Tuesday, 2 May 2017

आकाश गंगा

                                    

                             आकाश गंगा

दिनभर  की अनथक यात्रा के बाद
जब चला जाता है सूर्य का आलोकरथ
क्षितिज के उस पार
और उतर आती है धरती पर नीरव निशा
अपनी रहस्यमयी श्यामल छवि के साथ 

एक एक कर टिमटिमाने लगते हैं यत्र-तत्र
उज्ज्वल हीरक कणों जैसे तारक गण 
देखते ही देखते जगमगा उठता है गगन
रत्नजड़ित विशालकाय दर्पण के सदृश 

और तब , गहन अन्धकार को भेदती 
प्रकट होती हैउस अनंत विस्तार में -
एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवहमान 
स्वनामधन्या--आकाशगंगा 

समाविष्ट किये अपने आँचल में
लक्ष -लक्ष प्रकाशपुंजों का वैभव
अगणित सूर्य ,चन्द्र और नक्षत्रों के विपुल संसार को
 अपने दुर्निवार आकर्षण  की  परिधि में बांध 

बह रही है  अनवरत, कालदेव की सहगामिनी बन
नीले आकाश के हृदयस्थल को सींचती
स्वर्गिक  सौंदर्य की अप्रतिम  ज्योतिरेखा 
 वह स्वयंप्रभा--  आकाशगंगा  !!









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