्म और अध्यात्म की त्रिवेणी श्रीमदभगवदगीता मानवता का  वह अमर गान है- जो  आत्मा को प्रकाश, चित्त को शांति और कर्म को दिशा प्रदान  करता है. महर्षि वेद व्यास की यह कालजयी कृति  मेरे पूज्य पिताजी  श्री ईश्वरीदत्त द्विवेदी की  सर्वाधिक प्रिय पुस्तक थी, जिसका अध्ययन वे आजीवन करते रहे.  इसके दिव्य सन्देश को सरल और सुगम काव्य रूप में ढालना उनके कवि ह्रदय की प्रबल इच्छा थी, जैसा कि उन्होंने प्रथम संस्करण के  'आत्म कथ्य 'में लिखा है. उनका अनुभव था  कि गीता की वाणी जब छन्दों की लय और काव्य की सुरभि से आप्लावित होकर कानों में  गूँजती है तो वह केवल मनन का विषय न रहकर  सीधे ह्रदय से  संवाद करती है.इसी भाव और विश्वास के साथ, अपने सतत अध्ययन और साहित्य साधना के बल पर उन्होंने  इस कृति का सृजन करके अपनी चिर आकांक्षा को पूर्ण किया.

 गीता जैसे अप्रतिम, कालजयी  संस्कृत ग्रन्थ का  यह काव्य -रूपान्तर  अपनी सरलता  और माधुर्य  से पाठकों को उस शाश्वत सत्य से परिचित कराता है जो श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर अर्जुन को उपदेश स्वरुप प्रदान किया था. यह ज्ञान केवल अर्जुन को ही नहीं, बल्कि उनके माध्यम से समस्त जगत को दिया गया उद्बोधन है, जिसमें जीवन को समझने के अनमोल सूत्र निहित हैं. यह रूपान्तर मेरे पूज्य पिताश्री की कठिन साधना का प्रतिफल है, उनका श्रद्धा भाव, गहन अध्ययन और भाषा कौशल इस कृति में सर्वत्र परिलक्षित है. संस्कृत के गूढ श्लोकों का भावार्थ सहज और प्रवाहपूर्ण छन्दों में इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है कि गीता का दार्शनिक गाँभीर्य  भी बना रहता है और इसकी जीवनोपयोगी शिक्षायें भी पाठक तक सरलता से पहुँच जाती हैं.

   इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 1999 में स्वयं उनके कर कमलों द्वारा हुआ था. अब से लगभग ढाई दशक पूर्व प्रकाशित इस रचना को सामान्य पाठकों के साथ -साथ साहित्य जगत में भी व्यापक सराहना मिलती रही है जिसके कुछ उदाहरण इस संस्करण में भी पढ़े जा सकते हैं.

वर्ष 2008 में पिताजी के स्वर्गवास  के  पश्चात्  उनकी पुण्य- स्मृति में  इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण मेरे अनुज  श्री दिनेश चंद्र द्विवेदी द्वारा सन 2009 में प्रकाशित किया गया, जिसे पूर्व की भाँति ही भरपूर प्रशंसा मिली.  उल्लेखनीय है कि प्रथम प्रकाशन से अब तक की सुदीर्घ अवधि में समय समय पर पाठकों  की मौखिक / लिखित  प्रतिक्रियायें निरंतर मिलती रही हैं जो इस बात की द्योतक हैं कि इतने वर्षो के बाद भी यह रचना कहीं न कहीं अब भी पढ़ी जा रही है, और मूल ग्रन्थ की भाँति आज भी प्रासंगिक और प्रभावी बनी हुई है.

 इस उत्कृष्ट काव्य रचना को एक नवीन संस्करण द्वारा कुछ और पाठकों तक पहुँचाने का विचार अनायास ही मेरे मस्तिष्क  में आया, जिसे किसी दैवी प्रेरणा का संकेत मानकर  मैंने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य करते हुए साकार करने का प्रयास किया. मेरा मानना है कि यह कृति न केवल गीता के सन्देश को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम है, वरन उस श्रेष्ठ परंपरा का भी उदाहरण है जिसमें अध्यात्म और साहित्य का सुन्दर संगम दिखाई देता है यहाँ न केवल शास्त्र की गंभीरता  है, बल्कि काव्य का सौंदर्य भी है, न केवल उपदेश है, बल्कि आत्मीय संवाद भी है. 

अपने स्वर्गीय पिताजी की इस अमूल्य धरोहर  को उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरुप  पुनः प्रकाशित करते हुए मुझे परम संतोष की अनुभूति हो रही है. यह केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु उनकी गहन तपस्या,  साहित्यिक मेधा, जीवन दृष्टि और आत्मीय स्मृतियों का जीवंत अभिलेख है . यह मेरा सौभाग्य है  कि  मुझे उनकी कठिन साधना के इस सुफल को एक बार फिर पाठकों तक पहुँचाने का अवसर मिला है. आशा करती हूँ कि  मेरा यह विनम्र प्रयास गीता के शाश्वत सन्देश को नई पीढ़ियों तक भी पहुँचाने  का माध्यम बन कर अधिकाधिक पाठकों  के जीवन  में  सार्थक एवं गुणात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होगा.  

 नये और पुराने सभी पाठकों के लिये,

    अनेक शुभकामनाओं  के साथ,

      डॉ इन्दु नौटियाल 

विजयादशमी , 02 अक्टूबर, 2025