Saturday, 16 September 2017

हिमालय



                                                      

            हे हिमालय  !

रजत शिखरों से सुसज्जित 
गगनचुम्बी शीश गर्वोन्नत उठाये
दूर तक फैली भुजाओं  में समाहित
दिशि-दिशान्तर
क्या स्वयं शाश्वत प्रकृति के  चिर  सखा बन
अवनि पर हो  तुम अवस्थित ?

 या कि युग युग से  समाधिस्थ
 सघन तप में लीन
योगी के सदृश ही 
शीत , वर्षा ताप से रह कर अविचलित
देवताओं सा प्रभामंडल सजाये
चमत्कृत करते जगत को ?

वज्र सा कठोर यद्यपि तन तुम्हारा 
निःसृत होती ह्रदय से करुणा निरन्तर
और बन गंगा सदानीरा , धरा पर
उतर आती अमृत सी जलधार बनकर
ताप-दग्ध वसुंधरा का कष्ट हरने 

शब्द में सामर्थ्य क्या जो 
कर सके अभिव्यक्त  सब उदगार मन के
और वाणी भी नहीं इतनी प्रखर जो 
कर सके सीमित समय में
अर्चना , अभ्यर्थना समुचित स्वरों में

अतः बस नत -शीश हो यह 
मौन अभिनन्दन तुम्हारा 
अंजुरी भर फूल श्रद्धा भाव के ये
कर रही अर्पित तुम्हारी दिव्यता को 

                  हे  हिमालय  !



छायाचित्र---सुमित पन्त

eUttaranchal.com



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